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काठमांडू की सड़कों पर जीवन सामान्य

 काठमांडू
काठमांडू में हर जगह सैनिक दिखाई दे रहे हैं
नेपाल में सड़कों की चहल-पहल को देखकर किसी को भी यह ग़लतफ़हमी हो सकती है कि वहाँ सब कुछ सामान्य है लेकिन असल में ऐसा है नहीं.

पूरे देश में मोबाइल सहित हर तरह की टेलीफ़ोन सेवा ठप है, आप न तो फ़ोन कर सकते हैं न ही कोई आपसे संपर्क कर सकता है, न तो आप फैक्स भेज सकते हैं और न ही कोई इंटरनेट चला सकता है.

देश के चोटी के सभी नेता नज़रबंद हैं, चाहे वे शेर बहादुर देऊबा हों, मेधाव नेपाल या फिर गिरिजा प्रसाद कोईराला.

ये अलग बात है कि लोग सड़कों पर नहीं उतरे हैं, नारे नहीं लग रहे हैं और कोई खुलकर राजा के ख़िलाफ़ नहीं बोल रहा.

विवाद

कुछ लोग तो राजा के क़दम की सराहना कर रहे हैं, काठमांडू के एक व्यक्ति ने मुझसे कहा, "प्रजातंत्र आने के बाद नेताओं ने जो कुछ भी किया है ग़लत किया है जबकि राजा ने जो भी किया है अच्छा ही किया है. मेरे हिसाब से अब इस देश का भविष्य अच्छा ही होगा."

काठमांडू का जनजीवन सामान्य है, लोग पहले की तरह ख़रीदारी कर रहे हैं, सड़क पर गाड़ियाँ चल रही हैं.

माओवादियों ने जो हड़ताल बुलाई है उसका भी कोई असर कम से कम काठमांडू में तो नहीं दिख रहा.

 लोग खुलकर नहीं बोल रहे हैं इसका यह मतलब नहीं होता कि वे सहमत हैं, यह प्रजातंत्र के लिए बहुत बड़ा धक्का है
किरण नेपाल, पत्रकार

लेकिन यह मान लेना शायद ग़लत होगा कि राजा को जनता का समर्थन प्राप्त है, नेपाल की प्रमुख पत्रिका हिमाल खबर के वरिष्ठ पत्रकार किरण नेपाल कहते हैं कि इसे राजा के प्रति समर्थन के रूप में नहीं देखना चाहिए.

वे कहते हैं, "लोग खुलकर नहीं बोल रहे हैं इसका यह मतलब नहीं होता कि वे सहमत हैं, यह प्रजातंत्र के लिए बहुत बड़ा धक्का है."

सब ठप

महाराज ज्ञानेंद्र कोई बड़ा क़दम उठाने वाले हैं इसके संकेत पहले से ही मिलने लगे थे जब उन्होंने अचानक प्रधानमंत्री देऊबा को तीन दिन पहले महल में बैठक के लिए बुलाया था.

काठमांडू के लोग
लोग अख़बारों पर नज़रें गड़ाए हैं

इसके बाद पूरे देश में महत्वपूर्ण इमारतों, अख़बारों के दफ़्तरों नेताओं के घर पर सेना पहुँचने लगी, महाराज ज्ञानेंद्र ने आधे घंटे के भाषण में अपने फ़ैसले की घोषणा की जिसके फ़ौरन बाद पूरे देश की टेलीफ़ोन लाइनें ठप कर दी गईं.

देश में बाहर से आने वाले विमानों को उतरने नहीं दिया गया और छात्र नेताओं को भी गिरफ़्तार कर लिया गया.

जब मैं त्रिभुवन विश्वविद्यालय पहुँचा तो वहाँ छात्रों ने पुलिस और सेना के डर से मुझसे बात करने से इनकार कर दिया लेकिन मेरे बार-बार कहने पर वे धीरे-धीरे खुले और अपनी बात कही.

एक छात्र ने कहा, "हम दुनिया भर के लोकतंत्र समर्थक छात्रों से अपील करते हैं कि वे आगे आएँ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाएँ ताकि हर राजा के इरादों को हमेशा के लिए नाकाम कर दें."

बहरहाल, राजा ने मंत्रिमंडल का गठन कर दिया है जिसके वे प्रमुख हैं और इसके सदस्यों के बारे में कहा जाता है कि वे लोकतंत्र के विरोधी ही रहे हैं.

शायद आने वाले दिनों में तस्वीर साफ़ हो सके क्योंकि लोग अभी तो यही समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह सब क्या हो रहा है.

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