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मंगलवार, 15 मार्च, 2005 को 09:42 GMT तक के समाचार
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'बिहार-झारखंड की यात्रा कभी नहीं भूलूंगा'

जेम्स सेल्स
जेम्ल सेल्स बिहार और झारखंड में बीबीसी टीम के एक सदस्य थे
हाल ही में मुझे बीबीसी हिंदी की ऑनलाइन टीम के साथ विधानसभा चुनावों के दौरान बिहार और झारखंड राज्यों का दौरा करने का मौक़ा मिला.

यूं तो मैं पहले भी भारत आ चुका था, लेकिन एक बार फिर से भारत को समझने और एक नए राज्य को देखने को लेकर मैं काफ़ी रोमांचित था.

हवाईयात्रा के दौरान दोनों राज्यों की भिन्नता देखकर मैं चकित था. जहां झारखंड का इलाका कहीं पर्वतीय और कहीं सूखा सा दिखा, वहीं बिहार मुझे काफ़ी हराभरा लगा और कुछ एक जगह की हरियाली देख कर तो मुझे ब्रिटेन के देहात की याद हो आई.

पटना हवाई अड्डे पर सैन्य अधिकरियों और लोगों की भारी भीड़ जमा थी, एक बार तो ऐसा लगा जैसे मेरे स्वागत के लिए लोग उमड़ पड़े हैं, लेकिन जल्दी ही बात समझ में आ गई कि बॉलीवुड के अभिनेता रज़ा मुराद को देखने और सेना के किसी कार्यक्रम के लिए इतने लोग जमा थे.

लेकिन यह भी एक सौभाग्य ही रहा कि हम रज़ा मुराद से बातचीत रिकार्ड करने में सफल रहे और हमारे श्रोताओं ने उनकी शेरो-शायरी को सराहा भी. हवाई अड्डे पर ही मेरी मुलाक़ात हिंदी सेवा के नलिन कुमार और पाणिनी आंनद से हुई, जिनके साथ मैने अगले आठ दिन गुज़ारे.

नाराज़ लोग

चुनाव सबंधी रिपोर्टें और ऑनलाइन सामग्री लदंन भेजने के बाद रात हमने पटना में ही गुज़ारी. सुबह हम बेगूसराए की ओर रवाना हुए, जहाँ हमें शहर और गाँव के मुद्दों के लेकर एक बातचीत रिकार्ड करनी थी.

बिहार के लोग
बिहार में लोग व्यवस्था से ख़ासे नाराज़ नज़र आए

पटना से निकलते ही हमने गंगा नदी को पार किया. 1998 में पहली बार मैनें गंगा नदी को देखा.

उस समय वाराणसी में लोगों को गंगा में नहाते, उसका जल पीते, मृतकों की राख बिखेरते और गंगा में उनकी आस्था को देख कर मैं अभिभूत हो गया था. लेकिन इस बार गंगा का रुप कुछ अलग था. उसका विशाल पाट और क़ाफी दूर तक फैली सफेद रेत मुझे समंदर के किनारे का आभास दे रही थी.

गंगा नदी को पार करते ही हमारी भेंट कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं से हुई. साइकिलों पर सवार लाल झंड़ा उठाए कार्यकर्ताओं से हमने बातचीत की और उनकी तस्वीरें भी उतारीं.

रास्ते में इसी तरह हम और दूसरी राजनैतिक पार्टियों के लोगों से भी मिले और राज्य में बह रही चुनावी हवा का रुख़ भांपने की कोशिश की.

 मुझे अहसास हुआ कि लोग आमतौर पर बिहार की राजनैतिक दशा से क़ाफी नाराज़ हैं. हालांकि नमस्ते और कुछ दूसरे हिंदी शब्दों के अलावा मेरी हिंदी की जानकारी शून्य है, लेकिन भावनाओं की भी अपनी एक अलग आवाज़ थी जिसे मैं साफ सुन पा रहा था

बेगूसराय में हमारी टीम के स्वागत के लिए बैनर लगाए गए थे. हमारी आवभगत और स्वागत से मुझे ‘अतिथि देवो भवः ’ के सही मायने समझ में आए. मुझे लगा भारतीय कितनी जल्दी घुलमिल जाते है, कुछ मिनटों मे ही मेरा परायापन दूर हो गया.

