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बाज़ार का ध्यान स्थिरता पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बाज़ार की राजनीति में शायद उतनी ही रुचि है जितनी की हमारी और आपकी. ये बात और है कि जहाँ अमूमन लोगों का झुकाव किसी विशेष गुट या पार्टी की तरफ रहता है वहीं बाज़ार की पसंद-नापसंद टिकी रहती है स्थिरता पर. जो स्थिरता दे वही होती है बाज़ार की पसंदीदा सरकार. इस मामले में 2004 के चुनाव अलग नहीं रहे. मतगणना की सुबह बाज़ार कमज़ोर खुला. डर था कि कहीं मतदान बाद हुए सर्वेक्षणों के परिणम सच न साबित हों. बाज़ार को एक विभाजित जनादेश का डर था. 5234 अंक पर खुलने के बाद सेंसेक्स पिछले 22 सप्ताह के अपने न्यूनतम स्तर, 5131 तक जा पहुँचा. बाज़ार के खुलते ही 227 अंकों की बड़ी गिरावट आई. लेकिन फिर जैसे जैसे परिणाम आने लगे और कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन को बढ़त मिलने लगी, बाज़ार में भी धीरे-धीरे तेज़ी आने लगी. स्पष्ट जनादेश के साफ आसार के नज़र आने के साथ साथ बाज़ार में निवेशकों का विश्वास भी लौटने लगा. लेकिन ऐसा नहीं कि चिंता का दौर समाप्त हो चुका है. बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि नई सरकार में वामपंथी दलों की क्या भूमिका होगी. दिल्ली शेयर बाज़ार के पूर्व अध्यक्ष अशोक अग्रवाल को आशंका है कि "शायद वामपंथी दल आर्थिक सुधारों की गति को धीमा कर दें." इसके अलावा उनके अनुसार बाज़ार को अब इंतज़ार है ‘नायक’ यानी नए वित्त मंत्री का. लेकिन कोलकाता स्थित आरपीजी समूह के अध्यक्ष संजीव गोयनका का मानना है कि "समय के साथ-साथ अब आर्थिक सुधारों के प्रति वामपंथी दल का नज़रिया बदल रहा है." उनका मानना है कि चाहे अब किसी की भी सरकार क्यों न हो आर्थिक सुधारों पर कोई असर नहीं पडेगा. 1999 में सत्ता में आने के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक सरकार ने विदेशी निवेशकों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बैंकिंग, टेलीकॉम और इंशयोरेंस के क्षेत्र को खोलने के अलावा सरकारी उपक्रमों के निजीकरण पर सरकार ने अपना निशाना साधा. त्रिशंकु संसद की आशंका को देखते हुए विदेशी निवेशकों ने पिछले सप्ताह जमकर बिकवाली की. लेकिन अब स्थिरता की संभावना को देखते हुए एशिया की इस तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में शायद उनका विश्वास बना रहे. ...कम ये कम बाज़ार को तो यही उम्मीद है. |
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