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'सिगरेट के दृश्यों पर पाबंदी कोई हल नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरी समझ में नहीं आता कि भारत सरकार क्या चाहती है. क्या सिगरेट पीने के दृश्यों को सिनेमा और टेलीविज़न निकाल देने भर से सभी समस्याएँ अपने आप सुलझ जाएंगी. अगर आप समस्या को सुलझाना चाहते हैं तो जूझिए सिगरेट निर्माताओं से, उनके ढाँचे को नष्ट करिए. मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि फ़िल्म बिरादरी के लोग ग़ैरज़िम्मेदार नहीं हैं. मैं सिगरेट नहीं पीता लेकिन मैं अपनी सोच थोपता भी नहीं हूँ. मेरा मानना है कि ऐसे नियम बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, लोगों को ज़िम्मेदार बनाने से ही समस्या हल हो सकती है. यह तरीका नहीं है लोगों को ज़िम्मेदार बनाने का. लोग दिल से नहीं बदलेंगे, झूठ का सहारा लेंगे. मैं यह मानता हूँ कि नौजवानों पर ऐसी बातों का असर होता है लेकिन अगर आप अभिनेताओं और निर्देशकों से निजी रूप से कहें कि वे ऐसे दृश्य शामिल न करें तो उसका ज्यादा फ़ायदा होगा. जब सुषमा स्वराज मंत्री थीं तो उन्होंने फ़िल्म उद्योग से ऐसा अनुरोध किया था. उस पर लोगों ने ध्यान दिया था लेकिन आपने बिना बात के फ़िल्म उद्योग के लोगों को उत्तेजित कर दिया है. यह बिल्कुल बच्चों वाली हरकत है. मेरा ऐसा अनुभव रहा है कि लोग यदि अपने आप किसी बात को अपनाते हैं तो वह ज़्यादा प्रभावी होती है. यदि सरकार क़ानून बनाती है तो वह प्रभावी नहीं होता है. (रेणु अगाल से बातचीत पर आधारित) |
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