| धूम्रपान न करने वाले ज़्यादा जीते हैं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक शोध में लगभग 35 हज़ार डॉक्टरों की पचास साल की धूम्रपान की आदतों का अध्ययन किया गया, जो वर्ष 1900 से 1930 के बीच पैदा हुए थे. मूल नतीजों से पहले हुए छोटे शोधों के निष्कर्ष की पुष्टि हुई - यही कि सिगरेट पीने से फेफड़ों का कैंसर होता है. लेकिन इस शोध में, जिसमें इन डॉक्टरों के स्वास्थ्य पर परीक्षण चलते रहे, पता चला कि धूम्रपान का ख़तरा उससे कह़ी ज़्यादा है जैसा पहले माना जाता था. जब से यह काम शुरू किया गया, तब से लेकर अब तक, तंबाकू दुनिया में दस करोड़ लोगों की जान ले चुका है. जीवन भर सिगरेट पीने वाले, न पीने वालों के मुकाबले, दस साल कम जीते हैं और उनमें से आधे या तीन चौथाई अपनी इसी आदत के कारण मारे गए. अच्छी ख़बर भी यह पहली बार है कि तंबाकू का पूरे जीवनकाल में क्या असर होता है, इसको मापा गया है और एक अच्छी ख़बर भी है. वो यह कि, साठ साल की उम्र में भी सिगरेट पीना छोड़ देने से जीवन के तीन साल बढ़ाए जा सकते हैं. और तीस साल में सिगरेट छोड़ देने से उसके द्वारा हुए नुकसान की भरपाई भी हो जाती है. पचास साल पहले इस शोध के प्रारंभिक नतीजे सुनकर बहुत से लोगों ने सिगरेट छोड़ भी दी थी. और अब शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इन नए आंकड़ों को सुनकर लोगों पर वैसा ही असर होगा, ख़ासकर विकासशील देशों में जहाँ धूम्रपान बढ़ रहा है. |
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