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चरमपंथी सोच पर हावी स्थानीय पहलू | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक सवाल ज़हन में उभरा, कौन चलाता है इन चरमपंथियों की दुनिया? जिनका आतंक अख़बारों के पन्नों और टेलीविज़न के स्क्रीन से बाहर निकलकर डराता है या कुछ इलाक़ों में जिनकी मौजूदगी लोगों को सुरक्षित होने का एहसास भी कराती है. भारत में कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों के सौंदर्य पर हावी हो चली है आतंक की ये छाप. मगर एक आम ज़िंदग़ी बिता रहा व्यक्ति ये दिशा चुनता क्यों है? उसकी सोच को प्रभावित क्या चीज़ करती है? उसका धर्म, ज़मीन, उसका परिवार, सरकार का बर्ताव या किसी चरमपंथी संगठन का नेतृत्व. मणिपुर यही जानने के मक़सद से पहले रुख़ किया मणिपुर का जहाँ इन दिनों अलगाववाद की हवा काफ़ी तेज़ बह रही है. मुलाक़ात हुई यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ़्रंट (यूएनएलएफ़) की सैनिक शाखा मणिपुर पीपल्स आर्मी के सदस्यों से.
मिलने से पहले वायु, थल और जल सभी मार्गों का इस्तेमाल करना पड़ा. एक डर था कि रास्ते में कहीं सुरक्षा बलों से मुलाक़ात न हो जाए. डर इसलिए कि फिर इन चरमपंथियों से मिलकर उनको समझने की एक कोशिश शायद विफल हो जाती. मगर ऐसा नहीं हुआ और मणिपुर के इन चरमपंथियों से मुलाक़ात हुई, काफ़ी गर्मजोशी से. बातचीत में एहसास हुआ कि वे शेष भारत को बिल्कुल भी अपना नहीं समझते. कहते हैं, “जब मैं भारत गया था...”. उनका दावा है कि वे शेष भारतवासियों से बिल्कुल मेल नहीं खाते, न शारीरिक संरचना के हिसाब से और न ही सांस्कृतिक रूप से. इसलिए उन्हें भारत से अलग कर दिया जाना चाहिए. उन्हें अफ़सोस है कि केंद्र सरकार या राज्य सरकार ने इस क्षेत्र के विकास पर पूरा ध्यान भी नहीं दिया है.
उनसे जब सवाल किया कि कौन चलाता है आपकी दुनिया तो जवाब मिला, ‘हमारे लोग’. इस बीच जब सुरक्षा बलों के पूर्व अधिकारियों से बात हुई तो वे कहते हैं कि मणिपुर के अलगाववादी गुटों ने जब पूर्वोत्तर भारत के दूसरे राज्यों में सशस्त्र बलों से बातचीत होते देखा तो उन्हें लगा कि अपनी बात सुनवाने का शायद यही बेहतर तरीक़ा है. साथ ही ये अधिकारी इस इलाक़े को दिए गए धन में भ्रष्टाचार की बात भी स्वीकार करते हैं. मगर इन चरमपंथियों की जनमत संग्रह करवाने की माँग से सरकारी पक्ष कतई राज़ी नहीं दिखा और चरमपंथी हैं कि इस माँग से डिगने को तैयार नहीं. अब मसला हल कैसे होगा इसकी स्पष्ट सोच न तो अलगाववादियों की ओर दिखी और न ही सरकार के पास. कश्मीर मणिपुर से आकर जब कश्मीर का रुख़ किया तो एक अलग ही रोमांच था. ये जानते हुए भी कि वहाँ के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं, ज़मीन के स्वर्ग को देखने का उत्साह तो था ही.
वहाँ पहुँचकर सेना की मौजूदगी देखी तो चप्पे-चप्पे पर उनके होने की बात बिल्कुल ही सच और सामने दिखी. इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच वहाँ भी मुलाक़ात आसान नहीं थी. दो दिन इंतज़ार के बाद, पहाड़ियों पर जाकर मुलाक़ात हुई हिज़बुल मुजाहिदीन के तहसील कमांडर शब्बीर अहमद उर्फ़ अब्दुल माजिद से. बातचीत की शुरुआत से लेकर अंत तक हर पहलू ‘मज़हब’ की ओर जाता समझ में आया और सारे आरोप भारतीय सेना या सरकार पर. उनका कहना था, ‘भारत को कश्मीर को आज़ाद कर देना चाहिए.’ उनके सामने जब मेरा सवाल आया कि कौन चलाता है आपकी दुनिया तो जवाब सिर्फ़ एक शब्द में, ‘क़ुरान’. वैसे कश्मीर पर नज़र रखने वालों से बात हुई तो उनका कहना था कि आंदोलन की शुरुआत में मज़हब इतना प्रभावी नहीं था ये तो बाद में कट्टरपंथ हावी हो गया. सरकारी पक्ष का कहना है कि चरमपंथी, सेना की ओर से हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन के मसलों को काफ़ी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, जिससे लोग उनके संगठनों में शामिल होते रहें. सरकारी पक्ष जो भी कहे मगर जब उन घरों के लोगों से मुलाक़ात हुई जिनके परिजन दो या तीन दिन पहले ऐसे संगठनों में शामिल होने चले गए थे तो एहसास हुआ कि सरकारी दावे ज़मीनी स्तर पर कितने खोखले प्रतीत होते हैं. |
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