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शेयर बाज़ार में ऐतिहासिक गिरावट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली में सत्ता परिवर्तन ने भारत के शेयर बाज़ार में हलचल पैदा कर दी और सूचकांक में ऐतिहासिक गिरावट हुई. मुंबई शेयर बाज़ार में 30 शेयरों का सूचकांक एक समय 800 से भी अधिक अंक गिर गया था. मगर दोपहर बाद स्थिति में सुधार आया और दिन का कारोबार ख़त्म होने पर सेंसेक्स 300 अंक ऊपर चढ़ा. सेंसेक्स सुबह के मुक़ाबले 564 अंक नीचे जाकर बंद हुआ. 1992 के बाद से ऐसा पहली बार हुआ है जब शेयर बाज़ार में किसी एक दिन में सूचकांक इतना नीचे गया है. ऐतिहासिक गिरावट सोमवार को कारोबार की शुरूआत के चंद मिनटों के भीतर मुंबई शेयर बाज़ार में सूचकांक 550 अंक से भी नीचे चला गया. मुंबई शेयर बाज़ार के इतिहास में कारोबार की ये अभी तक की सबसे ख़राब शुरूआत थी और शेयरों के भाव 15 प्रतिशत गिर गए. कारोबार शुरू होने के लगभग 15 मिनट के भीतर ही शेयरों के भाव 10 प्रतिशत नीचे चले गए. स्थिति गंभीर होती देख बीएसई और एनएसई में कारोबार को दो-दो बार रोकना पड़ा. बाज़ार की हालत बिगड़ती देख काँग्रेस नेताओं मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी ने बयान भी जारी किए. उधर ऐसी ख़बरें चलीं कि वामपंथी पार्टियाँ सरकार में स्वयं शामिल नहीं हो रही हैं. समझा जा रहा है कि इन्हीं सब ख़बरों के बाद निवेशकों का विश्वास मज़बूत हुआ और बाज़ार की स्थिति संभली. कारोबार रूका कारोबार शुरू होने के कुछ ही देर बार जब शेयरों की कीमतें 10 प्रतिशत नीचे चली गईं तो कारोबार लगभग घंटे भर के लिए रोकना पड़ा. मगर बाज़ार दोबारा खुलने के बाद भी स्थिति नहीं संभली और तीन मिनट के भीतर ही शेयरों की कीमतें और पाँच प्रतिशत गिर गईं. इसके बाद कारोबार फिर दो घंटे के लिए रोक दिया गया. कारोबार को रोकना एक अत्यंत असामान्य बात मानी जाती है और 17 मई से पहले हर्षद मेहता के ज़माने में हुए घोटाले के वक़्त ही ऐसा करने की नौबत आई थी. शंका 13 मई को लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही शेयर बाज़ार में शंका का भाव था और शुक्रवार को सूचकांक 330 अंक नीचे चला गया था. शुक्रवार को बाज़ार की इस हालत का कारण वामपंथी दलों का विनिवेश विरोधी बयान माना गया. माना जा रहा है कि केंद्र में नई सरकार की आर्थिक नीतियों के बारे में अनिश्चय के कारण ही ऐसी स्थिति सामने आई है. भारत का उद्योग और व्यापार जगत में ये भय है कि नई सरकार में वाम दलों के प्रभाव के कारण निजीकरण की राह में बाधा आ सकती है और विदेशी निवेश पर विपरीत असर पड़ सकता है. आश्वासन कांग्रेस नेता मनमोहन सिंह ने बाज़ार की बुरी हालत के बीच निवेशकों को भरोसा दिलाया है कि काँग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार उदारीकरण की नीति जारी रखेगी. काँग्रेस की पिछली सरकार में वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह को भारत में उदारीकरण की नीति का जनक माना जाता है. उन्होंने पत्रकारों से कहा,"वित्तीय बाज़ार को डरने की कोई ज़रूरत नहीं है". मनमोहन सिंह ने साथ ही शेयर की कीमतों में गड़बड़ी करनेवालों को चेतावनी भी दी. उन्होंने कहा,"नई सरकार उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से नहीं हिचकेगी जो बाज़ार में गड़बड़ियाँ करने की कोशिश कर रहे हैं और कृत्रिम भय फैलाना चाह रहे हैं". काँग्रेस की ही सरकार में वित्तमंत्री रहे एक और नेता प्रणब मुखर्जी ने भी निवेशकों को भी आर्थिक नीतियों के बारे में भरोसा दिलाया है. प्रणब मुखर्जी ने कहा है,"हमारी कोशिश होगी कि बाज़ार के अनुकूल माहौल बनाया जाए. हम आठ से 10 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि की दर हासिल करना चाहते हैं". काँग्रेस नेता सोनिया गांधी ने प्रणब मुखर्जी को वामपंथी दलों और अन्य सहयोगियों के साथ बातचीत कर एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी है. इस कार्यक्रम में नई सरकार की आर्थिक और विदेश नीति का ख़ाका तैयार किया जाएगा. |
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