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आशंकाएँ हैं अर्थ-वित्त जगत में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय शेयर बाज़ार में हुई ऐतिहासिक गिरावट के दो कारण गिनाए जा सकते हैं. इनमें एक राजनीतिक और दूसरा आर्थिक है. लोकसभा चुनाव के 13 मई को आए नतीजों के बाद से अर्थ-वित्त जगत में ये आशंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं कि दिल्ली में बनने वाली सरकार चूँकि वामपंथियों के समर्थन से बन रही है इसलिए नई सरकार की आर्थिक नीतियाँ ख़ासकर विनिवेश और विदेशी पूंजी निवेश से संबधित नीतियाँ मौजूदा नीतियों से भिन्न होंगी. बाज़ार की ये आशंकाएँ निराधार भी नहीं हैं. कांग्रेस पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने वाली दो प्रमुख वामपंथी पार्टियों के नेता इन नेताओं की ओर से तो यहाँ तक कहा गया कि विनिवेश मंत्रालय ख़त्म कर दिया जाना चाहिए. इन्हीं आशंकाओं के चलते शुक्रवार से अब तक शेयर बाज़ार में बिकवाली ज़्यादा हुई और ख़रीद कम और ये शेयर बाज़ार का नियम है कि यदि सिर्फ़ बिकवाली हो और ख़रीद ना हो तो बाज़ार नीचे चला जाता है. गारंटी इसलिए ना सिर्फ़ शेयर बाज़ार बल्कि समूचा उद्योग जगत नई सरकार से ये गारंटी चाहता है कि पिछली सरकार ने जो आर्थिक नीतियाँ बनाई थीं उन्हें जारी रखा जाएगा.
यही वजह है कि पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनमोहन सिंह को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा और ये बयान देना पड़ा कि निजीकरण और उदारीकरण की प्रकिया जारी रखी जाएगी और गड़बड़ी फैलाने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाएगी. मनमोहन सिंह के इस बयान के बाद लगातार गिरता मुम्बई शेयर बाज़ार का सूचकांक कुछ स्थिर हो सका. दूसरी ओर वामपंथी दलों का आरोप है कि दक्षिणपंथी ताक़तें बाज़ार में डर पैदा करने का काम कर रही हैं ताकि अनिश्चितता का माहौल बना रहे. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी बर्धन ने तो इसके लिए सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार को दोषी ठहराया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि पहले सरकार ने जानबूझकर बाज़ार में उछाल पैदा किया था और अब सरकार गिरावट करवा रही है. पर साथ ही उनका ये भी कहना है कि वामपंथी दल स्थाई विकास के पक्ष में हैं और ऐसी नीतियाँ बनाए जाने के पक्षधर हैं जिनसे किसानों का विकास हो सके. सरकार की तत्परता एबी बर्धन चाहे जो कहें लेकिन मुंबई शेयर बाज़ार में हुई गिरावट के बाद निवर्तमान वित्तमंत्री जसवंत सिंह ने तत्परता दिखाई और बाज़ार को एलर्ट करते हुए नियामक संस्था सेबी और रिज़र्व बैंक को निर्देश दिए की वे शेयर बाज़ार को सुधारने के लिए आवश्यक क़दम उठाएँ.
आर्थिक विश्लेषक आलोक पुराणिक का मानना है कि शेयर बाज़ार में जो हलचल हो रही है उसके सामान्य होने में अभी छह माह का समय लगेगा और यह तभी स्पष्ट हो पाएगा कि पिछले एक वर्ष से चढ़ाव का जो दौर चल रहा था वह जारी रह पाएगा या नहीं. कुछ लोगों का ये भी मानना है कि सोमवार को शेयर बाज़ार में हुई गिरावट के दौरान जिस तरह 'सोनिया गांधी मुर्दाबाद' और 'नई सरकार वापस जाओ' के नारे लगे उससे इस उथल पुथल के पीछे स्पष्ट रुप से राजनीतिक हाथ नज़र आता है. एक वर्ग का ये भी कहना है कि उद्योगपतियों का एक गुट समाजवादी पार्टी को नई सरकार में शामिल कराए जाने का पक्षधर है और इसलिए बाज़ार में ये उथल पुथल कराई गई है. उल्लेखनीय है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के मुंबई के उद्योग जगत ख़ासकर अंबानी परिवार के साथ गहरे रिश्ते हैं. बहरहाल ये तो अभी नई सरकार के गठन और उस गठबंधन सरकार के न्यूनतम सरकार साझा कार्यक्रम बनने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि शेयर बाज़ार और उद्योग जगत का रुख़ क्या रहता है. |
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