BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शनिवार, 22 मई, 2004 को 23:42 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
सोनिया का फ़ैसला और कांग्रेस

सोनिया गांधी
सोनिया गांधी का फैसला भारतीय राजनीति पर दूरगामी असर डाल सकता है
प्रधानमंत्री का पद स्वीकार नहीं करने का फैसला कर काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भाजपा को क़रारा राजनीतिक झटका दिया है.

इस फैसले का प्रभाव न केवल विपक्षी दलों पर, बल्कि कांग्रेस पर भी पड़ेगा.

तो क्या कांग्रेस पचास और साठ के दशक का अपना प्रभुत्व फिर से क़ायम कर सकेगी?

चौदहवीं लोकसभा चुनावों के परिणाम आने से लेकर सोनिया के प्रधानमंत्री पद ठुकराने तक 10 जनपथ के बाहर खड़ा मैं यही सोचता रहा.

कांग्रेस के बारे में कहा जाता है कि इसे चलाना सरकार को चलाने से कहीं अधिक कठिन काम है. सोनिया गांधी ने संभवत: अपने ज़िम्मे कठिन काम ले लिया है.

जानबूझकर या फिर अनजाने में, सोनिया गांधी ने एक कठोर, भावुक और अदभुत निर्णय लिया है, जिसके दूरगामी परिणाम होने वाले हैं.

फ़ायदा

News image
सोनिया के फ़ैसले से नैतिकतावादी राजनीति को बढ़ावा मिल सकता है

जानकार मानते हैं कि सोनिया गांधी के इस फैसले से भारतीय राजनीति में नैतिकता और मूल्यों के आधार पर किए जाने वाले निर्णयों को बढ़ावा मिल सकता है.

दूसरी तरफ सत्ता लोलुप कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भी एक क़रारा सबक मिला है. ये वही कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं जो पोस्टर, बैनर और न जाने किन-किन तरीक़ों से 10 जनपथ के बाहर सोनिया गांधी को मनाने के लिए धरने-प्रदर्शन कर रहे थे.

पुराने कांग्रेसी घर पर बैठकर सोनिया के फैसले की तारीफ़ कर रहे थे. सोनिया अपने बेटे राहुल गाँधी के साथ मिलकर आने वाले दिनों में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की पूरी कोशिश करने वाली हैं.

पिछले एक महीने में चुनावों के दौरान कांग्रेस की संगठनात्मक कमज़ोरियाँ खुलकर सामने आ चुकी हैं. जिसे कांग्रेसी तो नहीं, लेकिन सोनिया गांधी स्पष्ट समझ रहीं हैं.

उन्होंने खुद को निर्विरोध नेता के रूप में स्थापित कर दिया है. अब उन्हें पार्टी को आंतरिक कलह, गुटबाज़ी, परिवार पूजा से आगे निकालकर राजनीतिक दल के रूप में स्थापित करना है.

सोनिया के इस फ़ैसले के कुछ नुकसान भी है.

नुक़सान

News image
सोनिया अलग तो हो गईं मगर सत्ता के दो ध्रुवों में बंटने का ख़तरा बन गया

जानकार मानते हैं कि सत्ता के दो केंद्र बन सकते हैं. एक प्रधानमंत्री कार्यालय और दूसरा 10 जनपथ यानि कांग्रेस अध्यक्ष. तुलना चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से की जा सकती है जहाँ पार्टी का अध्यक्ष प्रधानमंत्री से अधिक ताकतवर होता है.

इससे सोनिया के प्रति चाटुकारिता और भी बढ़ सकती है जो संगठन के रूप में कांग्रेस के विकास में बाधक हो सकता है.

आने वाले दिनों में कांग्रेस का सामना भाजपा से होने वाला है. मुख्य विपक्ष के तौर पर वामपंथी दल फिलहाल उनकी सरकार को समर्थन दे रहे हैं.

कांग्रेस समर्थक मानते हैं कि सोनिया के फ़ैसले ने अगले पाँच सालों के लिए भाजपा की कमर तोड़ दी है. लेकिन यह अति आत्मविश्वास कहा जा सकता है.

चुनौती

भाजपा के साथ आरएसएस नाम का एक विशालकाय संगठन है जिसके पास अनुशासित और प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं, जिन्हें सत्ता का लोभ नहीं. अतिवादी ही सही, एक विचारधारा से वो प्रेरित हैं. काँग्रेस को आरएसएस का सामना करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ सकता है.

इस पूरे तालमेल में यह भी कहा जा रहा है कि सोनिया गांधी अगले चुनावों में 272 का आंकड़ा अकेले कांग्रेस के नाम पर लाना चाहती हैं और शायद तब वो प्रधानमंत्री बनने पर राज़ी हो पाएँ.

लेकिन क्या मतदाताओं को अभी का उनका त्याग तब तक याद रहेगा? क्या वो क्षेत्रीय दल कांग्रेस को इतने बड़े दल के तौर पर उभरने देंगे?

ध्यान रहे कि कांग्रेस ने इस चुनाव में 145 सीटें ली हैं तो भाजपा ने 138 सीटें जीती हैं.

आने वाले समय में कांग्रेस का भविष्य तय होना है. फिलहाल कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने एक बार फिर सत्ता तो हासिल कर ली है, लेकिन आगे की राह आसान नहीं होगी.

इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>