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गुरुवार, 09 फ़रवरी, 2006 को 04:23 GMT तक के समाचार
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काकोडकर की चिंताओं पर विचार
मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश
जुलाई 2005 में प्रधानमंत्री की अमरीका यात्रा के दौरान हुआ था यह समझौता
भारत सरकार ने कहा है कि अमरीका के साथ परमाणु सहयोग के समझौते पर आण्विक ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोडकर ने जो चिंताएँ जताई हैं, उन पर विचार किया जाएगा.

भारतीय रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि सरकार इस बारे में जल्द ही फ़ैसला लेगी.

सवाल ये उठ रहा है कि 18 जुलाई 2005 को हुए इस समझौते के बाद क्या अमरीका भारत से उसके परमाणु कार्यक्रम की गोपनीयता ख़त्म कर दुनिया के सामने बेपर्दा करने के लिए दबाव बढ़ा रहा है?

भारतीय आणविक ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोडकर ने इंडियन एक्सप्रेस अख़बार को दिए एक इंटरव्यू में चिंता जताते हुए कहा है कि भारत के सामरिक हित तय करने की इजाज़त दूसरे देशों को नहीं दी सकती.

भारत के आठ पूर्व राजदूतों ने भी इस मामले में चिंता जताई है.

इस समझौते में व्यवस्था है कि भारत को परमाणु प्रोद्योगिक और रिएक्टर मिलेंगे जबकि बदले में भारत अपने सैनिक और असैनिक परमाणु कार्यक्रमों को अलग करेगा.

समझौते में असैनिक परमाणु कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी के तहत रखने की भी बात कही गई है.

डॉक्टर अनिल काकोडकर का भारतीय वैज्ञानिकों के बीच बहुत सम्मान है और वह भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव भी हैं.

डॉक्टर अनिल काकोडकर का कहना है कि अमरीका अब जो कोशिश कर रहा है वो परमाणु समझौता हो जाने के बाद समझौते की शर्तें बदलने के बराबर है.

काकोडकर याद दिलाते हैं कि 18 जुलाई 2005 को वॉशिंगटन में हुए इस समझौते के आधार पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय संसद में आधिकारिक बयान भी दिया था.

इस परमाणु समझौते के अनुसार भारत को एक सूची अमरीका को देनी है जिसमें यह लिखकर देना है कि कौन-कौन से परमाणु ठिकाने शांतिपूर्ण कामों के लिए ऊर्जा बनाएँगे और कौन-कौन से ठिकाने सेना के इस्तेमाल के लिए परमाणु हथियार बनाएँगे.

जो परमाणु ठिकाने ऐसे हैं जहाँ शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए ऊर्जा बनाई जाती है उन्हें संयुक्त राष्ट्र की परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में रखा जा सके.

कठिन विकल्प

आपको याद होगा कि अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने हाल ही में कहा था कि भारत को कुछ कठिन विकल्पों को चुनना पड़ सकता है.

इसका क्या अर्थ लगाया जा रहा है कि अमरीका चाहता है कि भारत कुछ फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में डाले जिसका भारत का वैज्ञानिक समुदाय जमकर विरोध कर रहा है.

डॉक्टर काकोडकर का कहना है कि यह अमरीका तय नहीं कर सकता कि भारत कौन सा रिएक्टर किस सूची में डाले और यह करना भारत का अधिकार है.

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