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पर्दे पर नहीं उठेगा तंबाकू का धुआँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कभी फ़िल्मी पर्दे पर एक गीत सुनने को मिलता था, हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया. पर अब ऐसा संभव नहीं होगा. अब एक अगस्त से सिगरेट फूँकते नायकों-खलनायकों को आप छोटे और बड़े पर्दे पर नहीं देख सकेंगे. सरकार का कहना है कि विज्ञापनों पर रोक और सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान पर रोक जैसे क़दमों के बाद ये क़दम भारत में धुँए में अपनी ज़िदगी ख़त्म करते लोगों की जान बचाने के लिए उठाया जा रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के सलाहकार और भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के हृदय रोग विभाग के प्रमुख श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, “भारत में प्रतिवर्ष तकरीबन आठ से नौ लाख मौतें तंबाकू के कारण होती हैं और 20 साल के अंदर यह दोगुनी हो जाएंगी. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक धूम्रपान भारत में सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है.” आर्थिक पहलू धूम्रपान का एक आर्थिक पहलू भी है. दिल की बीमारियों, केंसर और फ़ेफ़ड़े की बीमारियों पर भारत ने 2001-02 में 30 हज़ार करोड़ से ज़्यादा खर्च किया है जो कि तंबाकू उद्योग से होने वाली कमाई से कहीं ज़्यादा है. मगर तंबाकू उद्योग का पक्ष जानने की कोशिश करें तो आप पाएँगे कि वे इस ओर इशारा करते हैं कि ये एक बहुत बड़ा उद्योग है जो कई लोगों को रोज़गार देता है. भारतीय तंबाकू उद्योग के निदेशक उदयन लाल कहते हैं कि तंबाकू उद्योग पर रोक लगाने से पहले सरकार को इस उद्योग में काम कर रहे लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए. उदयन लाल कहते हैं, “भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तंबाकू उत्पादक देश है. तंबाकू उद्योग पर तकरीबन तीन करोड़ 60 लाख लोग आश्रित हैं जिनमें महिलाएँ, मजदूर और आदिवासी समुदाय भी शामिल है. हम तंबाकू उत्पादों के बहुत बड़े निर्यातक भी हैं और पिछले साल हमने 300 करोड़ का माल निर्यात किया.” पर्दा-बेपर्दा आंकड़ों की दुनिया से निकलें और फ़िल्म जगत की ओर रुख़ करें तो सरकार के इस निर्णय पर प्रतिक्रिया तीखी ही रही. मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल तंबाकू सेवन के दुष्परिणामों को तो स्वीकारते हैं पर सरकार के निर्णय को सही नहीं मानते. वो कहते हैं, “अगर सरकार कुछ करना चाहती है तो उसे स्रोत की ओर बढ़ना चाहिए. फ़िल्मों में अभिनेताओं को सिगरेट पीते हुए दिखाना तो बहुत छोटी चीज़ है.” उधर समाजशास्त्रियों का कहना है कि फ़िल्मों में और छोटे पर्दे पर दिखाए जाने वाले दृश्य युवाओं पर बहुत असर डालते हैं. कितने ही युवाओं ने अपने फ़िल्मी सितारों को देखते हुए सिगरेट पीना शुरू किया. तमिल फ़िल्मों के सुपरस्टार, रजनीकांत तो कभी भी बिना सिगरेट के नज़र ही नहीं आते. इस बारे में फ़िल्म अभिनेता जैकी श्राफ़ कहते हैं, “जो सिनेप्रेमी फ़िल्मों के पर्दे पर अपने कलाकारों को सिगरेट पीता हुआ देख कर सिगरेट पीने लगते हैं, वो गधे होते हैं. पर्दे पर मर्डर होता दिखाया जाएगा तो वो मर्डर करेंगे क्या.'' उनका कहना है कि फ़िल्म तो एक काल्पनिक माध्यम है. अगर इससे ऐसा प्रभाव पड़ता है तो फ़िल्में बनाना बंद कर देना चाहिए. शराब और तंबाकू सेवन के विज्ञापनों पर सरकार ने रोक लगाई तो कई बड़े ब्राँडों ने अपने दूसरे उत्पादों की आड़ लेकर विज्ञापन शुरू कर दिया. यानी प्रतिबंध लगाना आसान है पर इसको लागू करना आसान नहीं. नुक़सान इससे नुक़सान तो विज्ञापन एजेंसियाँ भी झेलती हैं क्योंकि सबसे मालदार विज्ञापनकर्ता तंबाकू और शराब उद्योग से जुड़े हुए हैं. विज्ञापन जगत के जाने-माने नाम प्रसून जोशी कहते हैं कि इस प्रतिबंध का सृजनात्मकता पर असर पड़ेगा. वो बताते हैं, “कला तो समाज का दर्पण है. इसे सीमाओं में बाँधना ग़लत है. अगर इसमें प्रतिबंध लगे तो फिर यह दर्पण नहीं रह जाएगा. फ़िल्में किसी को सिगरेट पीने के लिए उकसा नहीं रहीं.” वहीं युवा वर्ग, जिन्हें ध्यान में रखकर सरकार ये क़दम उठा रही है, उनका कहना है कि फ़िल्में तो समाज का दर्पण हैं और लतों को यूँ दूर नहीं किया जा सकता. पर डॉ श्रीनाथ रेड्डी को आशा है कि धीरे ही सही पर समाज में बदलाव की कोशिशें कारगर होंगी. |
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