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गुरुवार, 02 मार्च, 2006 को 17:16 GMT तक के समाचार
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बुश के साथ मनमोहन सिंह
भारत-अमरीका के बीच एक सहमति बन गई है
तड़के से ही फ़ोटोग्राफ़र हैदराबाद हाउस पर बने हुए थे. ज़ूमलैंस से अमरीकी विदेश मंत्री कॉंडोलिज़ा राइस को अंदर जाते देखा गया. साथ ही फ़ोटोग्राफ़रों में चर्चा थी कि किस प्रकार परमाणु ऊर्जा विभाग के निदेशक डॉ. काकोडकर कुछ खोए-खोए से अकेले दाख़िल हुए वार्ताओं के लिए.

कई प्रकार की अटकलें चलीं तक़रीबन दो घंटे तक और फिर भारत के वार्ताकार निकले और दबे लफ़्जों में कुछ ने कहा- 'इट्स डन'.

इसके बाद बारी आई भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की.

उन्होंने बताया, "मैं विशेष रूप से इस बात से ख़ुश हूँ कि हमने असैनिक परमाणु ऊर्जा के समझौते के क्रियान्वयन पर सहमति बना ली है. मैंने राष्ट्रपति बुश को बता दिया है कि हम सैनिक और असैनिक रिएक्टरों को अलग कर पाए हैं."

हालाँकि प्रधानमंत्री ने कहा कि इस समय संसद का सत्र चल रहा है, ऐसे में वह और कुछ नहीं कह पाएँगे.

राष्ट्रपति बुश के यह बताने पर कि दोनों देशों के नेताओं पर इसका क्या असर पड़ सकता है-जिज्ञासा और जागी.

बुश.. ख़ुश हुआ

बुश ने कहा, "प्रधानमंत्री ने बताया कि हमने परमाणू ऊर्जा पर एक ऐतिहासिक सहमति बनाई है. यह प्रधानमंत्री के लिए करना आसान नहीं है और न ही अमरीकी राष्ट्रपति के लिए लेकिन यह एक ज़रूरी सहमति है. यह दोनों देशों के लिए फ़ायदेमंद होगा. मैं आपकी दिक्कत और नेतृत्व की सराहना करता हूँ. मैं अब अमरीकी काँग्रेस के लिए साथ काम करने के लिए उत्सुक हूँ. कई दशकों पुराने क़ानून बदलने के उद्देश्य से जिससे हम आगे बढ़ सकें."

 मैं विशेष रूप से इस बात से ख़ुश हूँ कि हमने असैनिक परमाणु ऊर्जा के समझौते के क्रियान्वयन पर सहमति बना ली है. मैंने राष्ट्रपति बुश को बता दिया है कि हम सैनिक और असैनिक रिएक्टरों को अलग कर पाए हैं
मनमोहन सिंह, भारत के प्रधानमंत्री

भारत तथा अमरीका में बहुत कुछ बदल गया है.

शायद यह पिछले दो-तीन सालों में कई बार कहा जा चुका है लेकिन यह सहमति और समझौता इसका प्रतीक-सा है.

कुछ दिनों से भारतीय तंत्र के बयानों से, लहजे से, उनमें एक प्रकार की फुर्ती से और फिर प्रधानमंत्री के संसद में बयान से यह स्पष्ट हो गया था कि समझौता हो रहा है. अभी भारतीय सूत्रों से पता चला है कि वार्ताओं का अंतिम मील लंबा था और मुश्किल भी.

सहमति के आयाम समझा जा रहा है कि वही हैं जो प्रधानमंत्री ने सदन में दो दिन पहले पेश किए थे.

रिएक्टर

65 प्रतिशत यानि 14 रिएक्टर असैनिक हैं और आठ सैनिक. इस सहमति का सैनिक, सामरिक रियेक्टरों से कोई लेना-देना नहीं है. फ़ास्ट-ब्लास्ट रियेक्टर इस सहमति के दायरे से बाहर है और यह भारत के वैज्ञानिकों द्वारा उठाया गया एक अहम मुद्दा था.

दोनों देशों में बातचीत कुछ इस बात पर फंस गई थी कि जहाँ वर्तामान रियेक्टर को चिन्हित किया जा चुका है, उनका भविष्य में क्या होगा?

भारत ने यह आश्वासन हासिल कर लिया है कि आने वाले दिनों में वह तय करेगा कि क्या सैनिक है और क्या असैनिक.

वैज्ञानिकों और कुछ हल्क़ों में 1970 के दशक में तारापुर परमाणु रियेक्टर को समझौते के बावजूद अमरीका द्वारा राजनीतिक कारणों से परमाणु ईंधन की सप्लाई रोक देने का तजुर्बा था.

इस बार भारत के असैनिक रियेक्टरों को आईएईए के निरीक्षण में रखा जाएगा. यदि अमरीका द्वारा ईंधन की सप्लाई में कटौती की जाती है तो भारत को भी हक़ होगा कि अपनी तरफ़ से अपने हितों की रक्षा करने का कदम उठा सके.

बढ़ेगा क़द

इस सहमति को अभी अमरीकी काँग्रेस का अनुमोदन प्राप्त होना है लेकिन यदि यह हो जाता है और परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों का समूह भी राज़ी हो जाता है तब आईएईए से जो भारत के लिए विशेष सहमति होगी, उसमें निहित है भारत की अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक परमाणु हथियार संपन्न देश के रूप में स्वीकृति.

 प्रधानमंत्री ने बताया कि हमने परमाणू ऊर्जा पर एक ऐतिहासिक सहमति बनाई है. यह प्रधानमंत्री के लिए करना आसान नहीं है और न ही अमरीकी राष्ट्रपति के लिए लेकिन यह एक ज़रूरी सहमति है. यह दोनों देशों के लिए फ़ायदेमंद होगा. मैं आपकी दिक्कत और नेतृत्व की सराहना करता हूँ. मैं अब अमरीकी काँग्रेस के लिए साथ काम करने के लिए उत्सुक हूँ. कई दशकों पुराने क़ानून बदलने के उद्देश्य से जिससे हम आगे बढ़ सकें
जॉर्ज बुश, अमरीका के राष्ट्रपति

भारत यह स्वीकार कर रहा है कि उसे पी-5 देशों का दर्जा तो हासिल नहीं हुआ है, लेकिन कुछ-कुछ बीच का.

सरकारी हल्क़ों में उत्साह था 'इतिहास', 'बदलते वक़्त' जैसी बड़ी-बड़ी बातें थी और अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार यह सहमति अपनेआप में ज़रूर प्रधानमंत्री के लिए एक बड़ी उपलब्धि है.

लेकिन जो लोग अमरीका और अमरीकी प्रशासन तंत्र के काम करने के तरीक़े को समझते हैं, वे कहते हैं कि सिर्फ़ सहमति के नियमों को देखा जाए तो सब ठीक है. बस चिंता है तो इस सहमति के राजनीतिक मूल्य की.

अमरीका के प्रति वफ़ादारी कई राष्ट्रों के लिए महँगी साबित हुई है. देखना है कि भारत को कितनी बार और किस प्रकार इस समझौते के बदले वफ़ादारी का प्रमाण देना होगा.

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