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दिल्ली की सात सीटों पर अच्छा मुक़ाबला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सत्ता में आई पार्टी कम से कम साल भर के अंदर लोगों का विश्वास नहीं खोती और इस बीच हुए चुनाव में उसे दोबारा वोटरों का विश्वास मिलता है. भारतीय लोकतंत्र के इस लौह नियम को अगर हम दिल्ली से लोकसभा की सातों सीटों पर लागू करें तो परिणाम का अंदाज़ा हो सकता है. दिसंबर 2003 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने दिल्ली में प्रभावी जीत दर्ज की थी और उस क़िस्म का प्रदर्शन फिर हुआ तो वह सातों सीटें जीत लेगी. अगर शासक दल के पाँच फीसदी वोट खिसक कर दूसरी तरफ गए तब भी भाजपा सिर्फ एक सीट जीत पाएगी. अगर भाजपा राजस्थान और मध्यप्रदेश के बारे में निश्चिंत लगती है तो दिल्ली के लिए कांग्रेस भी इसी स्थिति में लगती है. कांग्रेस का अनुभव पर दिल्ली में काँग्रेस इतनी निश्चिंत भी नहीं, उसके भी ठोस कारण हैं. मुल्क की यह राजधानी लोकसभा चुनाव के मामले में भाजपा को ज़्यादा तरजीह देती रही है. 1984 में राजीव लहर में दिल्ली की सातों सीटें जीतने के बाद से कांग्रेस पार्टी यहाँ दो से ज़्यादा सीटें नहीं जीत पाई है. इस बीच कांग्रेस ने राज्य की सत्ता पाई, दोबारा प्रभावशाली जीत दर्ज की. लेकिन लोकसभा चुनाव के मामले में उनका आत्मविश्वास कुछ डांवाडोल ही रहा करता है. 1998 में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में ज़बरदस्त जीत दर्ज की थी लेकिन 1999 के लोकसभा चुनाव में उसे यहाँ से एक भी सीट नहीं मिली. इस बार भी विधानसभा चुनाव जीतने के बाद अब कांग्रेस लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरी है तो उसे पिछला अनुभव याद आ रहा है. भाजपा के अनुकूल दिल्ली की सामाजिक बनावट भी भाजपा के कुछ अनुकूल बैठती है.
आख़िर यहीं उस वर्ग के ज़्यादा लोग रहते हैं जिन्हें नई आर्थिक नीतियों से लाभ हुआ है और जिनके लिए 'भारत उदय' तथा 'फील गुड' का प्रचार किया गया है. मध्य वर्ग और नौकरीपेशा लोगों के बीच प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता भी भाजपा को बल देती है. दिल्ली का जातिगत बंटवारा भी उसके हक़ में है क्योंकि यहां अगड़ों की आबादी अधिक है. फिर दिल्ली के पंजाबियों में भाजपा का अच्छा आधार है. सो भाजपा कम से कम दिल्ली में अटल लहर बनाने और विधानसभा चुनाव की हवा को बदलने की तैयारी में लगती है. ऐसा हो पाए या नहीं, पर पार्टी यही चाहती है. पर विधानसभा चुनाव के बाद कुछ महीनों में ही काफी बदलाव हुए हैं. स्थितियां जटिल हुई हैं तथा कांग्रेस हो या भाजपा, कोई भी इन सात सीटों को अपनी झोली में मानकर नहीं चल सकता. सामाजिक बनावट दिल्ली में भले ही मध्य वर्ग का आकार काफी बड़ा हो पर बुनीयादी तथ्य यही है कि यह मुख्यतः मजदूरों का ही शहर है. दिल्ली के दो सबसे बड़े चुनाव क्षेत्रों, पूर्वी और बाहरी दिल्ली में काफी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर रहते हैं. कांग्रेस को इन मजदूरों के वोट काफी संख्या में मिलते रहे हैं. बल्कि दिल्ली वर्ग आधारित मतदान का सबसे