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नेपाली अख़बारों में आलोचना के स्वर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में आपातकाल के तहत छह महीने के लिए प्रेस पर सेंसरशिप लगाए जाने के बाद वहाँ कुछ अख़बारों ने सरकार की आलोचना करनी शुरु कर दी है. जब सेंसरशिप लगाई गई तो उस दिन नेपाल में अंग्रेज़ी के सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले अख़बार काठमांडू पोस्ट में संपादकीय का विषय था - 'मोजे पैरों को कैसे गर्म रखते हैं.' लेकिन अब अख़बारों के रुख में कुछ बदलाव नज़र आ रहा है. अब तक मोजों और मौसम जैसे विषयों पर संपादकीय लिखने वाले काठमांडू पोस्ट ने संपादकीय छापा है - 'पुनर्विचार करें.' 'पुनर्विचार करें' काठमांडू पोस्ट के संपादकीय में कहा गया है कि अख़बार का मकसद नई सरकार को चुनौती देना नहीं है लेकिन आपातकाल के तहत लागू किए गए कुछ प्रावधानों पर पुनर्विचार किया जाए. संपादकीय में स्पष्ट कहा गया है कि समय आ गया है जब प्रेस को काम करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. ये भी कहा गया है कि यदि इसके बाद सरकार ठीक समझे तो बाक़ी के नागरिक अधिकार भी बहाल किए जा सकते हैं. काठमांडू पोस्ट के पहले पृष्ठ पर एक ख़बर है जिसमें फ़ोन लाइन काट दिए जाने और इंटरनेट की सुविधा न मिलने से लोगों पेश आ रही कठिनाइयों के बारे में चर्चा की गई है. इसमें एक छात्र का बयान है और साथ ही एक दुकानदार का भी जिनका कहना है कि वे अपना सामान नहीं मंगवा सकते. ये भी बताया गया है कि हस्पतालों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. काठमांडू पोस्ट ग्रुप के ही नेपाली अख़बार कांतिपुर में भी इसी तरह के समाचार हैं. लेकिन काठमांडू पोस्ट में एक अन्य समाचार में एक संचार अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि मोबाइल फ़ोन कई महीने तक बंद रहेंगे और दूसरे फ़ोन भी कुछ देर के लिए ही काम करेंगे. |
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