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शनिवार, 15 अक्तूबर, 2005 को 12:43 GMT तक के समाचार
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सीमा के शिकार कश्मीरी लोग

सीमा के शिकार कश्मीरी लोग
सीमाओं का दर्द कभी कोई समझेगा?
कश्मीर का नाम सामने आने पर उसकी दो तरह की तस्वीर उभरती है - एक तो वो कश्मीर जिसके बारे में कहा गया है कि ज़मीन पर अगर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है.

दूसरी वो तस्वीर जिसमें कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच आधी सदी से चली आ रही अदावत की वजह बना हुआ है और इसी वजह से कश्मीर को दुनिया के बेहद ख़तरनाक क्षेत्रों में से एक माना जाता है.

शनिवार, आठ अक्तूबर को आए भूकंप ने एक बार फिर इंसानों को यह दिखा दिया है कि जिस कश्मीर पर दो देश वर्षों से लड़ रहे हैं क्या उस लड़ाई का वाक़ई कोई मतलब है?

इस विनाशकारी प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर ये साबित कर दिया है कि ज़मीन पर इंसानों की खींची रेखाओं को प्रकृति ने कभी भी स्वीकार नहीं किया है.

सबसे मुश्किल बात ये है कि दोनों ही देश कश्मीर पर दावे के लिए अपनी-अपनी दलीलें देते हैं लेकिन अगर एक आम कश्मीरी की ज़िंदगी पर नज़र डाली जाए तो दोनों ही देशों के दावे खोखले नज़र आते हैं क्योंकि किसी भी देश ने अपने प्रशासन वाले कश्मीर में लोगों का दिल जीतने की कोई ठोस कोशिश नहीं की है.

भारत कहता है कि कश्मीर उसका अभिन्न अंग है और पाकिस्तान का दावा है कि कश्मीर उसकी 'लाइफ़ लाइन' है लेकिन दोनों तरफ़ के कश्मीर में आम लोगों की ज़िंदगी पर नज़र डालने पर सच्चाई ख़ुद ब ख़ुद बोलने लगती है.

जो लोग कश्मीर की ख़ूबसूरती देखने वहाँ जाते हैं वे सिर्फ़ श्रीनगर, पटनीटॉप, या गुलमर्ग की वादियों का ही नज़ारा देखकर तस्वीर बना लेते हैं कि वाक़ई यह बहुत ख़ूबसूरत इलाक़ा है.

मुश्किलें

उन इलाक़ों में बहुत कम ही लोग जाते हैं जहाँ कश्मीर की ज़्यादातर आबादी बसती है यानी वो दुर्गम इलाक़े जहाँ सीढ़ीनुमा पहाड़ियों पर लोग बसते हैं, उनका दिन वहीं शुरू होता है और वहीं ख़त्म हो जाता है.

उनके पास रोज़गार का कोई नियमित साधन नहीं होता और वे सिर्फ़ प्राकृतिक साधनों से ही अपना पेट भरते हैं, मसलन भेड़ पालन करके या फिर टूटी-फूटी खेती करके.

कश्मीरियों की पीड़ा

उनमें से बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिन्होंने किसी शहर का मुँह ही नहीं देखा होता है, दिल्ली तो बहुत दूर है.

मैं जब जम्मू कश्मीर में पत्रकारिता करता था तो ख़ुद ऐसे अनेक इलाक़ों में गया जहाँ पहुँचकर लगता था कि ये इलाक़े बाक़ी दुनिया से हर तरह से कटे हुए हैं, शिक्षा, विकास, लोकतंत्र जैसे शब्दों का तो मानो उनके लिए कोई महत्व ही नहीं है क्योंकि उन्हें किसी ने इनका मतलब न तो समझाया है और न ही उन्होंने इनका मूर्त रूप देखा है.

इसलिए भूकंप की तबाही के बाद सबसे बड़ा सवाल ये है कि भारत सरकार ने एक-एक लाख रुपए का जो मुआवज़ा दिया है क्या उससे उन तबाह हुए लोगों की ज़िंदगी पटरी पर आ सकेगी जिनके पास अब न घर की छत बची है और न रोज़गार.

उनके पास ऐसी कोई नौकरी या नियमित रोज़गार नहीं होता जिससे वे फिर से ये उम्मीद कर सकें कि हर महीने उन्हें कुछ बंधी-बंधाई आय होती रहेगी और वे कुछ समय में अपने संसाधनों को एकजुट करके अपना और परिवार का पेट पाल सकेंगे.

सभी जानते हैं कि कश्मीर में न सिर्फ़ कड़ाके की सर्दी पड़ती है बल्कि कई महीने तक तो बर्फ़ जमी रहती है. ऐसे में हालाँकि विशेष तकनीक वाले घरों की ज़रूरत होती है जो ठंड को बाहर रख सकें लेकिन उन लोगों को तो साधारण मकान भी मयस्सर नहीं होते.

क्या इन लोगों की राय की कोई अहमियत है जो कश्मीर के इन दूरदराज़ के इलाक़ों में रहते हैं जहाँ सरकार की नीतियों या विकास कार्यक्रमों का बिल्कुल मामूली फ़ायदा पहुँच पाता है.

उनके लिए सरकार या लोकतंत्र शब्दों का कोई अर्थ नहीं है और उन्हें वोट की ताक़त का भी शायद ही अंदाज़ा हो क्योंकि इस वोट ने उनकी तक़दीर नहीं बदली है.

सवाल यही उठता है कि भारत और पाकिस्तान ने इन ग़रीब लोगों का दिल जीतने के लिए कुछ ठोस क्यों नहीं किया जिसके आधार पर ये उन इलाक़ों पर अपना-अपना दावा मज़बूत कर सकें.

नियंत्रण रेखा

कश्मीर दरअसल भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा से बँटा हुआ है जहाँ दोनों ही तरफ़ भारी संख्या में सेनाएँ तैनात हैं और सीमा के कई किलोमीटर तक के इलाक़े में आम लोगों को फटकने भी नहीं दिया जाता है.

मैंने ख़ुद सीमावर्ती इलाक़ों में जाकर देखा है कि सीमा के नज़दीक कई किलोमीटर तक की खेतीबाड़ी या सामान्य ज़िंदगी सेना के साए से प्रभावित होती है.

ऐसे में उनकी खेतीबाड़ी तो प्रभावित होती ही है, उन्हें सेना के नियमों के साये में ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ती है. हालाँकि कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मुश्किल की घड़ी में यही सेना उनके काम आती है.

भूकंप से हुई तबाही से उबरने में दोनों देशों के पास एक मौक़ा था कि मुश्किल की घड़ी में एक दूसरे के और नज़दीक आते लेकिन ऐसा हुआ नहीं, हालाँकि लोगों के स्तर पर सहयोग की ज़बरदस्त भावना देखने में आई.

क्या समय को कभी वो दिन देखने मिलेगा जब भारत और पाकिस्तान उद्देश्यहीन अदावत भूलकर उन लोगों की चिंता करेंगे और उनकी भलाई के लिए काम करेंगे जिनसे मिलकर किसी भी देश का वजूद बनता है.

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