बातचीत रिकार्ड करते हुए मुझे अहसास हुआ कि लोग आमतौर पर बिहार की राजनैतिक दशा से क़ाफी नाराज़ हैं. हालांकि नमस्ते और कुछ दूसरे हिंदी शब्दों के अलावा मेरी हिंदी की जानकारी शून्य है, लेकिन भावनाओं की भी अपनी एक अलग आवाज़ थी जिसे मैं साफ सुन पा रहा था.

कमोबेश यही हाल बिहार के अन्य इलाकों का भी था और लोग शासन से ख़ुश नहीं दिखे. आम लोगों की स्थिति देख कर मैं इतना ही सोच पा रहा था कि इन राज्यों में लोगों के लिए कुछ किया जाना कितना ज़रुरी है और मैं तो सिर्फ़ उम्मीद ही कर सकता था कि ऐसा हो.

बीबीसी के श्रोता

बातचीत रिकार्ड करने के बाद हमने एक बीबीसी श्रोता के विचारों को जाना.

बीबीसी श्रोता
बीबीसी श्रोताओँ की रुचि देखकर अच्छा लगा

उस श्रोता के उत्साह और रेडियो कार्यक्रमों में रुचि को देख कर मैं दंग रह गया. लदंन में रात के डेढ़ बजे हिंदी सेवा के कार्यक्रम में तकनीकी सहयोग करते समय मैं अक्सर सोचा करता था कि कौन हैं हमारे श्रोता?

और उस श्रोता से मिल कर ऐसा लगा कि हमारी मेहनत का पूरा फल इन लोगों की कार्यक्रम में आस्था ही है.

बिहार से हम रवाना हुए झारखंड की तरफ़, रात के अधेंरे में सरपट दौड़ती जीप और नींद के झोंकों ने कुछ ज़्यादा देखने, अनुभव करने का मौक़ा तो नहीं दिया लेकिन देवघर पहुँच कर लगा कि जगह काफी ख़ूबसूरत है.

शहर में बसंत पंचमी पर देवी सरस्वती की पूजा के कई कार्यक्रम आयोजित हो रहे थे.

यादगार स्वागत

यहाँ से फिर हम आगे देहात में निकल पड़े एक और बातचीत रिकार्ड करने. एक बार फ़िर दिल खोल कर लोगों ने हमारा स्वागत किया, हिंदी सेवा के प्रति लोगों का स्नेह अंदर तक भिगो गया.

अचला और रुपा को लोग ऐसे याद करते हैं जैसे वो उनके परिवार के ही लोग हों. शायद सही भी है. बातचीत से पहले भोजन की व्यवस्था थी, खाने में मछली, सब्ज़ी, चटनी और रोटी तो थी ही लेकिन जो प्यार खाना बनाने और खिलाने में घुला था उसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल है.

बीबीसी टीम
बीबीसी टीम से लोग बहुत आत्मीयता से मिले

लंबी यात्रा के बाद ऐसा भोजन लंबे समय तक याद रहेगा.

अंत में हम रांची पहुँचे जहाँ कुछ और लोगों से बातचीत रिकार्ड की गई और फिर लंबी यात्रा के दौरान इक्कठा की गईं रिपोर्टों, तस्वीरों और रिकार्डिंग्स को लंदन भेजने का सिलसिला शुरु हुआ.

और फिर मेरे दिल्ली के रास्ते लंदन लौटने का दिन भी आ गया.

लेकिन भारत का यह दौरा मेरे लिए एक ख़ास अनुभव रहा और मुझे नहीं लगता कि मैं कभी इसे भुला पाऊँगा. जो आदर सत्कार, प्रेम, भाईचारा बिहार और झारखंड के लोगों ने हमारी टीम को दिया वो अभूतपूर्व था.

दौरे से पहले मुझे ऐसा लगता था कि मेरे पूर्वजों द्वारा किये गए अत्याचार और ख़राब व्यवहार के कारण लोग मेरे प्रति भी वैसा ही रवैया अपनाएंगें. लेकिन लोगों ने मेरे दिल को जीतने के साथ-साथ मेरे यक़ीन को भी बदल कर रख दिया. उन लोगों की याद मेरे दिल में सदा बसी रहेगी.

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