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अनदेखा नहीं किया जा सकता पासवान को | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार चुनाव में रामविलास पासवान का स्टैंड बहुतों की समझ में नहीं आ रहा है. पिछले चुनाव साल भर पहले ही हुए थे फिर अब एक और चुनाव और राजनेता इसकी ज़िम्मेदारी पासवान पर ही डाल रहे हैं. लेकिन क्या बिहार की जनता भी उन पर यह ज़िम्मेदारी डाल रही है? उनकी पार्टी की बड़ी टूट के बाद यह मान लिया गया था कि पासवान का अस्तित्व बिहार की राजनीति में हाशिए पर चला गया है. लालू यादव व नीतीश कुमार की गर्जना के बीच उनकी अवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी. लेकिन चुनावों की घोषणा के एक महीने पहले उन्होंने अपनी सशक्त उपस्थिति बिहार के राजनैतिक धरातल पर दर्ज करा दी. उनकी इतनी बड़ी सभाएं तो पिछले चुनावों में भी नहीं हुई थीं. तो क्या मान लें कि बिहार की जनता राजनेताओं से अलग कुछ सोच रही है? पिछले चुनाव के बाद जब पासवान पर दबाव पड़ा कि बिहार में सरकार बनाने के लिए वे या तो लालू यादव का साथ दें या नीतीश कुमार का. तो पासवान ने जवाब दिया कि जो मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाएगा उसका वे समर्थन करेंगे. पर दबाव सरकार बनवाने का था, इस पर पासवान का जवाब था कि वे अपने कदम क्यों पीछे हटाएँ, यदि सरकार बनाना ही महत्वपूर्ण है तो क्यों लालू यादव व नीतीश कुमार मिलकर सरकार नहीं बना लेते? पासवान की राजनीतिक यात्रा भारतीय सामाजिक व्यवस्था में समर्थ वर्ग तो सिद्धांत पर डटे रहने की बात कर सकते हैं पर कमज़ोर वर्ग नहीं, और यही लालू यादव व नीतीश कुमार पासवान के साथ करना चाह रहे थे. बिहार की आज की स्थिति और चुनाव होने के बाद क्या होगा, इसका अंदाज़ा रामविलास की राजनीतिक यात्रा की जानकारी में छिपा है जिसे जानना दिलचस्प होगा. रामविलास पासवान ने अपनी राजनीति कर्पूरी ठाकुर के साथ शुरू की, वे भारत के सबसे कमज़ोर वर्ग से आते हैं. बिहार में कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ों व दलितों में सामाजिक और राजनीतिक चेतना भरने का अभूतपूर्व काम किया. उन दिनों कर्पूरी ठाकुर और रामानंद तिवारी का नाम समाजवादी आंदोलन के शीर्ष नेताओं में था, रामविलास पासवान की समझ और बोलने की क्षमता ने कर्पूरी ठाकुर को प्रभावित किया तथा बाद में कर्पूरी ठाकुर ने रामविलास पासवान पर विशेष ध्यान देना शुरू किया.
