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रविवार, 29 मई, 2005 को 08:56 GMT तक के समाचार
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क्या है भारत की नेपाल नीति?

राजा ज्ञानेंद्र
राजा ज्ञानेंद्र लगातार लोकतंत्र बहाली का आश्वासन दे रहे हैं
भारत सरकार नेपाल में प्रजातंत्र की बहाली चाहती है, वह वहाँ की माओवादी समस्या से निपटने के लिए राजशाही और राजनीतिक दलों की मदद भी करना चाहती है.

कम से कम कागज़ पर तो भारत की नेपाल नीति कुछ ऐसी ही नज़र आती है.

पर एक फरवरी के बाद, जब राजा ज्ञानेंद्र ने नेपाल में आपातकाल लागू कर वहाँ की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया था, तब से भारत की नेपाल नीति पर नज़र डालें तो उसका असमंजस साफ़ नज़र आता है.

नेपाल की स्थिति के मद्देनज़र भारत ने सार्क शिखर बैठक में जाने से इंकार किया, लोकतंत्र की बहाली की माँग पर रुख़ कड़ा किया पर अप्रैल के अंत तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने न केवल अपना रुख़ बदला, बल्कि राजा से मुलाकात की और नेपाल की सेना की मदद भी शुरू कर दी गई.

नेपाल में सात राजनीतिक दलों के नेता जो कि वहाँ की प्रतिनिधि सभा के 95 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं, से भारतीय विदेशमंत्री ने मुलाकात की.

इस बाबत नेपाली कांग्रेस के नेता, मथुरा प्रसाद घिमेरे कहते हैं, “हमारी जो बात नटवर जी के साथ हुई थी, उसमें हमने काफ़ी रुचि लेते हुए नेपाल सरकार को ख़तरनाक शस्त्र दिए जाने के बारे में पूछा तो उन्होंने हमें आशवस्त किया कि वो ऐसा कुछ भी नहीं है औऱ भारत नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना को लेकर प्रतिबद्ध है.”

माओवादियों का सवाल

फिर ख़बरें आईं कि भारत सरकार जिन्हें आतंकवादी कहती है यानी माओवादी, उनके एक प्रतिनिधि ने यूपीए सरकार का समर्थन कर रहे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव से मुलाकात की.

 भारत सरकार को यह साफ़ करना होगा कि वो नेपाल सरकार को विश्वास में लेकर माओवादियों सो बात कर रही है या फिर किसी ओर मक़सद से

यानी सरकार का हर कदम भ्रम पैदा करने वाला रहा. नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार और समय साप्ताहिक के संपादक युवराज घिमेरे मानते हैं कि वार्ता अपने आपमें एक बड़ी पहल है क्योंकि वार्ता के बिना किसी नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता.

वे कहते हैं, “हालांकि भारत सरकार को यह साफ़ करना होगा कि वो नेपाल सरकार को विश्वास में लेकर माओवादियों सो बात कर रही है या फिर किसी ओर मक़सद से.”

इस बीच नेपाल सेना ने एक टेप भी जारी किया है जिसमें माओवादियों के भारत से संबंधों का जिक्र है. विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के समाचार नेपाल नरेश के हाथ मजबूत करते हैं, भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम कर सकते हैं और यह दोनों देशों के बीच भरोसे की जगह संदेह की भावना बढ़ाएगा.

दक्षिण एशिया मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर एसडी मुनि इस असमंजस को कमज़ोर विदेश नीति का प्रतीक मानते हैं. उनका कहना है, "एक ऐसे समय में, जब अंतरराष्ट्रीय ताकतें भारत के नेपाल के प्रति कड़क रुख़ का साथ दे रही हैं, तब भारत स्पष्ट नेपाल नीति क्यों नहीं रख सकता."

