|
'...गांधी जी भी दहशतगर्द थे' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कश्मीर के चरमपंथी संगठन हिज़बुल मुजाहिदीन के बारे में लंबे समय से सुनते आया था, मगर ऐसा रास्ता चुनने वालों की सोच क्या हो सकती है ये आमने सामने जानने की एक कल्पना ही थी. इस कल्पना को साकार करने का मौक़ा मिला, जब हिज़बुल मुजाहिदीन के तहसील कमांडर अब्दुल माजिद से कश्मीर की सुदूर घाटियों में मेरी मुलाक़ात हुई. ये मुलाक़ात इतनी आसान साबित नहीं हुई क्योंकि मेरे बीबीसी संवाददाता होने की ख़बर होने के बावजूद उनमें मेरे लिए लगातार अविश्वास दिखता रहा और एक शक़ की निगाह हमेशा मुझे घूरती रही. बातचीत शुरू हुई तो मैंने पहला सवाल किया उनकी तालीम से जुड़ा और उनका जवाब मिला- "अल्लाह का शुक्र है कि उन्होंने मुझे अच्छी तालीम के लिए स्कूल भिजवाया. मैंने प्राइमरी के बाद हॉस्टल से दसवीं पास की. मीडिया पर सुनता था कि कश्मीरियों पर ज़ुल्म हो रहे हैं तब मुझमें इसे लेकर जज़्बात आए और 1999 में मैंने अपने मिशन का आग़ाज़ किया." क्या आप तक ख़बरें सिर्फ़ मीडिया के ही ज़रिए पहुँचती थीं? मीडिया के अलावा आस पास के लोगों से भी इस बारे में पता चल जाता था लोगों के ज़रिए कि उन पर क्या ज़ुल्म हो रहे हैं. चरारे शरीफ़, हज़रत बल और अयोध्या की घटनाओं ने मुझे इस ओर बढ़ाया. ये कैसे तय किया कि किस ग्रुप में शामिल होना है? अमरीका और ब्रिटेन कहते हैं कि कश्मीर में सक्रिय लश्करे तोइबा पाकिस्तानी हैं, हालाँकि वो तो हमारी मदद करने के लिए आते हैं मगर कहा जाता है कि वे दहशतगर्द हैं. तो मैंने सोचा कि हिज़बुल मुजाहिदीन कश्मीरियों का ग्रुप है जिसकी क़यादत पाकिस्तान में है, ये हमारी तंज़ीम है जो हमारे अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं तो फिर मैंने इस ग्रुप में शामिल होने का फ़ैसला किया. आपने प्रशिक्षण कहाँ लिया है? मेरी ट्रेनिंग कश्मीर में ही हुई है और सब कुछ सीखा है जैसे हमारे पास कलाशनिकोव है तो उसका जोड़ना, उसको खोलना, उसकी सफ़ाई, उसे चलाना, पीका, मोर्टार, ग्रेनेड, चाइनीज़ पिस्टर, हर चीज़ चलाना सीखा है. मैं जगह का नाम तो नहीं बता सकता मगर ट्रेनिंग हुई कश्मीर में ही है. आप लोगों को दहशतगर्द कहा जाता है...
