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गुजरात दंगा पीड़ितों के लिए राहत की उम्मीद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सन् 2002 के गुजरात दंगों के शिकार लोगों के लिए न्याय का मार्ग अभी बहुत कठिन और लंबा है, पर लगता है कि बीते साल में न्याय प्रक्रिया की गाड़ी कुछ हद तक पटरी पर आ गई है. इसका प्रमुख कारण रहा है भारत के सर्वोच्च न्यायालय का कई मामलों में हस्तक्षेप. यही वजह है कि दंगों के शिकार लोगों में उम्मीद अभी भी कायम है और वो इस आशा के साथ अपनी ज़िंदगी के टुकड़े बटोर रहे हैं कि एक दिन उन्हें न्याय ज़रूर मिलेगा और गुजरात कहीं और नहीं दोहराया जाएगा. हालांकि बेस्ट बेकरी मामले की प्रमुख गवाहों में से एक ज़ाहिरा शेख ने जिस तरह बयान बदला है उसने भी लोगों को आश्चर्यचकित किया. तहलका ने 21 दिसंबर को एक वीडियो जारी कर दावा किया है कि गुजरात में बड़ौदा से भाजपा विधायक मधु श्रीवास्तव ने बेस्ट बेकरी मुक़दमे की प्रमुख गवाह ज़ाहिरा शेख़ को 18 लाख रुपए दिए लेकिन मधु श्रीवास्तव ने इस आरोप का खंडन किया है. बीते वर्ष की प्रमुख घटनाओं में से एक थी सुप्रीम कोर्ट का बेस्ट बेकरी केस का गुजरात के बाहर विशेष अदालत में सुनवाई का आदेश. यह मामला फिलहाल मुंबई की एक अदालत में चल रहा है और इसने एक बार फिर एक नया मोड़ ले लिया जब नवंबर में एक मुख्य गवाह ज़ाहिरा शेख ने मीडिया के सामने उन्ही सामाजिक कार्यकर्ताओं पर अपनी जान के खतरे और बयान बदलने के लिए मजबूर किए जाने के आरोप लगाए जिन्होंने मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट में उठाया था. गोधरा कांड के बाद बड़ौदा के निकट हुए इस कांड में 14 लोगों को मार दिया गया था और एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने तमाम 21 अभियुक्तों को बरी कर दिया था, क्योंकि गवाहों ने अपने बयान बदल दिए थे. बाद में ज़ाहिरा ने मीडिया के सामने कहा था कि बयान धमकियों की वजह से बदले गए थे. अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि ज़ाहिरा के बयान बदलने की क्या वजह थी. सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता शीतलवाड ने ज़ाहिरा के बयान बदलने के मामले की जाँच सीबीआई से करवाने की बिलकिस मामला बेस्ट बेकरी कांड के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य केस- जिसे बिलकिस केस के नाम से जाना जाता है, की भी सुनवाई महाराष्ट्र में करवाने के आदेश दिए.
यह आदेश केंद्रीय जाँच ब्यूरो या सीबीआई की जाँच के बाद दिए गए जब यह पाया गया कि पुलिस ने मामले को दबाने और सबूत ख़त्म करने में अभियुक्तों की मदद की थी. इस केस में लिमखेड़ा के निकट बिल्किस बानो सहित तीन महिलाओं का सामुहिक बलात्कार किया गया था और उसके परिवार के 14 लोगों को मार दिया गया था. बिलकिस को मृत समझ कर छोड़ दिया था. मामले में बिलकिस की मदद कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता मुख्तार का कहना है कि अब तक 6 पुलिसकर्मी गिरफ़्तार किए जा चुके हैं. बिल्किस ने कुछ समय पूर्व बीबीसी को बताया था, "जब मैंने पुलिस से डॉक्टरी जाँच के लिए कहा था तो उन्होंने मुझे कहा कि तुम अकेली हो. तुम्हें कोई ज़हर का इंजेक्शन दे देगा तो तुम क्या करोगी." दोबारा समीक्षा दंगों के शिकार लोगों को कुछ राहत तब मिली जब सुप्रीम कोर्ट ने उन 2000 मामलों की दोबारा समीक्षा करने का आदेश दिया जिन्हें पुलिस ने अपराधियों को भगोड़ा ज़ाहिर कर केस बंद कर दिए थे. राज्य पुलिस महानिदेशक के नेतृत्व में एक कमेटी इन मामलों की समीक्षा कर रही है और समय-समय पर अदालत को रिपोर्ट दे रही है. इसके तहत काफी केस दोबारा खोले गए हैं. साथ ही गुजरात सरकार के महाधिवक्ता को करीब 250 ऐसे मामलों की पुनः समीक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई है जिनमें भिन्न कारणों से निचली अदालतों से अभियुक्त बरी किए जा चुके हैं. अब सरकार को एक रिपोर्ट देनी है जिसमें यह बताया जाएगा कि कितने मामलों में सरकार अपील दायर कर सकती है. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने चार प्रमुख मामलों के गवाहों को, जिनमें नारोडा पाटिया और गुलबर्ग हत्या कांड के गवाह शामिल हैं, केंद्रीय सुरक्षाबलों की सुरक्षा मुहैया करवाई है. आयोग का दायरा और गोधरा की जाँच कुछ माह पूर्व गुजरात सरकार ने गोधरा कांड और उसके बाद के दंगों की जाँच कर रहे न्यायाधीश जी.टी.नानावती और जस्टिस के.जी.शाह आयोग के कार्य का दायरा बढ़ा दिया. सरकार के आलोचकों का मानना है कि ऐसा इसलिए किया गया था कि केन्द्र में आई नई सरकार कोई ऐसा आयोग न बिठा दे जिसकी टर्म्स ऑफ रेफरेंस वो हो जो इस आयोग के दायरे में नहीं थे, क्योंकि दो भिन्न आयोग एक जैसे टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस पर नहीं काम कर सकता. परंतु कुछ रोज बाद रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने गोधरा कांड की तकनीकी जाँच के लिए जस्टिस यू.सी. बनर्जी आयोग बैठा दिया.
भाजपा ने इस आयोग के गठन की यह कहकर आलोचना की है कि यह अपराधियों को बचाने की केंद्र की साज़िश है. साथ ही यह भी कहा गया कि एक आयोग जब पूरे मामले की जाँच कर रहा है तो दूसरे की कोई ज़रूरत नहीं है. गोधरा कांड में 59 हिन्दू रेल मुसाफिरों को कथित रूप से मुसलमानों के एक भीड़ ने जला दिया था जिसके बाद पूरे गुजरात में दंगे भड़के थे. नानावटी-शाह आयोग के समीक्षा पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जिरह के दौरान दंगों के कई नई पहलू सामने आए. मिसाल के तौर पर पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) अशोक नारायण ने यह बताया कि गोधरा कांड में मरने वालों की लाशों को अहमदाबाद लाने का निर्णय मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का था. पूर्व पुलिस महानिदेशक के. चक्रवर्ती ने कहा था कि बहुत से मामलों पर उनकी राय नहीं ली गई थी. इनमें गोधरा कांड के एकदम बाद अभियुक्तों पर पोटा लगाने और फिर वापस लेना और गोधरा कांड के जाँच अधिकारी को बदलना शामिल था. इसकी प्रकार पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एजीपी (इंटेलिजेंस) आर.बी. श्रीकुमार ने बताया कि भाजपा नेता पुलिस के कार्य में दखल दे रहे थे. उन्होंने यह भी बताया कि उनके पास ऐसा कोई भी ऐसी गुप्तचर सूचना नहीं थी कि गोधरा कांड एक साज़िश का नतीजा था. कुछ रोज पहले एक पुलिस अधिकारी राहुल शर्मा ने आयोग के सम्मुख कहा था कि दंगों के दौरान भावनगर में पुलिस फायरिंग में मरने वालों के अनुपात को लेकर पूर्व गृह राज्यमंत्री गोवर्धन झड़पिया ने आपत्ति जताई थी. फायरिंग में 5 हिंदू और एक मुसलमान व्यक्ति की मौत हुई थी. शर्मा ने एक सीडी भी आयोग को सुपुर्द की जिसमें 25 फरवरी से लेकर 2 मार्च 2002 तक मोबाइल फोन से की गई तमाम कॉल की सूची है. आयोग के सम्मुख और भी कुछ अहम मुद्दे सामने आए हैं. उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दिनों में टुकड़ों में ही सही पर सत्य ज़रूर बाहर आएगा. |
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