नेपाल के माओवादी
माओवादी लंबे समय से लोकतंत्र बहाली के लिए संघर्षरत हैं

वो बताते हैं, “मैं हिंसा का सहारा लेने वाले माओवादियों को भी लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाला मानता हूँ और इसलिए नेपाल में जो भी जनतांत्रिक शक्तियाँ हैं, उनको दरकिनार करके नहीं चला जा सकता. माओवादियों या राजा, किसी को भी छोड़कर नेपाल नीति चल ही नहीं सकती. ऐसे में जितने भी धड़े हैं, सभी से संपर्क रखना पड़ेगा और सबका मूल्यांकन भी करना होगा.”

भारत की नेपाल नीति के बारे में वे कहते हैं कि भारत को इस बात की स्पष्ट घोषणा करनी चाहिए कि भारत सभी से संबंध रखेगा और राजा से भी कहना चाहिए कि वो सभी को साथ लेकर चले ताकि पूरे मसले का राजनीतिक हल खोजा जा सके.

वो बताते हैं, “नेपाल के बारे में भारत सरकार की एक स्पष्ट नीति होनी चाहिए जिसपर सरकार अडिग रहे और मैं देख रहा हूँ कि इस सरकार ने ऐसा नहीं किया जिसे मैं एक कमज़ोरी के रूप में देखता हूँ.”

यथार्थ

एक यथार्थ यह भी है कि जिस तरह के समीकरण नेपाल में बन रहे हैं, भारत सरकार सभी पक्षों से बातचीत किए बिना नहीं रह सकती, फिर चाहे वे माओवादी ही क्यों न हों.

 सरकार अभी तक यह तय नहीं कर पा रही है कि उसे किसका साथ देना है. ऐसा लगता है कि अगर ये राजा का साथ नहीं देते हैं तो प्रकारान्तर में माओवादियों को फ़ायदा हो सकता है. राजा के रुख़ से भी सरकार को मुश्किल हो रही है.
आनंद स्वरुप वर्मा

इस बाबत नेपाल मामलों के जानकार आनंद स्वरूप वर्मा कहते हैं, “सरकार अभी तक यह तय नहीं कर पा रही है कि उसे किसका साथ देना है. ऐसा लगता है कि अगर ये राजा का साथ नहीं देते हैं तो प्रकारान्तर में माओवादियों को फ़ायदा हो सकता है. राजा के रुख़ से भी सरकार को मुश्किल हो रही है क्योंकि राजा ने भारत के राजदूत को अभी एक पत्र भेजकर कहा कि भारत नेपाल के आंतरिक मामलों में दखल न दे. ऐसी कई चीज़ें हैं जिससे भारत सरकार के लिए असमंजस की स्थिति बनी हुई है.”

यदि भारत की नेपाल नीति को देखें तो प्रतीत होता है कि इसका रंग रूप बनता बदलता रहता है. कभी विदेश मंत्रालय तो कभी प्रतिरक्षा मंत्रालय, कभी सेना तो कभी वाणिज्य जगत की इच्छा या फिर शाही परिवार के भारतीय संपर्कों का दबाव, ये सभी नीति निर्धारण में हावी रहते हैं.

नटवर सिंह
भारत के रुख़ में विशेषज्ञों को एक अस्पष्टता नज़र आती है

प्रोफ़ेसर एसडी मुनि तो ऐसा ही मानते हैं. वो कहते हैं, “नेपाल को लोकतंत्र की स्थापना को लेकर भारत सरकार का दिल तो हो सकता है कि साफ़ हो पर दिमाग साफ़ नहीं है. मेरा मानना है कि अमरीका का भी इसमें प्रभाव होगा क्योंकि अमरीका राजा को उदारता के साथ देखता है.”

वे कहते हैं, “इसकी वजह यह भी हो सकती है कि अमरीका के लिए लोकतंत्र क़ैद में है और आतंकवाद पहले और इसीलिए अमरीका कभी नहीं चाहेगा कि लोकतंत्र के नाम पर आतंकवाद का मुद्दा कमज़ोर पड़े.”

भारत सरकार को अब यह तय करना है कि नेपाल पर उसका रुख़ क्या है और किस रास्ते पर चलकर वो नेपाल से लगी अपनी एक 1147 किलोमीटर की सीमा को सुरक्षित रख सकता है और इस सामरिक रूप से महत्वपूर्ण देश से संबंधों को मधुर बनाए रख सकता है.

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