अगर हिंदुस्तान इन आज़ादी के मतवालों को दहशतगर्द कहता है तो उनका गाधी जी भी दहशतगर्द था, क्योंकि उसने भी आज़ादी के लिए मेहनत की है. .... मगर उन्होंने कभी हथियार नहीं उठाया? उन्होंने हथियार नहीं उठाया तो ख़तो क़िताबत के ज़रिए अपना मिशन पूरा किया. उसी तरह क़लम उठाने वाले हमारे हुर्रियत के लोग हैं जो क़लम से बात करते हैं. मिलिट्री हम पर अटैक करती है तो हम उनको जवाब देते हैं. हमारी जंग मिलिट्री से है. उनके पास हथियार है तो हमारे पास भी हथियार है. हुर्रियत की केंद्र सरकार से बातचीत हो रही है आपको लगता है इससे मसला हल हो जाएगा? हम भी देखते हैं कि मसला कब तक हल होता है. हमारी माँगें अगर पूरी हो जाएँ तो हमें हथियार उठाने की कोई ज़रूरत नहीं है. मगर ऐसा नहीं हुआ तो जद्दोजहद जारी रहेगी. इस राज्य के तीन हिस्से हैं. जम्मू, कश्मीर और लद्दाख. ये तीनों ही हिस्से आज़ाद होने चाहिए. सिर्फ़ भारत से आज़ादी चाहिए, या जिसे पाकिस्तानी कश्मीर कहते हैं उससे मिलाएँगे या उसे भी लेकर पूरी तरह कश्मीर को आज़ाद करने की सोच है आपकी? ये तब देखेंगे जब हम आज़ाद हो जाएँगे. मगर एक इस तरह की सोच तो पहले से होनी चाहिए कि अगर आज़ादी मिल भी गई तो प्रशासन चलेगा कैसे, कोई ब्लूप्रिंट तैयार है? सोच तो हमारी ये है कि उस कश्मीर को भी मिलाकर एक देश बनाएँगे. बात रही संबंधों की तो किसके साथ रिश्ते रखने हैं वो बाद में देखेंगे क्योंकि मुसलमानों और मुसलमानों में आपस में कोई जुदाई नहीं हो सकती. हर दिन का आपका काम काज क्या होता है? सुबह उठकर नमाज़ पढ़ना, फिर क़ुरान पाक की तिलावत होती है, फिर लोग अपने-अपने काम को निकल जाते हैं. हम पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ते हैं, आपस में जिहाद के बारे में डिस्कशन करते हैं. आप लोगों तक असलहे पहुँचते कैसे हैं? ये नहीं बता सकता. अगर कहीं छापामार हमला, गुरिल्ला अटैक करना होता है तो उसकी योजना कैसे तैयार होती है? सभी साथी मिलकर मशविरा करते हैं. उसमें 10 से 15 लोग तक हो सकते हैं, फिर सबकी राय ली जाती है और जिस पर सब लोग राज़ी हो जाते हैं उसी के हिसाब से काम होता है. जब किसी सैनिक की जान आपके हाथों जाती है तो बाद में कभी सोचते हैं कि एक इंसान आपके हाथों मारा गया? बात ये है कि ये जंग है और इसमें ज़रूरी है कि जब वो हम पर हमला करते हैं तो हम उन पर हमला करते हैं. इंसान की जान तो ज़रूर ही जाती है तो हम हिंदुस्तान की सरकार से कहते हैं कि वो हमें आज़ादी दे दे न उनकी जान जाएगी न हमारी. क्या आप चाहेंगे कि आपकी अगली पीढ़ी भी यही रास्ता अपनाए? मैं तो चाहता हूँ कि पूरी कश्मीरी क़ौम इसमें शामिल होकर काम करे, वैसे कोई ज़बरदस्ती नहीं है और लोग अपना रास्ता ख़ुद चुन सकते हैं. अगर ये पूछा जाए कि आपको सोच को क्या चीज़ प्रभावित करती है, कौन चलाता है आपकी दुनिया तो आपका जवाब क्या होगा? इसमें तो हम क़ुरान की रहनुमाई लेते हैं. भारत और पाकिस्तान दोनों ओर के कश्मीरियों के अपने परिवार वालों से मिलने के लिए श्रीनगर मुज़फ़्फ़राबाद रास्ता खोला गया है और भी कुछ रास्ते खोले जाने की बात है. आपको नहीं लगता कि इससे मसला कुछ हल हो सकता है? रास्तों से कोई मसला हल नहीं होता, ये तो सिर्फ़ प्रचार है, प्रोपगेंडा है. रास्ते आज़ादी में कोई हल नहीं हैं. (ये मुलाक़ात कश्मीर में भूकंप आने से पहले हुई और जिस क्षेत्र में ये मुलाक़ात हुई वहाँ का क्षेत्र भूकंप से प्रभावित नहीं हुआ है.) |
इससे जुड़ी ख़बरें चरमपंथी सोच पर हावी स्थानीय पहलू20 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'चरमपंथी गतिविधियों में कमी नहीं'15 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस चरमपंथियों ने रजौरी में 10 को मारा10 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'पाकिस्तान में अल क़ायदा समाप्त'26 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस संघर्ष में पाँच 'घुसपैठिए' मारे गए14 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||