| 'सत्ता ने मुझे कभी नहीं लुभाया' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कांग्रेस संसदीय दल को अपने संबोधन में पार्टी नेता सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करने की घोषणा की. प्रस्तुत है उनका पूरा भाषण- " साथियों, पिछले छह वर्षों में राजनीति में रहने के दौरान मुझे एक बात साफ दिखी. वो यह कि प्रधानमंत्री का पद मेरा लक्ष्य नहीं है. मैं हमेशा से निश्चित थी कि जब भी मैं आज जैसी स्थिति में रहूँगी, अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ को मानूंगी. आज वो आवाज़ कह रही है कि मैं इस पद को विनम्रता पूर्वक ठुकरा दूँ. आपने हमें एकमत से अपना नेता चुना और ऐसा करते हुए मुझ पर भरोसा जताया. इसी भरोसे ने मुझ पर अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार का भारी दबाव डाला. फिर भी, मुझे उन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए जिसने मुझे हमेशा दिशा दी है. सत्ता ने मुझे कभी नहीं लुभाया है, न ही कोई पद मेरा लक्ष्य रहा है. हमेशा से मेरा लक्ष्य रहा है अपने राष्ट्र की धर्मनिरपेक्ष नींव की रक्षा करना, ग़रीबों का साथ देना. इंदिरा जी और राजीव जी हमेशा इसी सिद्धांत पर चले थे. हम इस लक्ष्य की तरफ़ आगे बढ़े हैं. हमने एक सफल लड़ाई छेड़ी है. लेकिन हम लड़ाई जीते नहीं हैं. यह एक लंबी और कठिन लड़ाई है, और मैं इसे दृढ़ता के साथ जारी रखूंगी. मैं आपसे अपने विश्वास को समझने की अपील करती हूँ. मेरा आग्रह है कि आप मेरे फ़ैसले को स्वीकार करें और मानें कि मैं इसे नहीं बदलूँगी. इस नाजुक मौक़े पर हमारी प्रमुख ज़िम्मेदारी है भारत को एक धर्मनिरपेक्ष सरकार देना जो कि मज़बूत और स्थिर हो. साथियों, आपने खुल कर मेरा साथ दिया; मेरे साथ मिल कर हर विपरित परिस्थितियों का मुक़ाबला किया. आप लोगों में से एक होने के नाते और कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते, मैं आपके साथ काम करने, देश के लिए काम करने का वचन देती हूँ. वास्तव में अपने सिद्धांतों, अपने सपनों और अपने आदर्शों के लिए संघर्ष करने का मेरा इरादा और मज़बूत होगा." |
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