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मध्यप्रदेश में कांग्रेस घाटे में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मध्य प्रदेश में कांग्रेस के लिए हालात अच्छे नहीं लगते. अगर भारतीय लोकतंत्र का यह पक्का नियम यहाँ लागू करें और लोग विधानसभा चुनाव की तरह ही वोट डालें तो भाजपा यहाँ की सारी सीटें जीत लेगी. वोटों का गणित अभी ऐसा बन गया है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिले वोटों में अब जितने प्रतिशत की कमी आएगी, शुरू में कांग्रेस को सिर्फ उतनी ही सीटें मिल पाएंगी. जब वोटों में गिरावट 5 फ़ीसदी से ज्यादा होगी, तभी कांग्रेस की सीटों में तेजी से वृद्धि होगी. पांच फीसदी गिरावट पर उसे 9 सीटें मिलेंगी अर्थात् पिछले लोकसभा चुनाव जितनी ही. सो यह तय मानें कि अगर मात्र चार महीनों के शासन में उमा भारती सरकार अचानक बहुत अलोकप्रिय नहीं हो गई हो तो मध्यप्रदेश में सत्ताधारी भाजपा झाड़ू फेरने जा रही है. इतना ही नहीं, मध्य प्रदेश में भाजपा का इतिहास विधानसभा की तुलना में लोकसभा में बेहतर प्रदर्शन करने का भी रहा है. छत्तीसगढ़ बनने के बाद मध्यप्रदेश के हिस्से में बची 230 विधानसभा सीटों का विश्लेषण बताता है कि 1993 और 1998 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा को लगभग बराबर अनुपात में वोट मिले. पर कांग्रेस विधानसभा में ज्यादा संख्या में सीटें जीत गई जबकि भाजपा ने 1991, 1998 और 1999 के लोकसभा के चुनावों में 20 से ज्यादा सीटें जीत लीं. राज्य में अपनी पसंद को दरकिनार करते हुए मध्यप्रदेश के मतदाताओं ने केन्द्र की सत्ता के लिए भाजपा के दावे का समर्थन किया. इस बार इस बार मतदाताओं का मन दो स्तर पर चलता नहीं लगता. राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विपरीत मध्यप्रदेश में भाजपा निर्णायक ढंग से विधानसभा चुनाव जीती थी. उसे मिले 42.5 फीसदी वोट कई राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा भले ही न लगते हों पर कांग्रेस से उसकी बढ़त 11 फीसदी वोटों की रही और कांग्रेस को अब तक की सबसे बड़ी पराजय झेलनी पड़ी. भाजपा को तीन चौथाई सीटें मिलीं. 1999 के लोकसभा चुनाव में मिली पराजय के बावजूद महाकौशल के अपने पुराने गढ़ में कांग्रेस मजबूत बनी रही थी. भाजपा को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की फुलवाड़ी मालवा में निर्णायक बढ़त मिली थी लेकिन इसी इलाक़े के आदिवासी अंचलों में उसे नुक़सान भी उठाना पड़ा था. चंबल और विंध्य प्रदेश में कांग्रेस और बसपा के बीच वोट बिखरने का लाभ भाजपा को हुआ. पर हाल के विधानसभा चुनाव में इस तरह के बँटवारे और प्रभाव क्षेत्रों वाला गणित बेमानी हो गया और हर जगह भाजपा का झंडा लहराने लगा. मालवा पर तो उसका कब्जा रहा ही, महाकौशल के आदिवासी वोट कांग्रेस और गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी के बीच बँटने से यहाँ भी उसका पूरा कब्जा हो गया. बसपा की मौजूदगी से एक बार फिर भाजपा को विंध्य-चंबल इलाके में लाभ मिला. कांग्रेस के जिस सतरंगी सामाजिक समीकरण का लाभ मुल्क के सभी इलाकों में रहा करता था, वह भी मध्यप्रदेश में टूट गया. पारंपरिक रूप से अगड़ी जातियों का वोट भाजपा को और पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों का वोट कांग्रेस को जाता था. 1990 के मध्य तक उत्तरी क्षेत्र में कांग्रेस का मुख्य प्रतिद्वंद्वी होकर उभरी भाजपा ने कांग्रेस के दलित वोट बैंक पर काफी हद तक हाथ साफ कर दिया. आदिवासी वोट
उमा भारती को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपने का मतलब पिछड़ों वोटरों को लुभाना था और सीएसडीएस सर्वेक्षण इसकी पुष्टि करता है. संघ परिवार के संगठनों ने आदिवासियों के बीच खासतौर से काम किया. आदिवासी वोट गोंडवाणा पार्टी के उभरने से भी बँटे और कांग्रेस का यह पारंपरिक वोट बैंक भी काफी घट गया. पुराने सारे समर्थकों की संख्या बहुत कम हो गई है. मुसलमानों का समर्थन ठोस बचा है. राज्य की जो खबरें आ रही हैं या जो राजनीतिक समीकरण उभर रहे हैं, उनसे नहीं लगता कि लोकसभा चुनाव में इस सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों में कोई बड़ा बदलाव होगा. फिर कांग्रेस विधानसभा चुनावों में पिटने के बाद अभी तक संभली नहीं है. उसके नेतृत्व में भी भारी फ़र्क आ गया है. अर्जुन सिंह की अब राज्य की राजनीति में खास पकड़ नहीं रही. मोतीलाल वोरा और श्यामाचरण शुक्ल, जो मध्य प्रदेश में सक्रिय रहे हैं, वे छत्तीसगढ़ में चले गए हैं. (मध्यप्रदेश में भाजपा की स्थिति पर योगेंद्र यादव के विश्लेषण पढ़िए दूसरी किस्त में.) |
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