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गुरुवार, 02 मार्च, 2006 को 06:21 GMT तक के समाचार
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बुश पर ही कटाक्ष, मज़ाक क्यों?

बुश के कार्टून कई बार कुछ ज़्यादा ही चुटीले हो जाते हैं
अंग्रेज़ी का एक शब्द है फ़ेलियर यानी असफलता. इंटरनेट के गूगल सर्च इंजन पर ये शब्द डालें तो सबसे पहला पन्ना आता है 'बायोग्राफ़ी ऑफ़ प्रेसीडेंट जॉर्ज डब्ल्यू बुश' यानी राष्ट्रपति बुश की जीवनी और वह भी व्हाइट हाउस की आधिकारिक वेबसाइट पर.

लेकिन ये तो केवल एक ही नमूना है.

दुनिया के सबसे 'ताकतवर इंसान' जॉर्ज बुश की इन दिनों हालत ऐसी है कि उनके हँसने-बोलने, खाने-पीने, उठने-बैठने, हर बात पर लोग मज़ाक कर रहे हैं. उनके नाम पर ऐसे-ऐसे कार्टून, लतीफ़े 'पैरोडी' और वीडियो मिलेंगे कि अच्छे अच्छे लाल हो जाएँ.

एक वेबसाइट है 'बुश ऐंड चिंपैंज़ी,' एक और है 'टू स्टूपिड टू बी प्रेसीडेंट.' हमारे देश में तो इतने में लाठी बंदूकें निकल जातीं लेकिन पश्चिम में हर दिन उन्हें छीला जा रहा है.

कुछ ही दिन पहले उन्होंने एक भाषण दिया था. अमरीका में पत्रकार उसे सोटू या 'स्टेट ऑफ़ द यूनियन' भाषण कहते हैं, जिसमें देश का राष्ट्रपति देश का हाल लोगों के सामने रखता है. अच्छा भला भाषण था लेकिन उसकी इंटरनेट पर ऐसी 'पैरोडी' बनाई गई है कि मत पूछिए.

साइकिल उपर, बुश नीचे

इतना बड़ा आदमी, इतने बड़े देश का मालिक, जहाँ सब कुछ बड़ा-बड़ा सा है. बड़ी गाड़ियाँ, बड़े-बड़े तेल के गोदाम, यहाँ तक कि मैकडोनल्डस के आलू के चिप्स भी बड़े-बड़े और कोक और पेप्सी के ग्लास भी उतने ही बड़े लेकिन फिर भी कोई वज़न देने को यानी गंभीरता से लेने को तैयार नहीं!

 कार्टूनिस्ट की नज़र से देखा जाए तो बहुत ही लुभावना चेहरा है बुश का. उनके चेहरे पर अज्ञान और अहंकार का जो मिश्रण है वो एक कार्टूनिस्ट को बहुत आनंद देता है
हिंदुस्तान के कार्टूनिस्ट राजेंद्र

अच्छे भले इंसान हैं, बड़े नियम से गिरिजाघर जाते हैं, अपने बीवी बच्चों का भी ख़याल रखते हैं, लेकिन हमेशा कुछ न कुछ ऐसा होता है कि लेने के देने पड़ जाते हैं.

अमरीका में पचास साल से एक परंपरा चली आ रही है कि दिसंबर के महीने में होनेवाले 'थैंक्सगिविंग डिनर' में हलाल होनेवाली जो टर्की होती है, उनमें से एक को माफ़ी दी जाती है और जो राष्ट्रपति होता है वो उसे हाथ में लेकर फ़ोटो खिंचवाता है.

एक दो साल पहले बुश साहब भी एक टर्की के साथ इस मौक़े पर फ़ोटो खिंचवा रहे थे. उस टर्की को भी क्या सूझी कि उसने उन्हें चोंच मार दी...और ऐसी जगह पर कि बताना ठीक नहीं

बस फ़ोटोग्राफ़रों ने तो बाज़ी मार ली. बिस्कुट गले में अटकाकर थोड़ी देर के लिए बेहोश होने से लेकर नींद में गिरकर आँखें नीली करने तक, बुश अक्सर पत्रकारों को दिलचस्प सुर्खियाँ देते रहे हैं.

