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रविवार, 05 जून, 2005 को 09:32 GMT तक के समाचार
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नेपाल में वकीलों और पत्रकारों का विरोध
राजा ज्ञानेंद्र
राजा ज्ञानेंद्र ने पहली फ़रवरी को सत्ता अपने हाथों में ले ली थी
नेपाल में वकीलों के संगठन नेपाल बार एसोसिएशन ने सरकार को बर्ख़ास्त करने की मांग की है.

वकीलों ने कहा है कि फ़रवरी में जिस तरह से राजा ज्ञानेंद्र ने सत्ता अपने हाथ में ली थी, वह असंवैधानिक है.

दूसरी ओर राजधानी काठमांडु में पत्रकारों ने एफ़एम रेडियो स्टेशनों से ख़बरों के प्रसारण पर लगी रोक हटाने की माँग के साथ प्रदर्शन किया.

नेपाल बार एसोसिएशन ने अपने दो दिन के वार्षिक सम्मेलन के बाद 17 सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया है.

इस प्रस्ताव को छह सौ से अधिक वकीलों की उपस्थिति में पारित किया गया. सिर्फ़ तीन वकीलों ने इसके ख़िलाफ़ वोट दिया.

प्रस्ताव में कहा गया है कि राजा ज्ञानेंद्र का सत्ता पर क़ाबिज़ होना अपने आपमें संविधान का खुला उल्लंघन था और सरकार को तुरंत बर्ख़ास्त किया जाना चाहिए.

दस हज़ार वकीलों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस संस्था ने सरकार के निर्णयों पर भी आपत्ति जताई है जिसमें भ्रष्टाचार आयोग का गठन, मीडिया सेंसरशिप और राजनीतिक लोगों को बंधक बनाना शामिल है.

नेपाल के राजा अपनी इस कार्रवाई को संविधान की धारा 127 के तहत सही क़रार देते हैं लेकिन इस धारा में कहा गया है कि आपात स्थितियों में यदि राजा सरकार अपने हाथ में लेते हैं तो उसका संसद में अनुमोदन करवाना होगा लेकिन संसद को तीन साल पहले भंग कर दिया गया था.

राजा का तर्क है कि माओवादियों से निपटने के लिए यह क़दम उठाना ज़रुरी था.

प्रदर्शन

राजधानी काठमांडू में दो सौ से अधिक पत्रकारों ने सड़कों पर पोस्टर और बैनर लेकर प्रदर्शन किया.

पत्रकारों का प्रदर्शन
नेपाल नरेश ने मीडिया पर सेंसरशिप लगा रखी है

उन्होंने मांग की है कि देश भर में एफएम रेडियो स्टेशनों पर समाचारों के प्रसारण पर लगी रोक को हटाया जाए.

उन्होंने नेपाल में प्रेस की स्वतंत्रता बहाल करने की मांग की है.

फ़ेडरेशन ऑफ़ नेपलीज़ जर्नलिस्ट (एफ़एनजे) के अध्यक्ष बिष्णु निष्ठुरी ने कहा है कि जब तक जनता के लोकतांत्रिक अधिकार बहाल नहीं किए जाते, उनकी संस्था विरोध प्रदर्शन करती रहेगी.

एफएनजे का कहना है कि सरकार के इस फ़ैसले से सैकड़ों रेडियो पत्रकारों को नौकरी भी गँवानी पड़ी है.

पहली फ़रवरी को सत्ता संभालते ही राजा ज्ञानेंद्र ने नेपाल के 48 एफ़एम रेडियो स्टेशनों से समाचार और समसामयिक चर्चा के किसी भी कार्यक्रम के प्रसारण पर रोक लगा दी थी.

अधिकारियों का कहना था कि एफ़एम रेडियो विद्रोही माओवादियों की गतिविधियों को बढ़ाचढ़ाकर प्रस्तुत कर रहे थे.

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