रामविलास पासवान बिहार आंदोलन में बहुत ही ज़्यादा सक्रिय थे तथा जेल में कई बार लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी के साथ रहे. उनके राजनीतिक जीवन में चौधरी चरणसिंह, चंद्रशेखर, अजीत सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह का बहुत बड़ा स्थान रहा. संसद का सदस्य रहने के बावजूद उनकी समझ में आया कि यदि भारत की राजनीति में कुछ करना है तो मौज़ूदा राजनीतिक पार्टियों के दायरे से अलग कुछ करना होगा. बाबा साहब अंबेडकर की किताबों ने उन्हें कई रास्ते सुझाए तथा समाज के अंर्तविरोधों को समझने की ताक़त दी. यह वह समय था जब कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में दलितों को संगठित करने के लिए कई संगठन खड़े किए और मायावती का दलित नेत्री के तौर पर उभार हो रहा था. कांशीराम की रणनीति से अलग रामविलास पासवान ने एक अखिल भारतीय संगठन, दलित सेना की नींव डाली, दलित सेना में दलित युवक व युवती शामिल हों इसके लिए उन्होंने अपने सारे साधन झोंक दिए. वे चाहे चौधरी चरण सिंह के साथ रहे हों या विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ उन्होंने दलित सेना का काम कभी नहीं छोड़ा, दलित सेना के नौजवानों को उन्होंने एक खास तरह की ट्रेनिंग भी दिलवानी शुरु की. इसके पीछे पासवान की यह समझ थी कि किसी भी राजनीतिक पार्टी में उनके लिए जगह ज़रूर होती पर वह केवल कोटा भरने जैसी जगह होगी. वे इस स्थिति से निकलना चाहते थे तथा राजनीतिक रूप से एक स्वतंत्र ताक़त बनना चाहते थे. उन्हें मौक़ा विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ मिला जब मंडल कमीशन लागू हुआ. लालू यादव बिहार में मुख्यमंत्री थे. शरद यादव के साथ मिलकर रामविलास पासवान ने मंडल कमीशन के पक्ष में जनजागरण का अभियान छेड़ दिया. मंडल कमीशन के पक्ष में उनके अभियान ने उन्हें भारत की राजनीति में वह जगह दे दी जिसकी उन्हें तलाश थी. लेकिन पासवान ने अपनी भाषा सभ्य और संयत रखी तथा कोशिश की कि समाज के दूसरे वर्ग भी उनके साथ आएँ. वे सभाओं में कहते थे कि एक समय आएगा जब दलित व पिछड़े विश्वनाथ प्रताप सिंह की मूर्तियाँ अपने घर बाहर लगाएँगे. उतार-चढ़ाव बिहार में लालू यादव व नीतीश कुमार के साथ रामविलास पासवान का भी समर्थक वर्ग तैयार होने लगा. यह वह समय था जब लालू यादव ने यह संकेत देना प्रारंभ कर दिया था कि वे ही सर्वोच्च नेता हैं और कोई नहीं.
समाजवादी आंदोलन से निकले और लगातार भाजपा का विरोध करने वाले पासवान को सब 2000 में भाजपा वाले राजग में जाना पड़ा. यह वह समय था जब उनके लिए राजनीतिक रूप से कोई रास्ता नहीं बचा था. इससे पहले जार्ज फर्नांडिस, नीतीश कुमार और शरद यादव राजग में जा चुके थे. यहाँ मुझे याद आ रहा है कि शरद यादव ने जनता दल के नेता पद के चुनाव में जार्ज फर्नांडिस को न केवल हराया बल्कि ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि उन्हें राजग में जाना पड़ा. नीतीश कुमार भी उनके साथ थे, बाद में स्वयं राजनीतिक हालात से मज़बूर होकर शरद यादव भी राजग में शामिल हो गए. आज तीनों जार्ज फर्नांडिस, नीतीश कुमार और शरद यादव राजग के साथ हैं. पर रामविलास पासवान का राजग में जाना बहुतों को खला. उनके ऊपर सत्ता के लिए कहीं भी जाने के आरोप लगे, हालाँकि ऐसे आरोप दूसरों पर नहीं लगे. इसके पीछे का कारण भारत की समाजिक व्यवस्था का ब्राह्मणवादी और सामंतवादी सोच है जो ताक़तवर से कुछ नहीं कहता और कमज़ोर वर्ग पर सारे नियम लाद देता है. राजग से अलग गुजरात दंगों में पासवान को विचलित कर दिया तथा उन्होंने वाजपेयी मंत्रिमंडल से न केवल इस्तीफ़ा दे दिया बल्कि राजग भी छोड़ दिया. उनके ऊपर आरोप लगा कि वे मन चाहा विभाग न मिलने की वजह से मंत्रिमंडल से हटे, गुजरात दंगों का उन्होंने बहाना बनाया.
