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नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र का जीवन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र ने सन् 2001 में एक बड़े ही नाटकीय घटनाक्रम में नेपाल की राजगद्दी पर उस समय बैठे थे जब युवराज दीपेंद्र ने राजपरिवार के कई सदस्यों की हत्या कर डाली थी. जब ज्ञानेंद्र राजा बने तो नेपाल में चारों ओर माओवादी हिंसा का बोलबाला था. माओवादी नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र के स्थान पर साम्यवादी गणतंत्र की स्थापना करना चाहते थे. ज्ञानेंद्र के नरेश बनते ही ही माओवादियों ने हिंसक घटनाओं में बढ़ोतरी की जिसके जवाब में ज्ञानेंद्र ने सरकार और पूरे देश पर अपना नियंत्रण कसना शुरु कर दिया. सिर्फ एक साल बाद अक्तूबर 2002 में ज्ञानेंद्र ने निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर दिया और उसके बाद सिलसिला शुरु हुआ प्रधानमंत्रियों की नियुक्तियों का. माओवादियों के साथ शांति वार्ता की कोशिश हुई और एक बार इसे शुरु भी किया गया. लेकिन वार्ताओं के असफल होते ही ज्ञानेंद्र ने देश में आपातकाल लगा दिया और सैनिकों को माओवादियों से निपटने की खुली छूट दे दी. सत्ता सीधे अपने हाथ ज्ञानेंद्र के शासनकाल के दौरान माओवादी हिंसा में कोई कमी नहीं आई और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले लगातार बढ़ते ही रहे. आम हड़तालें होती रहीं और सुरक्षा बलों के साथ खूनी झड़पें भी. 1996 में शुरु हुई माओवादी हिंसा में अब तक दस हज़ार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और कई इलाकों में नियंत्रण पूरी तरह माओवादियों के हाथ में है. हालांकि ज्ञानेंद्र लगातार इस बात का खंडन करते रहे कि सत्ता उन्होंने अपने हाथ में ले ली है और सारे फैसले वही कर रहे हैं. लेकिन अब ज्ञानेंद्र ने सरकार को बर्खास्त कर दिया है और पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है. गंभीर संकट ज्ञानेंद्र का कहना है कि चूंकि मंत्रिमंडल शांति स्थापित करने और चुनावों की तैयारी का अपना काम पूरा नहीं कर सकी है इसलिए उसे बर्खास्त किया गया है. जानकारों का मानना है कि 18 वी शताब्दी के मध्य में राष्ट्र का स्वरुप लेने वाला नेपाल इस समय बड़े ही गंभीर राजनीतिक संकट से गुजर रहा है. कुछ जानकार यहां तक कहते हैं कि आने वाले समय में माओवादी विद्रोही, राजशाही को उखाड़ फेंक सकते हैं. दूसरी तरफ राजशाही के समर्थक हमेशा से कहते रहे हैं कि नेपाल नरेश खुद सत्ता हाथ में लें और संकट से सीधे निपटें. चार साल तक राजा की गद्दी संभालने के बाद अब ज्ञानेंद्र ने ठीक यही किया है. नेपाल में 1991 में पूर्ण राजतंत्र का खात्मा हुआ था. इसके बाद ऐसा दूसरी बार हुआ है जब किसी राजा ने सत्ता अपने हाथ में ले ली हो. अब माना जा रहा है कि कविता प्रेमी 58 वर्षीय ज्ञानेंद्र शांति स्थापना के लिए प्रयास करेंगे और माओवादियों समेत अपहरण करने वाले अपराधियों के साथ सख्ती से निपटेंगे. हालांकि ज्ञानेंद्र ने कहा है कि उनका पूरा विश्वास लोकतंत्र और बहुदलीय व्यवस्था में है. लेकिन कुछ जानकारों का मानना है कि ज्ञानेंद्र का लोकतंत्र में उतना भरोसा नहीं है जितना वो जताते हैं. ऐसे जानकार मानते हैं कि ये समय ज्ञानेंद्र के लिए परीक्षा की घड़ी होगी. पूरी दुनिया अब देखेगी कि ज्ञानेंद्र माओवादी विद्रोहियों को वार्ता की मेज पर कैसे लाते हैं और चुनाव कब करवाते हैं. व्यवसायी नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र का जन्म सात जुलाई 1947 को हुआ था. पेशे से व्यवसायी रहे ज्ञानेंद्र की शिक्षा दीक्षा भारत और नेपाल में हुई. शादीशुदा ज्ञानेंद्र के दो बच्चे हैं और नेपाल में संरक्षण कार्य के क्षेत्र में उनका काफी नाम भी है. नेपाल में पर्यटन को बढ़ावा देने में भी नेपाल नरेश का काफी योगदान रहा है और काठमांडू में उनका एक होटल भी है. इसके अलावा उनकी सिगरेट की फैक्ट्री और चाय के बागान भी हैं. |
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