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'भारत पर अब और विश्वास नहीं...'

मणिपुरी चरमपंथी लेफ़्टिनेंट कॉन्सुन थोइहेन
मणिपुर के चरमपंथी गुटों का कहना है कि उन्हें अब भारत सरकार पर भरोसा नहीं
पूर्वोत्तर भारत के राज्यों को वैसे ही आम भारतीयों की सोच में बहुत प्रमुखता से जगह नहीं मिल पाती. तो ऐसे में मणिपुर के चरमपंथी गुट के लोगों की सोच को सामने लाना एक चुनौती जैसा था.

उत्तर में नगालैंड, दक्षिण में मिज़ोरम और पश्चिम में असम राज्य के साथ ही पूर्व में मणिपुर की सीमा लगती है बर्मा से.

मेरी मुलाक़ात हुई यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ़्रंट (यूएनएलएफ़) की सैनिक शाखा मणिपुर पीपल्स आर्मी के लेफ़्टिनेंट कॉन्सुन थोइहेन से, जिन्होंने कुमाऊँ विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने के बाद हथियार उठाने का फ़ैसला किया.

मैंने सबसे पहले उनसे उनके संगठन की सोच के बारे में सवाल किया, जिस पर उनका कहना था-

"हम अपनी स्वायत्तता के लिए लड़ रहे हैं. हमारे अधिकारों को दबाने की कोशिश हो रही है. हम कभी भी ब्रितानी राज वाले भारत का हिस्सा नहीं थे, क्योंकि ब्रितानी भी समझते थे कि ये अलग देश के अलग लोग हैं. उसके बाद जब ब्रिटेन ने भारत को आज़ाद किया तो उन्होंने हमें भी आज़ादी दी. हम 1947 से 1949 तक आज़ाद रहे. 1948 में हमने नया संविधान बनाया. भारत के 1950 में गणतंत्र बनने से पहले ही हमारा संविधान और विधायिका बन चुकी थी."

"1949 तक हम अपना देश ख़ुद चला रहे थे मगर 15 अक्तूबर 1949 को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने हमें भारत में मिला दिया. उसके बाद से हमारे साथ तीसरे दर्जे का बर्ताव हुआ है. भारत हमारे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहा है और हम पर अत्याचार हो रहे हैं."

स्नातकोत्तर करने के बाद तो आप कोई भी पेशा अपना सकते थे, यही रास्ता क्यों चुना?

मैं कोई भी पद पा सकता था, मगर मैंने सब कुछ छोड़ दिया क्योंकि देश की पुकार कहीं बड़ी थी. इसलिए और अर्थपूर्ण जीवन के लिए मैंने जीवन समर्पित कर दिया.

जब सेना में शामिल हुए तब घर वालों का क्या कहना था?

शुरू में मेरी माँ थोड़ी घबराई थी क्योंकि उसका एक बेटा इतना ख़तरनाक रास्ता अपना रहा था, मगर ये ज़रूरी था और फिर उसने समझ लिया. सारी परिस्थितियों को समझने के बाद उसने मुझे आशीर्वाद दिया.

आपकी पत्नी ने कभी नहीं कहा कि हिंसा का ये रास्ता छोड़ दो?

मणिपुर के चरमपंथियों के साथ मुकेश शर्मा
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नहीं, क्योंकि आप जो कहते हैं न... वो एक धर्मपत्नी है और मेरा उद्देश्य, जीवन और आकांक्षाएँ तो जानती ही है देश की बुरी हालत भी समझती है. वो मुझे बहुत अच्छी तरह समझती है मेरी सोच, मेरे आदर्श. मुझसे शादी करने के लिए उसे सारी सुख सुविधाएँ छोड़नी पड़ीं मगर उसने सब क़ुर्बानी दे दी.

क्या बच्चों को भी इसी रास्ते पर डालेंगे?

निश्चित ही, मेरे बच्चे को मेरे रास्ते पर ही चलना होगा. हाँ उसे हमारे विद्रोही तंत्र के बारे में जानना होगा, जिससे वो हमारे देश के उद्देश्य के बारे में सोच समझ सके.

आपके हाथों किसी संघर्ष में जब किसी की जान जाती है तो आपको कभी अफ़सोस होता है?

उसके लिए मुझे कभी-कभी अफ़सोस होता है. मगर जब मैं एक सेना से जुड़ा हूँ तो देश के लिए हथियार उठाना पड़ता है. हाँ, फिर भी अगर सेना के लोग हमारे लोगों को नुक़सान नहीं पहुँचाते और निशस्त्र होते हैं तो हम उन्हें अनावश्यक नुक़सान नहीं पहुँचाते.

अगर सरकार आप लोगों को सुविधाएँ पूरी तरह मुहैया करा दे तो क्या आप हथियार छोड़ देंगे?

नहीं, हमने देख लिया है. भारत से जुड़े हमको 50 साल हो गए. इन सालों में भारत ने हमें क्या दिया है, हमसे क्या क्या लिया है, हमने सब देख लिया है. तो हमें अब इस भारत सरकार पर कोई भरोसा नहीं रह गया है.

मगर मणिपुर की सरकार में तो ख़ुद आपके ही लोग हैं, तो आप उन पर भरोसा क्यों नहीं करते?

 भारत से जुड़े हमको 50 साल हो गए. इन सालों में भारत ने हमें क्या दिया है, हमसे क्या क्या लिया है, हमने सब देख लिया है. तो हमें अब इस भारत सरकार पर कोई भरोसा नहीं रह गया है
लेफ़्टिनेंट थोइहेन, मणिपुर के चरमपंथी

ये लोग मणिपुरी हों तब भी इस भारतीय तंत्र में वे कुछ कर नहीं सकते. जब राज्य में सूखा पडा तब राज्य सरकार केंद्र से मदद की माँग करती रही मगर मदद आने में महीनों का सम लग गया. सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम हटाने की बात राज्य सरकार करती है मगर फिर भी वो हटाया नहीं गया. हम जान गए हैं कि राज्य के नेता सिर्फ़ भारत सरकार के हाथों की कठपुतली की तरह काम करते हैं.

अगर भारत सरकार आप लोगों को बातचीत के लिए आमंत्रित करती है तो क्या आप बात करने को तैयार हैं?

अगर सरकार संप्रभुता और स्वतंत्रता पर बात करने के लिए तैयार है. अगर बात होती है तो निश्चित ही हमारी संप्रभुता पर होनी चाहिए.

अगर दोनों पक्ष इसी तरह अपने पक्ष पर अड़े रहे तो मसला हल कैसे होगा?

संघर्ष चलता रहेगा

आपको समर्थन कहाँ-कहाँ से मिल रहा है?

हमें कुछ देशों का समर्थन हासिल है जो हमारे मक़सद के प्रति सहानुभूति रखते हैं, भले ही वे भारत से रिश्तों की वजह से खुलकर अपनी बात नहीं रख पाते.

वे कौन से देश हैं?

ये बताने का अभी सही समय नहीं आया है.

आप लोगों को हथियार किन देशों से या किन ज़रियों से मिलते हैं?

इसका ब्यौरा हम सुरक्षा कारणों से नहीं दे सकते मगर हम अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से ये हथियार ख़रीदते हैं.

जब किसी संघर्ष में नहीं होते तब क्या करते हैं?

क़िताबें पढ़ता हूँ. अपना संघर्ष और मज़बूत करने के लिए, उसमें और सुधार के लिए इन क़िताबों से मदद मिलती है.

आपका पसंदीदा लेखक कौन है?

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