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नेहरू-गाँधी परिवार का राजनीतिक सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के नेहरू-गाँधी परिवार की तुलना अमरीका के केनेडी परिवार से की जाती है. मोतीलाल नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक, भारत के इस 'प्रथम परिवार' का राजनीति में सीधा दखल रहा है. नेहरू-गाँधी परिवार के राजनीतिक सफ़र के प्रमुख पड़ाव- 1940 का दशक- मोतीलाल नेहरू और उनके परिवार के कई अन्य सदस्यों ने कांग्रेस पार्टी सदस्य के रूप में अंग्रेज शासकों के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया. 1947-1964- मोतीलाल नेहरू के बेटे जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के पद पर रहे. उनकी मौत के बाद पद खाली हुआ. 1966-1977- जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गाँधी भारत की तीसरी प्रधानमंत्री बनीं. 1980-1984- इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री के पद पर एक और कार्यकाल गुजारा. 1980- इंदिरा गाँधी के छोटे बेटे संजय गाँधी सांसद चुने गए. बाद में विमान दुर्घटना में उनकी मौत. 1984- सिख अंगरक्षकों ने इंदिरा गाँधी की हत्या की. उनके बड़े पुत्र राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने. 1984-1989- राजीव गाँधी प्रधानमंत्री के पद पर रहे. 1988- संजय गाँधी की विधवा जनता दल की महासचिव बनीं. 1989- मेनका गाँधी सांसद चुनी गईं. 1991- चुनाव प्रचार के दौरान विपक्ष के नेता राजीव गाँधी की तमिल छापामार के आत्मघाती हमले में मौत. 1998- राजीव गाँधी की विधवा सोनिया गाँधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं. 1999- सोनिया गाँधी सांसद चुनी गईं. 13 मई 2004- राजीव और सोनिया के बेटे राहुल गाँधी सांसद चुने गए. सोनिया एक बार फिर सांसद चुनी गईं और चुनावों में उनकी पार्टी को अनेपक्षित सफलता मिली. इसी के साथ उनके विदेशी मूल के पहले व्यक्ति के रूप में भारत के प्रधानमंत्री का पद सँभालने की संभावना प्रबल हुई. |
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