भारत सरकार का कोई भी मंत्रालय किसी को भी ललचा सकता है. उदाहरण तो ऐसे हैं कि योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनने के लिए बड़े-बड़े नेताओं ने अपना दल छोड़ दिया. पासवान ने पिछला चुनाव लालू यादव के साथ मिलकर लड़ा. चुनाव के बाद दोनों ने एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाए. जिसमें हम नहीं जाना चाहते पर दोनों अलग हो गए. लालू यादव को लगा कि उन्हें पासवान की ज़रूरत नहीं क्योंकि वे सर्वशक्तिशाली नेता हैं तथा पासवान को लगा कि इतने दिनों की मेहनत से बनी ताक़त को जनता के बीच आजमाना चाहिए. बिहार विधानसभा के पिछले चुनावों ने उन्हें यह सुनहरा मौका दे दिया. पिछला विधानसभा चुनाव उन्होंने पूरी ताक़त से लड़ा. जो जीत सकता था उसे टिकट दिया. उनपर बाहुबलियों को टिकट देने का आरोप लगा जो कि बहुत हद तक सच था. उन्होंने चुनावों के दौरान मुस्लिम मुख्यमंत्री का नारा दिया जिसने चुनाव में एक नई गर्मी पैदा कर दी. परिणाम आए और त्रिशंकु विधानसभा बनी. मुसलमान मुख्यमंत्री अब पासवान के सामने अवसर था कि वे अपने ऊपर लगे उस आरोप का जवाब दें कि वे सत्ता के लिए कहीं जा सकते हैं. पासवान को मुख्यमंत्री बनाने या उनके भाई को उपमुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा गया पर पासवान ने केवल एक बात कही कि वे स्वयं मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते बल्कि किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं. वे इस कड़ाई से इस पर डटे कि उनकी पार्टी के सवर्ण विधायक दूर कर नीतीश कुमार से जा मिले. यह सवर्णों और ताक़तवर पिछड़ों का वैसा ही धोखा पासवान के साथ था जैसा दो बार उत्तर प्रदेश में मायावती को मिल चुका था.
लेकिन पासवान अपने कदम से पीछे नहीं हटे. उन्होंने इस आरोप को धो दिया कि वे सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं. इसीलिए आज मुसलमानों के बीच यह बात फैली हुई है कि पासवान ने अपने भाई को तो मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री बनाने की बात नहीं कही वे तो आज भी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने की बात कर रहे हैं. इस बार के चुनाव में पासवान के मुस्लिम दलित गठजोड़ की असली परीक्षा है और शायद यही राजनीति उनके मन में भविष्य की है. उन्होंने अति पिछड़ों को ज़्यादा टिकट दिए हैं. यह वर्ग निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है क्योंकि बाकी दो गठबंधनों ने उसे नज़रंदाज किया है. पासवान की सभाएं जैसे जैसे बढ़ेंगी उन्हें लालू यादव व नीतीश कुमार का उतना ही विरोध झेलना पड़ेगा. पासवान के पक्ष में एक बात यह जाती है कि दलित मुस्लिम के अलावा सवर्ण उन्हें नीतीश कुमार से ज़्यादा स्वीकार्य मानता है. दूसरा यह कि वे इस समय लालू विरोध के प्रतीक बनते जा रहे हैं. आज की तारीख में बिहार चुनाव में कोई नहीं कह सकता कि किसे कितनी सीटें मिलेंगी और सरकार कौन-कौन मिलकर बनाएगा या फिर कोई सरकार नहीं बन सकेगी. लेकिन इस चुनाव के बाद देश की राजनीति में बदलाव आएगा, इतना निश्चित है. पासवान ने मुस्लिम दलित संगठन की बहस शुरू कर दी है तथा कई नए समीकरण बनाने का आधार बना दिया है. पासवान की बात से असहमत हुआ जा सकता है, उनका विरोध भी किया जा सकता है पर उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता. बिहार चुनाव ने देश को एक नया नेता दे दिया है जो है तो दलित वर्ग से लेकिन केवल दलितों का नेता नहीं है. यह बात ताक़तवर तबकों को न पसंद आ रही है और न ही वे मानना चाहते हैं, लेकिन अक्सर समाज में अंर्तद्वंद पैदा होते हैं, उनमें मंथन होता है और उस मंथन से राजनीतिक संभावनाएँ पैदा होती हैं. ऐसी ही संभावना बिहार चुनाव ने पैदा की है. |
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