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ज्ञानेंद्र का "दुस्साहसिक" कदम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कई हफ्तों से नेपाल में हिंसा बढ़ती ही जा रही थी और साथ ही बढ़ रही थी राजनीतिक अस्थिरता. अफवाहों का बाज़ार गर्म था कि शाही परिवार सत्ता अपने हाथ में ले लेगा. लेकिन किसी को भी अंदाज़ा नहीं था कि नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र इस तरह सीधे सत्ता हाथ में लेंगे और लोकतंत्र की स्थापना के लिए तीन साल का समय लेंगे. सिर्फ तीन ही महीने पहले नरेश ने तीसरी बार शेर बहादुर देउबा को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था जबकि इससे पहले वो देउबा को एक बार बर्खास्त भी कर चुके हैं. नरेश ने देउबा को माओवादी विद्रोहियों के साथ शांति वार्ता करने और नेपाल में राष्ट्रीय चुनाव करवाने के लिए कहा था. लेकिन अपने अगले ही संदेश में नरेश ने कहा कि देउबा और उनका मंत्रिमंडल इस तरह का कोई कार्य करने में विफल रहा है. नरेश ने माओवादी शब्द का जिक्र नहीं किया लेकिन विद्रोहियों की तुलना अपराधियों और आतंकवादियों से की. उन्होंने कहा कि देश के सैनिक अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने के लिए पूर्ण रुप से तैयार हैं. नेपाल में हालात ये है कि सरकारी मीडिया से अपनी सारी रिपोर्टे सरकारी सुरक्षा परिषद को दिखाने के लिए कहा गया है. कई जाने माने राजनीतिज्ञों को घर में नज़रबंद कर दिया गया है. फोन लाइनें काट दी गई हैं और काठमांडू एयरपोर्ट बंद कर दिया गया है. देउबा गठबंधन सरकार के प्रमुख घटक कम्युनिस्ट दल के एक नेता का कहना है कि नरेश का यह कदम निरंकुश है और सभी लोकतांत्रिक शक्तियों को इसका विरोध करना चाहिए. कई नेपाली लोग नरेश के इस बयान से ख़फा हैं कि चुने हुए नेताओं ने अपने निजी हितों की ओर ही ध्यान दिया है. नेपाल की सड़कों पर इक्का दुक्का विरोध प्रदर्शन भी हो रहे है. |
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