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'जाँच एजेंसियाँ पूरी तरह स्वतंत्र हों' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के जाने-माने विधिवेत्ता प्रशांत भूषण का मानना है कि देश भ्रष्टाचार जैसी समस्या से तब तक नहीं निपट सकता, जब तक कि दोषियों को सज़ा देने वाले और मामलों की जाँच करने वाले संस्थानों को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त नहीं किया जाएगा. रविवार को दिल्ली में 'आपकी बात-बीबीसी के साथ', कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने बताया कि सरकारी मुलाज़िमों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से पहले उनके उच्चस्थ अधिकारियों की स्वीकृति लेने का प्रावधान असंवैधानिक है. उन्होंने बताया, “यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन तो है ही, साथ ही ऐसा मानना कि उच्चस्थ अधिकारी अपने ही विभाग के किसी अधिकारी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की इजाज़त दे देंगे, बिल्कुल ग़लत है क्योंकि अधिकतर मामलों में तमाम अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं और ऐसे में वो अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें बचाने की कोशिश करते हैं.” इस कार्यक्रम में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों पर सवाल उठाया धनंजय दुबे ने. धनंजय, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानेवाले इंजीनियर सत्येंद्र कुमार दुबे के छोटे भाई हैं और फिलहाल बनारस विश्वविद्यालय में बीटेक कर रहे हैं. वो बताते हैं कि सरकार की ओर से अब तक यह भी स्पष्ट नहीं हो सका है कि सत्येंद्र का नाम प्रधानमंत्री कार्यालय से किस तरह सार्वजनिक हो गया. ग़ौरतलब है कि सत्येंद्र दुबे ने स्वर्णिम चतुर्भुज राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना में व्याप्त भ्रष्टाचार की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय से की थी जहाँ से बाद में उनका नाम सार्वजनिक हो गया था और 27 नवंबर, 2003 को उनकी हत्या कर दी गई थी. आस भी है प्रशांत मानते हैं कि भ्रष्टाचार से लड़ना काफ़ी कठिन हो गया है और इसके लिए आपको सभी मोर्चों पर लड़ाई लड़नी होगी पर वो इसे लेकर निराश न होने की सलाह देते हैं. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “देश में तमाम ऐसे जन-आंदोलन शुरू हुए हैं जिनको काफ़ी सफ़लता मिली है. व्हिसिल ब्लोअर्स प्रावधान और देश के 10 से भी ज़्यादा राज्यों में सूचना के अधिकार का कानून इस दिशा में एक बड़ी सफ़लता है.” पर क्या कारण है कि भ्रष्टाचार में लिप्त नेता, तमाम आरोपों के बावजूद चुनाव जीतते हैं और विधायिका का हिस्सा बनते हैं, एक श्रोता के इस सवाल पर उन्होंने कहा, “समूचा चुनाव तंत्र ख़ुद इतना ख़राब हो चुका है कि उसके भरोसे किसी नतीजे तक पहुँचना संभव नहीं है.” “आपके सामने भ्रष्ट और ईमानदार का विकल्प नहीं होता है. चुनाव लड़ने का सामर्थ्य तो केवल भ्रष्टों के पास बचा है और आपके सामने हर हाल में विकल्प भ्रष्ट हो होता है. ऐसे में किसे चुने और किसे नहीं, लोगों के लिए यह तय कर पाना कठिन होता है.” प्रशांत मानते हैं कि इसके लिए एक सशक्त आंदोलन की दरकार तो है ही, साथ ही उन सभी साधनों का इस्तेमाल भी करना ही पड़ेगा, जिनके ज़रिए हम अपनी लड़ाई को मज़बूत बना सकते हैं. |
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