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मंगलवार, 18 अक्तूबर, 2005 को 20:00 GMT तक के समाचार
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भूकंप के बाद भी कूटनीति जारी

हेलिकॉप्टर विवाद से दोनों देशों का आपसी अविश्वास ही सामने आया
दरअसल, राजनीति और कूटनीति कभी नहीं रूकती, संकट के समय भी नहीं.

पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने जो ताज़ा घोषणा की है वह काफ़ी चौंकाने वाली है, ख़ास तौर पर अगर उसे पिछले कुछ दिनों में हुई घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखें.

इसमें कोई शक नहीं है कि यह बहुत ही सकारात्मक और उम्मीद जगाने वाली घोषणा है लेकिन ज़रा गहराई में जाएँ तो असली समस्या का अंदाज़ा भी होने लगता है.

कश्मीर में भयावह भूकंप के बाद भारत ने कहा कि वह नियंत्रण रेखा की ओर से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में मदद पहुँचाने के लिए तैयार है, पाकिस्तान सरकार ने कहा कि उसे राहत सामग्री की खेप तो चाहिए लेकिन नियंत्रण रेखा की ओर से नहीं.

इसके बाद हेलिकॉप्टरों का सवाल आया, पाकिस्तान ने कहा कि उसे दुर्गम इलाक़ों में राहत पहुँचाने के लिए हेलिकॉप्टर चाहिए, भारत ने मदद की पेशकश की लेकिन पाकिस्तान ने कहा कि वह हेलिकॉप्टर लेने को तैयार है लेकिन भारतीय पायलट नियंत्रण रेखा के पार नहीं आ सकते, भारत ने कहा बिना पायलट के हेलिकॉप्टर देना संभव नहीं है.

पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने बीबीसी से एक विशेष बातचीत में स्पष्ट शब्दों में कहा है, "पाकिस्तान ने बहुत हिम्मत भरा फ़ैसला किया है" जबकि भारत का कहना है कि वह तो पहले ही कह रहा था कि नियंत्रण के आर-पार लोगों की आवाजाही होनी चाहिए.

बारीक़ बातें

दोनों पक्ष जब एक जैसी बातें कर रहे हैं तो फिर दिक्क़त क्या है?

पाकिस्तान ने अमरीकी हेलिकॉप्टरों की मदद ली

असली दिक्क़त तब शुरू होती है जब बारीक बातें सामने आती हैं, भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान की ओर से आने वाली व्यावहारिक जानकारियों का इंतज़ार हो रहा है.

इससे कुछ ही घंटे के अंतर पर जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री से पूछा गया कि लोगों के आने-जाने के लिए क्या नियम-क़ानून लागू होंगे तो ख़ुर्शीद महमूद कसूरी ने कहा, "हम तो अपना विज़न आपको बता रहे हैं, डिटेल तो आगे चलकर वर्कआउट होंगे."

कोई यह कैसे भूल सकता है कि श्रीनगर और मुज़फ़्फ़राबाद के बीच बस चलाने की घोषणा होने के बाद भी महीनों तक बात इसी पर लटकी रही कि लोग भारत-पाकिस्तान के पासपोर्ट पर यात्रा करेंगे या विशेष यात्रा परमिट का प्रावधान होगा.

परवेज़ मुशर्रफ़ का कहना है, "जितने भी लोग नियंत्रण रेखा पार करके अपने रिश्तेदारों से मिलना चाहें और पुनर्निर्माण में मदद करना चाहें हम उन्हें इसकी अनुमति देंगे", लेकिन ये लोग आख़िर किन दस्तावेज़ों और शर्तों के आधार पर नियंत्रण के रेखा के आर-पार आवाजाही करेंगे, यह किसी को पता नहीं है.

दोनों देशों के बीच 'परस्पर विश्वास बढ़ाने के लिए' व्यापक बातचीत चल रही है लेकिन परस्पर विश्वास कितना है इसकी झलक पिछले एक सप्ताह में हम कई बार देख चुके हैं, कड़ी सुरक्षा, निगरानी और आवेदनों की लंबी जाँच प्रक्रिया के बाद एक बस में कश्मीरी यात्राओं का आना-जाना इतना बड़ा काम होता है तो खुली नियंत्रण रेखा की कल्पना ज़रा कठिन ही लगती है.

संवेदनशीलता

बहरहाल, संकट के समय आपसी बैर भुलाकर काम करने की 'अच्छी-अच्छी बातें' करना बहुत आसान है लेकिन दोनों देशों के बीच आपसी संवेदनशीलता का स्तर हमेशा की तरह अब भी ऊँचा है.

परस्पर विश्वास के लिए बातचीत हो रही है लेकिन विश्वास कितना है?

मिसाल के तौर पर, मंगलवार को बीबीसी के साथ बातचीत में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने दोहराया कि हेलिकॉप्टर मामले में उनका फ़ैसला सही था, उन्होंने कहा, "भारतीय प्रधानमंत्री ने भी माना कि वे पाकिस्तान की संवेदनशीलता को समझ सकते हैं."

बात सच है, मनमोहन सिंह इस संवेदनशीलता को समझते ही होंगे, वे इससे कैसे इनकार कर सकते हैं कि भारत ने सूनामी की आपदा के समय विदेशी राहत एजेंसियों के कार्यकर्ताओं को देश में काम करने की अनुमति नहीं दी थी, पोर्ट ब्लेयर की सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि ऑक्सफ़ैम और रेड क्रॉस जैसी एजेंसियों ने काफ़ी हताशा प्रकट की थी.

उसके अलावा, काफ़ी हद तक जाने-अनजाने में दोनों देश के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़रों में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ भी जारी है इसलिए उदार, खुले और मेल-जोल की भावना से ओत-प्रोत बयान दोनों तरफ़ से आ रहे हैं लेकिन उनकी व्यावहारिकता हमेशा संदिग्ध रही है.

दोनों ओर से बातें हो रही हैं, इन्हें बातों की ही तरह लेना चाहिए और उतने ही को सच मानना चाहिए जो आँखों के सामने हो.

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