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शुक्रवार, 24 फ़रवरी, 2006 को 11:36 GMT तक के समाचार
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बेस्ट बेकरी कांड में नौ को उम्र क़ैद
बेस्ट बेकरी
बेस्ट बेकरी का मामला गुजरात दंगों से जुड़ा सबसे चर्चित मामला है
गुजरात में 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान चर्चित बेस्ट बेकरी आगज़नी कांड के मामले में मुंबई की विशेष अदालत ने शुक्रवार को नौ लोगों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई है और आठ को बरी कर दिया है.

इस मामले में 21 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था लेकिन इनमें से चार लोग अब भी लापता हैं.

गुजरात दंगों को लेकर यह महत्वपूर्ण फ़ैसला माना जा रहा है. जानकारों का कहना है कि इस फ़ैसले से गुजरात दंगों के अन्य 20 मामलों में दिशा तय हो सकती है.

इस विशेष अदालत के जज अभय थिप्से ने मुख्य गवाह ज़ाहिरा शेख पर न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने के लिए आरोप तय करने को कहा है. ज़ाहिरा शेख के बार-बार बयान बदलने से भी यह मामला चर्चा में रहा है.

जज ने कहा कि वह अभियुक्तों को मौत की सज़ा इसलिए नहीं दे रहे हैं क्योंकि यह साफ़ नहीं हो सका है कि बेस्ट बेकरी आगज़नी काँड में उनकी भूमिका क्या थी.

सज़ा पाने वाले अभियुक्त
राजूभाई धमीरभाई बरिया, पंकज वीरेंद्रगीर गुसाई, बहादुर सिंह चौहान उर्फ़ जीतू, जगदीश चुन्नीलाल राजपूत, दिनेश फूलचंद राजभर, शानाभाई चिमनभाई बरिया, शैलेष अनूपभाई ताडवी, सुरेश उर्फ़ लालू देवजीभाई वसावा और संजय ठक्कर.

17 अभियुक्तों पर दंगों में भाग लेने और हत्या के आरोपों में मुक़दमा चलाया गया.

उन पर आरोप थे कि उन्होंने वड़ोदरा में 14 ऐसे लोगों को मार डाला जिन्होंने दंगों से बचने के लिए हनुमान टेकड़ी की बेस्ट बेकरी में पनाह ली थी.

मार्च, 2002 में हुए इस हत्याकांड में दंगाइयों ने 14 लोगों को ज़िंदा जला दिया था जिनमें 12 मुसलमान थे.

बरी होने वाले अभियुक्त
योगेश उर्फ़ पेंटर लक्ष्मण सिंह वर्मा, हरीश उर्फ़ टीनू वीरेंद्रगीर गुसाई, महेंद्र उर्फ़ लंगड़ू, प्रताप सिंह सोलंकी, यासीन अली भाई खोखर, तुलसी भीकाभाई ताडवी, कमलेश भीखाभाई ताडवी और रवि चौहान.

शुरू में गवाह नहीं मिलने के कारण इस मामले को ख़ारिज कर दिया गया था. लेकिन अप्रैल 2004 में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से यह मामला मुंबई की एक विशेष अदालत में फिर से शुरू किया गया था.

गवाहों का चक्कर

पहले इस मामले की सुनवाई वड़ोदरा में हुई हुई थी लेकिन जून, 2003 में गवाहों के अभाव में सभी 21 अभियुक्तों को बरी कर दिया गया था.

ज़ाहिरा शेख
ज़ाहिरा शेख़ पहले गवाही देने को तैयार हुई थीं लेकिन बाद में वे मुकर गईं

इसके बाद कुछ सामाजिक संगठनों के हस्तक्षेप से मानवाधिकार संगठन ने इस मामले की जाँच की और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को फिर से शुरु करने के निर्देश दिए.

एक जनहित याचिका में यह भी अनुरोध किया गया कि यह मामला गुजरात से बाहर चले और इसे स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसकी मुंबई की एक विशेष अदालत में सुनवाई करने का फ़ैसला किया.

इस बीच इस मामले की मुख्य गवाह ज़ाहिरा शेख ने कई बार अपने बयान बदले.

आख़िर में अदालत को इसकी भी जाँच करवानी पड़ी और जाँच में पाया गया कि हो सकता है कि ज़ाहिरा शेख़ को प्रलोभन दिया गया हो.

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