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रविवार, 27 फ़रवरी, 2005 को 04:57 GMT तक के समाचार
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धूम्रपान पर ऐतिहासिक समझौता
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इसकी 57 देशों ने पुष्टि की है
दुनिया में पहली बार कई साल के विचार-विमर्श और तंबाकू उद्योग के ज़ोरदार विरोध के बावजूद धूम्रपान विरोधी संधि रविवार से लागू हो गई है.

इसकी 57 देशों ने पुष्टि की है.

पाँच साल के भीतर इन देशों को तंबाकू के विज्ञापन, इसको बढावा देने और इसके प्रयोजनों पर प्रतिबंध लगाना होगा.

लेकिन बीबीसी संवाददाता का कहना है कि देखना ये है कि ये संधि कितनी कारगर साबित होती है क्योंकि अमरीका समेत 51 अन्य देशों ने इसकी पुष्टि नहीं की है.

पचास लाख की मृत्यु

बीबीसी संवाददाता अनिया लिक्टारोविज़ के अनुसार हर साल धूम्रपान संबंधित बिमारियों से पूरी दुनिया में पचास लाख लोग मरते है.

अगर इस बारे में कुछ नहीं किया गया तो सन दो हज़ार बीस तक तम्बाकू से मरने वालो की संख्या कम से कम दोगुनी हो जाएगी.

 एक अंतरराष्ट्रीय क़ानून की ज़रूरत इसीलिए पड़ी क्योंकि तंबाकू के कारण इतनी संख्या में लोग मारे जा रहे थे और दुनिया इस बात से भयभीत थी
डॉक्टर डगलस बेचर

इस आशंका की पृष्ठभूमि में और हर दिन धूम्रपान से होती बिमारी पर बढ़ते ख़र्च को देखते हुए विश्व स्वास्थ संगठन ने तंबाकू नियंत्रण की रुपरेखा तैयार की जिसे अंग्रेज़ी में फ्रेमवर्क कनवेनशन औन टोबैको कंट्रोल कहा जा रहा है.

इस रूपरेखा के तहत देशो को तंबाकू नियंत्रण के कड़े नियम लागू करने पर बाध्य होना पड़ेगा.

इस रूपरेखा को तैयार करने में भूमिका निभाने वाले डाक्टर डगलस बेचर का कहना था, "एक अंतरराष्ट्रीय क़ानून की ज़रूरत इसीलिए पड़ी क्योंकि तंबाकू के कारण इतनी संख्या में लोग मारे जा रहे थे और दुनिया इस बात से भयभीत थी."

जिन 57 देशों ने संधि की पुष्टि की है वे वैसे ही सिगरेट के पैकेट बेच पाएँगे जिन पर स्वास्थ चेतावनी लिखी होगी.

पाँच सालो के भीतर उन्हें विज्ञापनो, प्रचार और प्रायोजनों पर रोक लगाने के साथ-साथ सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान निषेध करना पड़ेगा.

तंबाकू उद्योग ने पहले तो इस पहल का विरोध किया था पर ब्रिटिश एमेरिकन टोबेको के डॉक्टर क्रिस प्रोकटर का कहना है कि ये एक अच्छा कदम है.

उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इस रूपरेखा को लेकर काफ़ी उत्साह है और ब्रिटिश एमेरिकन टोबेको के सदस्य के नाते वे विश्व स्वास्थ संगठन के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार हैं.

लेकिन इसका कितना असर होगा?

ब्रिटेन, भारत, कनाडा और आस्ट्रेलिया ने तो इस रूपरेखा पर सहमति व्यक्त की है पर अमरीका जैसे बड़े देश ने अपनी प्रतिबद्धता नहीं जताई है.

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