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मनमोहन के गाँव गाह में धुंधली यादें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इसे महज़ इत्तेफ़ाक़ कहा जाए या नियति कि पाकिस्तान के मौजूदा राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ दिल्ली में पैदा हुए थे और अब भारत का नया प्रधानमंत्री भी ऐसा व्यक्ति बन रहा है जिसका जन्म पाकिस्तान में हुआ था. यानी ग़ौर से देखा जाए तो भारत और पाकिस्तान में दोस्ती का रास्ता और साफ़ होने की उम्मीद की जा सकती है. इसी उम्मीद के साथ पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से कुछ दूरी पर स्थित गाह इलाक़ा आजकल कुछ ख़ास अहमियत महसूस कर रहा है. वजह ये है कि भारत के नवनियुक्त प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को जन्म देने का श्रेय इसी गाह इलाक़े को है जहाँ आज भी मनमोहन सिंह की यादें बसी हुई हैं लेकिन कुछ धुँधली सी. डॉक्टर मनमोहन सिंह गाह में ही पैदा हुए थे और 1947 में विभाजन के बाद भारत चले गए थे.
डॉक्टर मनमोहन सिंह भले ही क़रीब 60 साल पहले इस सरज़मीं को छोड़ गए हों लेकिन उनकी मौजूदगी आज भी वहाँ महसूस की जा सकती है. 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में भाग लेने वाले राजा गुलशेर कहते हैं, "मुझे बहुत फ़ख़्र महसूस हो रहा है कि हमारे गाँव का एक सपूत भारत जैसे देश का प्रधानमंत्री बन रहा है." राजा गुलशेर ने 1965 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना की मेडिकल कोर में हिस्सा लिया था. राजा गुलशेर एक नई उम्मीद के साथ कहते हैं, "अगर इस गाँव की मिट्टी और पानी का ज़रा भी असर डॉक्टर मनमोहन सिंह पर होगा तो वह पाकिस्तान के साथ दोस्ती को ज़रूर आगे बढ़ाएंगे." हालाँकि राजा गुलशेर सिंह मनमोहन सिंह की मजबूरियों और दोस्ती के रास्ते में आने वाली बाधाओं और चुनौतियों को भी अच्छी तरह समझते हैं लेकिन उम्मीद कैसे छोड़ी जा सकती है. "हम उनकी मजबूरियाँ जानते हैं लेकिन हमें पूरी उम्मीद भी है कि वह पाकिस्तान के साथ दोस्ती को आगे बढ़ाएंगे. अगर वह हमारे गाँव आते हैं तो सबसे पहले मैं उनका स्वागत करूंगा."
अगर ग़ौर से देखें तो इस्लामाबाद से क़रीब 80 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित इस गाँव गाह में 1930 से लेकर आज तक हालात में कुछ ख़ास बदलाव नहीं आया है. ज़िंदगी अब भी वैसी ही नज़र आती है जैसी मनमोहन सिंह के जन्म के समय 1932 के ज़माने में थी. गाह को आज भी कोई पक्की सड़क नहीं जोड़ती, महिलाएं हाथों से ही कुँओं से पानी खींचती हैं. किसी ज़माने में यहाँ मुस्लिम, हिंदू और सिख औरतें अलग-अलग कुँओं से पानी भरा करती थीं. आज यहाँ बिजली आ चुकी है और कुछ घरों में तो टेलीविज़न भी हैं. लेकिन मिट्टी से बने घरों में आधुनिक दुनिया की कम ही सुविधाएं अपनी जगह बना पाई हैं. तंग गलियों वाले इस गाँव में क़रीब ढाई हज़ार लोग अपने मवेशियों के साथ रहते हैं जिनमें भेड़ और बकरियाँ भी शामिल हैं. लेकिन 1930 के दशक से अब तक कुछ अगर बदला है तो वो ये कि यह पूरा गाँव अब सिर्फ़ मुसलमानों का है. प्राइमरी स्कूल डॉक्टर मनमोहन सिंह ने जब 1930 के दशक में यहाँ के प्राइमरी स्कूल में दाखिला लिया था तो यहाँ कुल आबादी का क़रीब आधा हिस्सा हिंदुओं और सिखों का था.
ब्रितानी भारतीय सेना में सेवा कर चुके मोहम्मद ख़ान उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "हम बिना किसी समस्या के यहाँ रहते थे और खुले दिल से एक दूसरे की मदद करते थे. हम साथ लड़ते-झगड़ते थे, साथ खेलते थे और साथ ही पढ़ते भी थे." मोहम्मद ख़ान 1947 में देश विभाजन के समय ब्रितानी भारतीय सेना में थे और उनकी तैनाती मलेशिया में थी. वह याद करते हुए कहते हैं कि उन्होंने किस तरह पाकिस्तान का झंडा लहराया था और एक ईसाई सैनिक ने भारत का तिरंगा ऊँचा किया था. गाह में देश विभाजन की घटना को कोई याद करना नहीं चाहता. बाज़ ख़ान उस समय सिर्फ़ 12 साल के थे. वह कहते हैं, "मैं अपने मवेशी चरा रहा था जब कुछ लोग मेरी तरफ़ यह कहते हुए भागे कि गाँव पर हमला हो गया है. मैंने अपने गाँव से आग और धुँआ उठते देखा." "दूसरे गाँवों के मुसलमानों ने गाह के हिंदू और सिखों के घरों पर हमला कर दिया था. गाह के कुछ मुसलमानों ने अपने हिंदू और सिख पड़ोसियों को पनाह भी दे दी थी." गाह से कूच डॉक्टर मनमोहन सिंर के पिता ने अपना परिवार विभाजन से कुछ समय पहले ही गाह से अमृतसर भेज दिया था और विभाजन के समय वह ख़ुद भी चले गए थे. वह मेवों का कारोबार किया करते थे. गाह में मनमोहन सिंह के परिवार की यादें अब धूमिल होने लगी हैं.
स्कूल के रजिस्टर में दर्ज है कि मनमोहन सिंह के एक साथी अहमद ख़ान भी थे लेकिन अहमद ख़ान को अब कुछ ठीक से याद नहीं. लेकिन उन्हें यह अहसास ही गर्व करा जाता है कि उनके गाँव का एक व्यक्ति और संभवतः उनके साथ पढ़ने वाला भारत का प्रधानमंत्री बन रहा है. "यह बहुत ही ख़ुशी की बात है. मेरी बड़ी तमन्ना है कि वह भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद इस गाँव का दौरा ज़रूर करें." किसान मोहम्मद अशरफ़ वैसे तो किसी मनमोहन सिंह को नहीं जानते लेकिन जब उनसे गुरूमुख सिंह कोहली के बेटे के बारे में पूछा जाता है तो 70 साल के अशरफ़ के चेहरे की झुर्रियाँ कुछ ढीली होती हैं, "कहीं आप उस छुटकू मोहना की बात तो नहीं कर रहे हैं." लेकिन मोहम्मद अशरफ़ को अब कुछ भी याद नहीं कि 1941 के बाद मोहना का क्या हुआ लेकिन उन्हें इतना ज़रूर याद है, "मैं कक्षा चार में फेल हो गया था और मोहना पास हो गया था. तब से पता नहीं मोहना कहाँ चला गया." मोहम्मद अशरफ़ को शायद यह नहीं मालूम कि उस मोहना का अब नया पता है भारत की राजधानी दिल्ली की एक विशेष कोठी नंबर 7 रेसकोर्स रोड जो देश के प्रधानमंत्री का सरकारी निवास होता है. |
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