बढ़िया उदाहरण है. मतदाता जितना ग़रीब हो उसके कांग्रेस के पक्ष में मत डालने की संभावना ज्यादा है. जैसे-जैसे पैसे वाला मतदाता सामने आता है उसके भाजपा के पक्ष में जाने की संभावना बढ़ती जाती है. कांग्रेस दिल्ली के जातिगत समीकरणों में भी अच्छे ढंग से घुसी है. शीला दीक्षित के चलते कांग्रेस को अगड़ी जातियों में ठीक-ठाक समर्थन मिला है जबकि मध्य वर्ग में भी पार्टी ने अपना आधार बनाया है. फिर दलितों और मुसलमानों में भाजपा से काफी आगे होने के चलते वह अगड़ों और पैसे वालों में थोड़ा पीछे रहने की भरपूर भरपाई कर लेती है. दिल्ली में दलित और मुसलमान मतदाताओं की संख्या कुल मतदाताओं में एक तिहाई है. लोकसभा चुनाव में अक्सर बढ़त लेने की भाजपा की सुविधा और कांग्रेस द्वारा हाल के विधानसभा चुनाव जीतने के लाभ के चलते इस बार दिल्ली में बहुत दिलचस्प लड़ाई होगी और दोनों दलों ने अच्छे उम्मीदवार उतारकर लड़ाई को और भी दिलचस्प बना दिया है. हालांकि कांग्रेस पर यह आरोप लग सकता है कि हल्के या अगंभीर क़िस्म के उम्मीदवार दिए हैं. सीट-दर-सीट भाजपा ने अपने छह पुराने सांसदों को मैदान में उतारा है और संभव है कि उन्हें पिछले कार्यकाल के चलते कुछ परेशानी हो. संभवतः यही नाराज़गी देखकर चांदनी चौक के सांसद विजय गोयल ने इस बार मदनलाल खुराना के राज्यपाल बनने से खाली हुई सदर सीट से टिकट लिया है.
चाँदनी चौक में जनता दल (एस) का उम्मीदवार, जो कई बार से अच्छे ख़ासे मुसलमान वोट ले जाता था, के न आने से कांग्रेस उम्मीदवार कपिल सिब्बल काफी मज़बूत स्थिति में लगते हैं. 1984 के दंगों के लिए जिम्मेदार बताए जाने वाले सज्जन कुमार जो अब अदालतों द्वारा पाक-साफ घोषित हो चुके हैं, के आ जाने से बाहरी दिल्ली में केंद्रीय मंत्री साहिब सिंह के लिए गंभीर चुनौती हो गई है. इसी प्रकार पूर्वी दिल्ली से शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित के चुनाव लड़ने से पार्टी कार्यकर्ताओं के ज्यादा जोरशोर से लगने की उम्मीद बढ़ गई है. दूसरी तरफ भाजपा दक्षिण दिल्ली में ख़ुद को मज़बूत महसूस करती है. अपेक्षाकृत समृद्ध लोगों के इस इलाक़े में भाजपा सांसद विजय कुमार मल्होत्रा का मुकाबला कांग्रेस के आरके आनंद से है. दिल्ली सदर में भी भाजपा का रिकार्ड बेहतर रहा है. पर इस बार कांग्रेस टिकट पर जगदीश टाइटलर के आ जाने से विजय गोयल के लिए परेशानियां बढ़ गई हैं. नई दिल्ली चुनाव क्षेत्र में स्थानीय की जगह राष्ट्रीय मुद्दे ही हावी रहते हैं और यह सीट भाजपा उम्मीदवार केन्द्रीय मंत्री जगमोहन के पास है. यहाँ से कांग्रेस के अजय माकन चुनाव मैदान में हैं. सातवीं सीट करोल बाग की है जहां से भाजपा की अनीता आर्य सांसद हैं. इस बार भी वे उम्मीदवार हैं पर इस सुरक्षित सीट पर उनको असुरक्षा महसूस हो सकती है. दिल्ली सरकार की मंत्री कृष्णा तीरथ उनके मुकाबले में हैं. पर यहां कांग्रेस को बसपा का उम्मीदवार नुकसान पहुंच सकता है. वैसे बसपा ने दिल्ली की सातों सीटों से उम्मीदवार दिए हैं और वे प्रायः कांग्रेस के वोट बैंक में ही सेंध लगाएँगे. |
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