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सोनिया ने दिया राजनीति को एक नया मुहावरा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वर्ष 2004 ने इंदिरा गाँधी की बड़ी बहू सोनिया गाँधी में कई परिर्वतन देखे. उनका राजनीतिक जीवन में प्रवेश तो 1988 में हो गया था, लेकिन राजनीतिक नेताओं में गिनती, इसी वर्ष शुरू हुई. कई लोगों को उनकी क़ाबिलियत पर तो शक था ही, पार्टी के भीतर भी यह आवाज़ें रह-रह के उठती थीं कि सोनिया प्रधानमंत्री पद की दावेदार हैं कि नहीं. उन्हें भारत की सबसे प्रसिद्ध गृहणी बताया जाता था और कहा जाता था कि सब कुछ वे अपने बच्चों के लिए कर रही हैं. आखिर खुद अपने मित्र दलों से फोन उठाकर बात न करने वाली सोनिया गाँधी में क्या ऐसा था कि वे अटल बिहारी जैसे दिग्गजों के सामने टिक सकेंगी? क्या उनका राजनीतिकरण भी हुआ है? यह सवाल कई बार पूछा जाता था. लेकिन 2004 के बाद सोनिया गाँधी के बारे में बिलकुल अलग तरह के सवाल उठे. उन सवालों के जवाब तो अभी नहीं मिले हैं और शायद कभी न मिलें लेकिन विश्लेषण के दरवाज़े हमेशा खुले रहेंगे. परिभाषा बदलने की कोशिश कांग्रेस का मतलब नेहरू-गाँधी परिवार. वरिष्ठ कांग्रेस नेता डी.के. बरूआ कहा तो करते ही थे कि 'इंदिरा इज़ इंडिया एंड इंडिया इज़ इंदिरा'. इसके करीब 30 वर्ष बाद भी लोग बोला करते हैं कि परिवार ही कांग्रेस है, और कांग्रेस सिर्फ़ एक परिवार. लेकिन इस वर्ष परिवार के पार्टी से संबंध को नई परिभाषा दी सोनिया गाँधी ने. चार महत्वपूर्ण उत्तर भारतीय राज्यों में विधान सभा चुनाव हार जाने के बाद, अनुमान लगाया जा रहा था कि कांग्रेस की रीढ़ अब टूट चुकी है. अब क्या बचा है? लेकिन उन परिणामों के कुछ ही दिन बाद सोनिया गाँधी पैदल ही निकल पड़ीं मित्र दलों की तलाश में. सुरक्षा घेरे को तोड़ देना, रामविलास पासवान के घर उनका ख़ुद चल के जाना, किसी कहानियों की तरह आज बयान किया जाता है. सोनिया ने चुना सड़क का रास्ता. तत्कालीन सत्ताधारी राजग सड़क निर्माण में सफलता को प्रचार में भुनाने की कोशिश करता रहा, लेकिन सड़कों पर उतर गईं सोनिया गाँधी. उनका रूट तैयार करने वालों को भी अक्सर उन गाँवों के नाम नहीं याद रहते थे, लेकिन जनसंपर्क के रास्ते से सोनिया नहीं हटीं. कुछ पत्रकार जो उनके साथ जाते थे, ज़रूर दबे स्वरों में कहते थे कि इतालवी बहू ही पकड़ पाई हैं देश की नब्ज़. लेकिन सरकार के प्रचार के शोर से सहमें जोर से नहीं कह रहे थे. अकेली नेता संचार संपन्न, एसएमएस वाले प्रचार अभियान का मुक़ाबला अकेले सोनिया गाँधी ने किया. उनकी पार्टी ने आम आदमी का नारा दिया, जो कभी-कभी हाड्रोलिक लिफ़्ट वाले रथ, और भारत उदय के टीवी पर दिखाई पड़ रहे विज्ञापनों के मुक़ाबले कमज़ोर लगता था.
भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष वेंकैया नायडू तब यह कह अक्सर कहकर हँसी उड़ाते थे कि यह लड़ाई अटल बनाम प्रश्न चिन्ह की है. गुजरात के मुख्यमंत्री ने उन्हें और उनके बेटे को क्लर्क और ट्रक ड्राइवर की नौकरी के लायक भी नहीं बताया. लेकिन बेरोज़गारी की बढ़ती क़तारों पे नज़र रखी हुईं पार्टी अध्यक्ष कई दिनों के लिए 'रोड-शो' पे निकल जाती थीं. कई ऐसे इलाकों में, जहाँ टेलीविज़न, कैमरा भी नहीं पहुँच पा रहे थे. और फिर आई बेरोज़गारों, ट्रक ड्राइवरों की और क्लर्कों की भी वोट देने की बारी. और 13 मई को ही यह स्पष्ट हो गया कि राजग सरकार बनाने की स्थिति में है ही नहीं. सोनिया गाँधी के नेतृत्व में सामने आए उनके मित्र दल और सपा और बसपा ने भी गठजोड़ कर लिया कि वे सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस का केंद्र में समर्थन करेंगे. इंकार और एक नया मुहावरा इसके बाद शुरु हुई प्रधानमंत्री बनने की हलचल. परिणाम आने के बाद कांग्रेस की बैठकों में और उसके बाहर भी सोनिया गांधी ने, जब मौक़ा मिला ये संकेत देने में कोई क़सर नहीं रखी कि वे प्रधानमंत्री बनने जा रही हैं. वैसे किसी को शक भी नहीं था. न कांग्रेस के भीतर, न पत्रकार जगत में और न विपक्षी भारतीय जनता पार्टी में. फिर भी लोग अपने आपको आश्वस्त करने के लिए सवाल पूछ रहे थे, क्या वे ही बन रही हैं?
लेकिन एक दिन सोनिया गाँधी ने न केवल भारतीय राजनीति को, बल्कि दुनिया भर के राजनीतिज्ञों को एक नया मुहावरा दिया और 'अपनी अंतरात्मा की आवाज़' पर प्रधानमंत्री का पद लेने से इंकार कर दिया. उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लिया. वे क्यों नहीं बनीं वे प्रधानमंत्री? आख़िर कौन मना कर सकता है प्रधानमंत्री का पद लेने से? लोग तो 13 दिन के लिए तैयार हो गए थे. कहा गया कि सोनिया ने शायद स्वीकार कर लिया कि विदेशी मूल का व्यक्ति यहाँ का प्रधानमंत्री बन ही नहीं सकता या शायद उनका यह कहना अपने बच्चों के उनके सुरक्षा के पार्टी चिन्हों के कारण हुआ? कहीं यह तो नहीं कि वे कभी प्रधानमंत्री बनना ही नहीं चाहती थीं? उन्होंने यह पार्टी की ज़िम्मेदारी संभाली मात्र अपने बच्चों के "अधिकार" को सुरक्षित रखने के लिए और यह एक सोची समझी योजना के तहत हो रहा था? स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी थी. सच्चाई जो भी हो, सोनिया गाँधी के पद को न स्वीकार करना इस वर्ष के राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे बड़ा मील का पत्थर रहा है. अगर उन्हें सत्ता से अलग रहने का मक़सद था, सीधे आम भारतीय से संपर्क बनाए रखना, वो सूत्र जो प्रचार के समय क़ायम हुआ था उसे बनाए रखना, तो उसमें अभी बहुत कुछ करना है. यदि इस पद को न स्वीकार करने के पीछे था मक़सद पार्टी ढाँचे में नई जान फूँकने का, तो उसमें भी अभी बहुत कुछ करना होगा.
महाराष्ट्र में भले ही कांग्रेस ने अपना मुख्यमंत्री बनवा लिया हो, लेकिन उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में पार्टी का ढाँचा न के बराबर है, और उसे किस प्रकार जीवीत करना है, उसमें जिस निष्ठा और उससे भी ज़्यादा जिस रचनात्मक सोच, नई मुद्दे की ज़रूरत है, वो अभी कही नज़र नहीं आ रही है. कांग्रेस भले ही आठ वर्ष बाद केंद्र में सत्ता में हो, उसे ज़रूरत है नए उपाए खोजने की गठबंधन चलते हुए भी वो अपना जनाधार, अपनी जड़े मज़बूत कर सके. जो वर्ग उससे अलग हो गए हैं, जिन इलाकों में वो अप्रासंगिक हो गई है, वहाँ अपना जनाधार फिर ढूंढने की उसे ज़रूरत है उसके लिए सोनिया गांधी को जो कदम उठाने होंगे. इन सबके लिए भी उन्हें उसी प्रकार का साहस और धैर्य चाहिए होगा जिस प्रकार के धैर्य का प्रदर्शन उन्होंने मई 2004 में किया था. |
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