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लोगों के हाथ में ताक़त | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ये कहानी है गुजरात राज्य के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता स्टालिन के की जिसने रेडियो कार्यक्रमों के ज़रिए सत्ता में बैठे शक्तिशाली लोगों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने का बीड़ा उठा रखा है. गुजरात में कुछ वर्ष पहले ज़बर्दस्त भूकंप आया था जिसके बाद के राहत कार्यों में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखकर स्टालिन के मन में ऐसे कार्यक्रम बनाने का ख्याल आया जो समुदाय केंद्रित हो. स्टालिन बताते हैं कि उनका नाम सोवियत संघ के पूर्व नेता स्टालिन के नाम पर ही रखा गया है. स्टालिन ने कच्छ इलाक़े में कुछ रिपोर्टरों की मदद से कार्यक्रम शुरु किया है जिसमें भ्रष्टाचार उजागर करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है. भूकंप के बाद शुरु किए गए इस कार्यक्रम में सरकार के राहत कार्यों की रिपोर्टिंग की गई लेकिन बाद में इसका कलेवर बदल गया और कार्यक्रम ने सत्ता में बैठे अधिकारियों नेताओं को चुनौती देने का फैसला किया. लोगों के हाथ में ताकत स्टालिन बताते हैं कि जब इस कार्यक्रम के ज़रिए एक स्थानीय नेता के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हुआ तो लोगों ने अगले साल उस नेता को चुनावों में हरा दिया.
ये कार्यक्रम गांव के लोग खुद ही बनाते हैं जिन्हें स्टालिन और उनके सहयोगी ट्रेनिंग देते हैं. स्टालिन के अधिकतर रिपोर्टर कम पढ़े लिखे हैं लेकिन उनकी बुद्धि तीक्ष्ण है. पांच साल से स्टालिन ने यह परियोजना चला रखी है जिसमें कई रेडियो रिपोर्टर तैयार किए हैं. सरकार पर निगरानी स्टालिन द्वारा शुरु किया गया कार्यक्रम अब सरकार के कामकाज़ पर नज़र रखने वाला कार्यक्रम बन गया है जिस पर लोगों को पूरा भरोसा है. अब कुछ ऐसे कार्यक्रम बन रहे हैं जिन्हें रेडियो छापा कहा जाता है जिसमें रिपोर्टर किसी एक कहानी की तह में जाने की कोशिश करता है. चाहे वह डॉक्टर से जुड़ी हो. गांव के मुखिया हो, तहसीलदार हो या फिर नेता. किसी का भ्रष्ट आचरण इनसे छुपता नहीं है. भ्रष्ट आचरण के खुलासे के बाद कई बार सरकार मामलों की जांच कराती हैं और दोषियों को सज़ा भी मिलती है. कार्यक्रम के बारे में एक रिपोर्टर बीनू अलेक्जेंडर कहती हैं कि इसने न केवल रिपोर्टिंग के अलग मानदंड बनाए हैं बल्कि अधिकारियों की जवाबदेही के प्रति आम जनता का रवैया भी बदल कर रख दिया है. |
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