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दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से मगर... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में यह रिवायत सी रही है कि देश की राजगद्दी का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर जाता है लेकिन 2004 के चुनाव में यह रिवायत टूटती नज़र आई. इतना ही नहीं प्रधानमंत्री की कुर्सी पर भी चार बार को छोड़कर उत्तर प्रदेश के नेता ही बैठते रहे हैं. मोरारजी देसाई, पीवी नरसिंम्हा राव, एचडी देवेगौड़ा और इंदर कुमार गुजराल को छोड़कर बाक़ी सभी प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से ही रहे हैं. जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गाँधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी उत्तर प्रदेश से ही सांसद रहे हैं. उत्तर प्रदेश की अहमियत इसलिए ज़्यादा रही है कि वहाँ लोक सभा की 80 सीटें हैं और आमतौर पर किसी एक दल को इतनी सीटें मिलती रही हैं कि केंद्र में सरकार बनाने में उनकी भूमिका निर्णायक हो जाती थी. लेकिन 2004 में नज़ारा इतना उलट गया कि प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदार नेता तो उत्तर प्रदेश से ही हैं पर न तो उनकी ख़ुद की पार्टी की इतनी सीटें हैं कि सरकार बनाने में उनकी कोई बहुत अहमियत हो और न ही किसी और दल का कोई महत्व बचा है. आँकड़े और समीकरण उत्तर प्रदेश में सीटों का आँकड़ा कुछ इस तरह बैठता है - समाजवादी पार्टी-35, बसपा-19, भाजपा-10, कांग्रेस-09 और राष्ट्रीय लोकदल-03. इस तरह देखें तो समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा सीटें लेने वाला दल है लेकिन कांग्रेस गठबंधन ने उन्हें कोई अहमियत ही नहीं दी है. इतना ही नहीं कांग्रेस के पास उत्रर प्रदेश से सिर्फ़ नौ सीटें हैं लेकिन सवाल यही रह जाता है कि क्या किसी और प्रदेश के पास प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए नेता नहीं है?
कांग्रेस ने हालाँकि उत्रर प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार को समर्थन दिया हुआ है लेकिन केंद्र की सत्ता के समीकरणों में यह दोस्ती कहीं नज़र नहीं आई, यहाँ तक कि पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह को सोनिया गाँधी ने रात्रि भोज पर भी आमंत्रित नहीं किया. बहरहाल पार्टी के महासचिव अमर सिंह बिना बुलावे के ही उस रात्रि भोज में जा पहुँचे और उन्होंने दलील दी कि माकपा नेता सुरजीत सिंह के कहने पर वह रात्रि भोज में गए और ख़ासतौर से यह कि वह धर्मनिर्पेक्ष दलों की एकजुटता बनाए रखने के लिए ऐसा कर रहे हैं. चूँकि कांग्रेस को अब समाजवादी पार्टी के समर्थन की ज़रूरत नहीं थी लेकिन फिर भी अमर सिंह और अजीत सिंह ने सोनिया गाँधी को अपने समर्थन वाला पत्र उन्हें नहीं देकर सीधे राष्ट्रपति तक पहुँचा दिया. इस तरह देखा जाए तो समाजवादी पार्टी के बर्ताव से बिल्कुल यह साबित हो रहा है कि "मान ना मान मैं तेरा मेहमान". मनमुटाव इस दाँव-पेच की शुरूआत दरअसल 1998 में हो गई थी जब कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए समर्थन की ज़रूरत थी और समाजवादी पार्टी ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर समर्थन देने से मना कर दिया था. ख़ासतौर पर कहा गया था कि अमर सिंह ने इसमें सबसे अहम भूमिका निभाई और कांग्रेस ने कहा कि सिर्फ़ अमर सिंह की वजह से उनकी सरकार नहीं बन सकी जिसकी वजह से देश को एक और मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा. यही ही नहीं, 2004 के चुनाव से पहले भी कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने की भरसक कोशिश की थी लेकिन मुलायम सिंह और अमर सिंह ने उन्हें कोई अहमियत नहीं दी. कुछ जानकार यह भी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अपनी स्थिति सुधारनी है इसलिए समाजवादी पार्टी का सहारा इस काम में बाधा खड़ी कर सकता है. मतलब ये है कि अगर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से दोस्ती रही तो कांग्रेस को अपना वजूद बढ़ाने में दिक़्क़त हो सकती है यही सोचकर वह फूँक-फूँक कर क़दम रख रही है. अब उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन पर भी लोगों की नज़र होगी कि उसकी दिशा क्या होती है.
कांग्रेस ने तो मायावती की बहुजन समाज पार्टी से भी हाथ मिलाने की कोशिश की थी लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहा था. हालाँकि 13 मई को नतीजे आने के बाद मायावती ने तो कह दिया कि वह कांग्रेस को समर्थन देने के लिए तैयार हैं लेकिन उन्होंने सत्ता के लिए कोई ललक नहीं दिखाई है जैसी की अमर सिंह की तरफ़ से नज़र आई. कुछ विश्लेषक यही कह रहे हैं कि कांग्रेस अमर सिंह से अपनी नाराज़गी का बदला ले रही है. अब सारी तरह की पहल अपनी तरफ़ से ही करने के बाद अमर सिंह कह रहे हैं कि केंद्र में समर्थक दलों को सरकार में भी शामिल होना चाहिए क्योंकि इससे सरकार की स्थिरता सुनिश्चित होगी. मज़े की बात तो ये है कि तीन सीटें लेने वाले अजीत सिंह भी सत्ता में भागीदारी की हिमायत कर रहे हैं. दूसरी तरफ़ वामपंथी दल हैं जिन्होंने सरकार में शामिल होने में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई जिससे यह दबाव तो बन रहा है कि क्या अमर सिंह, अजीत सिंह और पासवान जैसे नेता वामपंथी दलों से कुछ सबक़ ले सकते हैं. बहलहाल सत्ता पाने की क़वायदों के ऊँट जिस करवट भी बैठें लेकिन इस चुनाव में बड़ा उलटफेर होने के साथ ही एक नई रिवायत भी बनी है कि अब उत्तर प्रदेश की अहमियत देश की गद्दी के लिए ज़्यादा नहीं बची है. यह भारतीय लोकतंत्र का एक और चेहरा है. |
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