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सोमवार, 18 अप्रैल, 2005 को 14:24 GMT तक के समाचार
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नज़रिया भी बदला, ज़मीनी हक़ीकत भी

मुशर्रफ़ और मनमोहन सिंह
दोनों नेता एक दूसरे की तारीफ़ कर रहे हैं
चार साल देखते ही देखते बीत गए. इन चार सालों में नज़र बदली है, नज़रिया बदला है और ज़मीन की सच्चाई बदली है.

चार साल पहले जो एक ख़्वाब था, जो आदर्शवाद था या एक बुद्धिजीवी सोच थी कि बहुत हो गया अब कोई समझौता कर लो, लेकिन उसमें शायद इतनी भावनाएँ, भावुकताएँ नहीं थीं.

जैसा कि परवेज़ मुशर्रफ़ साहब ने ख़ुद कहा कि उन्हें अहसास है कि चार साल पहले वे भी एक अलग व्यक्ति थे. तब उनके ज़हन में ग़ुस्सा था, शक था लेकिन अब वो बदल गया है.

एक बात उन्होंने और बताई कि मनमोहन सिंह से मिलते-मिलते उनके लिए उनका व्यक्तिगत रिश्ता भी बन गया है. यही बात मनमोहन सिंह ने भी बाद में कही. तो एक वो व्यक्ति जो कारगिल कर चुका है, जिसके साथ हमारे इतिहास का एक पन्ना जुड़ा हुआ है, इसके बारे में हमारे प्रधानमंत्री इस तरह की बात कह रहे हैं. और ख़ुद परवेज़ मुशर्रफ़ उनकी तारीफ़ कर रहे हैं.

ये तो ख़ैर एक भावनात्मक बात है और दो देशों के रिश्तों में भावनाओं की बहुत जगह नहीं होती लेकिन परवेज़ मुशर्रफ़ ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात और कही कि ग्यारह सितंबर के बाद दुनिया बदल गई है.

तो क्या बदली हुई दुनिया ने दोनों देशों को बदलने पर मजबूर किया है, अगर इस पर ग़ौर करें तो दुनिया तो कोरिया और चीन के लिए भी बदल गई है लेकिन हर जगह दुनिया बदलने के बाद लोग नहीं बदलते. लेकिन इस मामले में पाकिस्तान के साथ हम भी बदले हैं.

सैन्य हल का जो विकल्प था वह अब हमारे सामने से हट गया है. परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा कि अगर इस माहौल में हम कोई हल नहीं निकालते तो आने वाले दस-पंद्रह साल में जो पीढ़ी आएगी वो हमें माफ़ नहीं करेगी.

ज़मीन की आवाज़

दोनों ओर के जो लोग मिल रहे हैं उससे भी बहुत सरकारों को बदलना पड़ रहा है.

ये आवाज़ ज़मीन से उठ रही है और दोनों सरकारें उसे सुन रही हैं. एक ज़माना था जब उसमें ग़ुस्सा और ज़हर भरा होता था. लोग लड़ाई के लिए कूद पड़ते थे. अब आप इसे क्रिकेट की कूटनीति कहिए या कुछ भी कहिए, लोगों ने एक दूसरे को देख लिया है.

आज आप पंजाब जाकर देखिए. लोग कह रहे हैं कि पंजाब के साथ भेदभाव हो रहा है, कश्मीर के लोगों को बिना वीज़ा के उस पार जा रहे हैं जबकि दो पंजाब के लोग बस में बैठकर उस तरह से नहीं मिल पा रहे हैं.

इसलिए मैं कहता रहा हूँ कि जब बर्फ़ पिघलेगी तो सिर्फ़ कश्मीर में नहीं पिघलेगी वो नीचे गुजरात के समुद्र तक पिघलेगी.

कश्मीर के लोग

जहाँ तक कश्मीर के लोगों का सवाल है तो एक बात तय है कि कश्मीर का मसला बिना कश्मीरियों को साथ लिए हल नहीं किया जा सकता. उनको सबको शामिल करना होगा.

इस बार परवेज़ मुशर्रफ़ ने एक और बड़ी बात कह दी. उन्होंने कहा है कि जम्मू कश्मीर में जो मुफ़्ती मोहम्मद की सरकार है वो भी एक हद तक कश्मीरियों की राय का प्रतिनिधित्व करती है.

देखिए कि चीज़ें किस तरह बदल रही हैं. नज़रिया कितना बदल रहा है. दो साल पहले यही लोग कहते थे कि वहाँ होने वाले चुनाव दिखावा हैं और फ़र्जी हैं वही अब कह रहे हैं कि वे एक हद तक जनता की आवाज़ है.

तो सरकारों को ऐसा माहौल बनाया जाए जिससे सब लोग साथ आ जाएँ.

बाहरी दबाव

इस मामले में अमरीकी दबाव की भी बात होती है.

लेकिन इस मामले के बारे में परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा कि पता नहीं लोग क्यों कहते हैं कि जब अमरीका को सर्दी होती है तो हमें छींक आती है. ऐसा कुछ नहीं है.

देखिए ऐसा कुछ भी नहीं है जब अमरीका अपने राष्ट्रहित के लिए चीख़ता है तो दुनिया को कुछ न कुछ सुनना पड़ता है.

ये अपने आपमें एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि हम इतने कमज़ोर हैं कि अमरीका के दबाव में सुनना पड़ता है. कोंडालिज़ा राइस ने कहा तो था कि ईरान से आने वाली पाइप लाइन बंद कीजिए लेकिन कौन माना. जहाँ तक अपने राष्ट्रीय हित का सवाल है तो हम वहीं करेंगे जो हमारे लिए ठीक होगा.

भविष्य

मनमोहन सिंह भी कह रहे थे कि अब ज़माना बदल गया है और अब हम पश्चिम की चौखट पर फ़रियादी नहीं हैं.

ये नहीं भूलना चाहिए कि हम स्वतंत्र देश हैं, परमाणु शक्ति हैं. इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए.

भारत और पाकिस्तान ने मिलकर अब दूसरे विश्वयुद्ध के बाद चली आ रही व्यवस्था को पलट दिया है, उलट दिया है.

भविष्य की यदि बात करें तो दोनों देशों के बीच का भविष्य अभी बना नहीं है.

उसमें अभी वक़्त लगेगा.

अभी कोई दरवाज़ा नहीं खुला है सिर्फ़ एक खिड़की खुली है...लेकिन खुली तो है.

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