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नरेश ने संसद बहाल करने की घोषणा की | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में क़रीब तीन हफ्तों से चले आ रहे विरोध प्रदर्शनों के बाद नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र ने संसद को फिर से बहाल करने की घोषणा की है. नेपाल नरेश ने कहा कि उन्होंने यह क़दम, " बहुदलीय लोकतंत्र की रक्षा करने और शांति स्थापना " के लिए उठाया है. टेलीविज़न पर राष्ट्र के नाम संदेश में ज्ञानेंद्र ने कहा कि शुक्रवार से संसद की बैठक फिर से हो सकेगी. ये वही संसद होगी जिसे चार साल पहले मई 2002 में भंग कर दिया गया था. नरेश ने पिछले तीन हफ्तों में प्रदर्शनों के दौरान लाठी चार्ज और गोलीबारी में मारे गए लोगों के प्रति संवेदना भी प्रकट की है. देश में पिछले तीन हफ्तों से लोकतंत्र बहाली की मांग लेकर लोग उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं और कर्फ्यू के बावजूद हर दिन हज़ारों लोग इन प्रदर्शनों में हिस्सा ले रहे हैं. इन प्रदर्शनों में सेना की गोलियों से 14 लोगों की मौत भी हुई है. नरेश ज्ञानेंद्र ने अपने संबोधन में मारे गए लोगों के प्रति संवेदना प्रकट की और घायलों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना भी की. नरेश ने कहा कि चार साल पहले भंग संसद की बहाली होगी और इसकी बैठक शुक्रवार से होगी. नेपाल के सात विपक्षी दलों की मांगों में से ये एक प्रमुख मांग थी कि संसद को बहाल किया जाए. विपक्षी दल संविधान की समीक्षा की भी मांग कर रहे हैं क्योंकि फिलहाल संविधान के तहत राजा को सरकार और सेना के संबंध में बहुत सारे अधिकार मिले हुए हैं. विपक्षी दलों ने राजा की इस घोषणा का स्वागत किया है और कहा है कि वो अपनी आगे की रणनीति के बारे में मंगलवार को एक बैठक कर के विचार करेंगे. ख़बर है कि ये दल मंगलवार को आयोजित विशाल रैली को स्थगित कर सकते हैं. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि नेपाल नरेश का विपक्षी दलों की मांगें मानने के पीछे कई कूटनीतिज्ञों का भी हाथ है जो पिछले कुछ दिनों से नेपाल में हो रही हिंसा और प्रदर्शनों को रोकने की कोशिश में जुटे हुए हैं. काठमांडू में मौजूद बीबीसी संवाददाता डैन आईसैक्स का कहना है कि राजा का बयान विपक्षी दलों की सभी मांगें तो नहीं लेकिन कुछ मांगों को ज़रुर मान रहा है. इससे पहले शनिवार को नेपाल नरेश ने अंतरिम सरकार का गठन करने और अंतरिम प्रधानमंत्री चुनने का प्रस्ताव रखा था जिसे विपक्षी दलों ने ठुकरा दिया था और आंदोलन तेज़ कर दिया था. रैली, धरने और प्रदर्शन नेपाल नरेश ने फरवरी 2005 में सत्ता अपने हाथ में ले ली थी और कहा था कि माओवादी हिंसा पर क़ाबू पाने के लिए ऐसा करना ज़रुरी था. उस समय भी राजनीतिक दलों ने राजा के फ़ैसले का विरोध किया था जिसके बाद कई राजनीतिक दलों के नेताओं को नज़रबंद भी कर दिया गया. अब पिछले कुछ दिनों से नेपाल नरेश के ख़िलाफ लोग भी उठ खड़े हुए हैं और ज़ोर शोर से प्रदर्शनों में हिस्सा ले रहे हैं.
रविवार को राजधानी काठमांडू में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई झड़पें हुईं थीं. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर रबड़ की गोलियाँ चलाईं और आँसू गैस छोड़ी जिससे 35 लोग घायल हो गए. रविवार को हज़ारों प्रदर्शनकारी काठमांडू में कर्फ़्यू की परवाह न करते हुए पुलिस के नाकेबंदी को पार कर शहर के बीच पहुँचने की कोशिश करते रहे. सुरक्षा बलों का कहना था कि उन्हें आदेश दिए गए हैं कि प्रदर्शनकारियों को महल की ओर जाने से रोकें. दरअसल राजनीतिक दलों और राजा ज्ञानेंद्र के बीच गतिरोध बना हुआ था क्योंकि. विपक्षी दल पहले ही नेपाल नरेश के उस प्रस्ताव को ठुकरा चुके हैं जिसमें उन्होंने राजनीतिक दलों से प्रधानमंत्री चुनकर सरकार का गठन की बात कही थी. सात राजनीतिक दलों का कहना था कि राजा को उस पूरे मसौदे को लागू करना चाहिए जो लोकतंत्र की स्थापना के लिए दिया गया है. |
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