पिछली जुलाई में वे स्कॉटलैंड पहुंचे, जी-आठ की बैठक में शामिल होने के लिए.

संयुक्त राष्ट्र बैठक के दौरान बुश
शौचालय जाते बुश को भी फ़ोटोग्राफ़रों से चैन नहीं

भाषण तो हो गया, फिर पता नहीं क्या शौक चर्राया कि राष्ट्रपति जी निकल पड़े साइकिल की सवारी पर. सामने से पुलिस वाले आते दिखे तो टाटा बाय-बाय करने लगे. बस फिर क्या था... साइकिल उपर, और बुश साहब नीचे...

कार्टूनिस्ट की नज़र से...

उसके बाद ऐसे-ऐसे कार्टून बने कि पूछिए मत. यदि कार्टून बनाने वाले की नज़र से देखें तो कैसा है उनका चेहरा?

भारत के हिंदुस्तान अख़बार के कार्टूनिस्ट राजेंद्र धोड़पकर कहते हैं - 'बहुत ही लुभावना.' उनका कहना है, "उनके चेहरे पर अज्ञान और अहंकार का जो मिश्रण है वो एक कार्टूनिस्ट को बहुत आनंद देता है."

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने तो पिछले चार साल से बुश पर डब्यामैन नाम से एक कार्टून कोना चला रखा है. उसे बनाते हैं नीलाभ बैनर्जी.

जब मैने पूछा कि बुश पर ही क्यों, तो उनका कहना था, "बुश का चेहरा और उनका हावभाव कुछ ऐसा है कि उन्हें देखते ही कार्टूनिस्ट के हाथों में खुजली होने लगती है."

कार्टूनिस्ट तो अच्छे भले इंसानों को भी जोकर बना डालते हैं. आख़िर क्यों उड़ाया जाता है बुश का इतना मज़ाक, फिर वह चाहे अमरीका हो या दुनिया का कोई और कोना?

 बुश का चेहरा और उनका हावभाव कुछ ऐसा है कि उन्हें देखते ही कार्टूनिस्ट के हाथों में खुजली होने लगती है
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के नीलाभ बैनर्जी

बीबीसी संवाददाता संजीव श्रीवास्तव कहते हैं बुश से पहले बिल क्लिंटन राष्ट्रपति थे और उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी की बात छोड़ दें तो उनका व्यक्तित्व ऐसा प्रभावशाली था कि उनके मुक़ाबले किसी के लिए भी खड़ा होना मुश्किल होता और बुश के लिए तो बिल्कुल ही नहीं.

नीलाभ बैनर्जी कहते हैं, "समस्या ये भी है कि दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति लोगों को एक विदूषक नज़र आता है. बुश गंभीर बात भी करते हैं तो एक तरह की टेढ़ी मुस्कुराहट के साथ करते हैं और लोग उन्हें गंभीरता से नहीं लेते."

ऐसे-ऐसे क़िस्से हैं राष्ट्रपति बुश के, कि क्या कहा जाए...

एक बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक चल रही थी. बुश बैठे हुए थे और उनके साथ थीं विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस. बुश साहब बहुत देर से बंधे बैठे थे और हल्के होना चाह रहे थे. उन्होंने कागज़ पर लिख कर कोंडोलीज़ा राइस से पूछा - 'अभी उठकर ट्वाइलेट यानी शौचालय जा सकता हूँ?'

फ़ोटोग्राफ़र इतने तेज़ निकले कि उन्होंने 'टेलीस्कोपिक लेंस' लगाकर वो क़ाग़ज़ पढ़ लिया और अगले दिन अख़बारों और टेलीविज़न पर बुश के बाथरूम जाने की ही ख़बर थी.

तो अब जब बुश भारत पहुँचे हैं तो कौन सा कार्टून तैयार किया है नीलाभ बैनर्जी ने? वे बतातें हैं - "प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हाथ जोड़कर बुश से कह रहे हैं---स्वागत! उधर जॉर्ज बुश जवाब देते हैं - स्वागत साहब, मैं हूँ जॉर्ज डब्ल्यू बुश!"

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