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उड़ीसा में कांग्रेस बेहतरी की उम्मीद कर सकती है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कांग्रेस की चुनावी रणनीति में इस बार उड़ीसा को निश्चित रूप से सबसे ऊपर होना चाहिए. अगर कांग्रेस को इस बार अपनी स्थिति मज़बूत करनी है तो उड़ीसा एक ऐसा राज्य है जहाँ से वह काफ़ी सीटें बढ़ा सकती है. कांग्रेस को पश्चिमी मोर्चे पर हो रहे नुक़सान के मद्देनजर अगर पूर्वी मोर्चे पर उसकी भरपाई करनी है तो उड़ीसा में उसे कम से कम दस नई सीटें जीतनी होंगी. राज्य में विधानसभा चुनाव भी लोक सभा चुनाव के साथ ही हो रहे हैं जबकि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अगले साल के शुरु में पूरा होना था. इससे राज्य में कांग्रेस का दाव और ज्यादा बढ़ गया है और कांग्रेस के पास इस राज्य में ज़्यादा उम्मीद लगाने के ठोस कारण भी हैं. कांग्रेस की स्थिति पहली वजह तो यही है कि अब इस राज्य में नुक़सान कुछ भी नहीं हो सकता, जो होगा फ़ायदा ही होगा. पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एकदम धुल गई थी. राज्य की 21 लोकसभा सीटों में से उसे मात्र 2 सीटें मिली थीं और भाजपा-बीजू जनता दल गठबंधन को कांग्रेस से 20 फ़ीसदी ज़्यादा मत मिले थे. लोकसभा चुनाव में कुछ महीने बाद ही हुए विधानसभा चुनाव में भी वैसे ही नतीजे आए और सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी पूरी तरह धुल गई थी. उसे 147 सदस्यों वाली विधानसभा में सिर्फ 26 सीटें मिली थीं. भाजपा - बीजद गठबंधन को 126 सीटें मिलीं और वोटों के हिसाब से कांग्रेस पर उसकी बढ़त 14 फ़ीसदी की थी. अब इस बार तो कांग्रेस की स्थिति पहले से सुधरेगी ही क्योंकि चुनाव में मिटने के बावजूद राज्य की राजनीति में उसका वजूद ठीक-ठाक रहा जबकि कई राज्यों में वह मुख्य मुक़ाबले से बाहर भी हो गई. पार्टी का राज्य में एक तिहाई से लेकर 40 फीसदी तक का वोट आधार बचा है और उस आधार पर वह फिर से बाज़ी जीत सकती है. पुराना इतिहास राज्य में ऐसे उतार-चढ़ाव पहले भी आते रहे हैं. कांग्रेस इससे भी बदतर वक़्त देख चुकी है. 1990 के विधानसभा चुनाव में तो उसे मात्र 10 सीटें ही मिली थीं लेकिन अगले ही चुनाव में वह सत्ता में आ गई थी. तब उसे जनता दल के दो प्रमुख नेताओं - श्रीकांत जेना और भक्तचरण दास के पार्टी में आने से काफ़ी लाभ हुआ था. पिछले चुनाव के बाद से राज्य की राजनीति में जो कुछ बड़े बदलाव हुए हैं उन पर नज़र डालने से इस संभावना को बल मिलता है. बीजद की राजनीति मुख्यमंत्री नवीन पटनायक अपने पिता बीजू पटनायक के मुक़ाबले बहुत ही छोटे क़द और प्रभाव के नेता हैं. वे ऐसे क्षेत्रीय नेता हैं जिन्हें अपने क्षेत्र की भाषा भी नहीं आती. फिर उनके राजनैतिक साथी भी एक-एक करके उनसे दूर जाते रहे हैं. और पार्टी से दूटे ज्यादादर लोगों ने उड़ीसा गण परिषद नाम से एक क्षेत्रीय दल भी बनाया और कांग्रेस के अनेक लोग इसमें चले गए थे. बीजद का भाजपा के साथ तालमेल भी संतोषजनक ढंग से नहीं चला है. भाजपा की राज्य इकाई प्रदेश सरकार के कामकाज की आलोचक रही है. और बीजद राजग का एकमात्र ऐसा घटक दल है जिसकी सरकार को केन्द्र से भरपूर मदद नहीं मिली है. ज़ाहिर तौर पर ये चीजें कांग्रेस के लिए अच्छा अवसर पैदा करती हैं फिर भी चुनाव के बारे में अभी तक जो सूचनाएँ और संकेत मिल रहे हैं उनसे कांग्रेस की जीत का निष्कर्ष निकालना मुश्किल है. अनेक जनमत संग्रहों से यह बात स्पष्ट हुई है कि बीजद-भाजपा की लोकप्रियता में कमी आई है. यह संभव है कि ये सर्वेक्षेण असलियत से कुछ दूर हों और लोगों में और भी ज़्यादा नाराज़गी हो. पर उनका रुख़ बदलने वाले संकेत तो सामने आए ही हैं और इनकी थोड़ी व्याख्या ज़रूरी है. गठबंधन और इस क्रम में जैसे ही आप राज्य के चुनावी आँकड़ों पर नज़र डालते हैं यह साफ़ हो जाता है कि कांग्रेस का काम इतना आसान नहीं है जैसा कि ऊपर से दिखाई देता है. पिछले एक दशक में कांग्रेस न सिर्फ कई बार पिटी है बल्कि इसके समर्थन के आधार में दीर्घकालिक कमी आई है. 1995 के विधानसभा चुनाव में उसे जीत मिली थी लेकिन वह बहुत मामूली थी. तब उसे मिले वोटों का अनुपात 40 फ़ीसदी भी नहीं था जबकि इससे पहले प्रदेश में उसे कई बार 50 फ़ीसदी से भी ज्यादा वोट मिल चुके हैं. इसके बाद हुए हर संसदीय चुनाव में कांग्रेस के वोट कम ही होते गए हैं. उत्तरी क्षेत्र के आदिवासी आधार के खिसकने को लेकर कांग्रेस को ख़ास चिंतित होना चाहिए. झारखंड और बंगाल की सीमा से लगे इस इलाके में मुख्यतः संथाल रहते हैं जिनमें झारखंड मुक्ति मोर्चा की पैठ है. कांग्रेस ने राज्य के दक्षिणी क्षेत्र के आदिवासियों पर अपनी पकड़ बनाए रखी है. पश्चिमी उड़ीसा के पिछड़े इलाके में भी कांग्रेस का आधार खिसका है. यह देखकर संभावना लगती है कि कांग्रेस सत्ता में वापस लौटने की बहुत अच्छी स्थिति में न हो. संभवतः इन्हीं हालात के मद्देनज़र कांग्रेसी नेतृत्व ने भी यह समझा और उसने गठबंधन की पहल की. उसने झारखंड मुक्ति मोर्चा, उड़ीसा संग्राम समिति और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया है और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से भी उसके गठबंधन की बात चली है. लेकिन ये सभी दल अब उड़ीसा की राजनीति के छोटे खिलाड़ी हैं और कांग्रेस को उसका आधार वापस दिलाने में सक्षम नहीं हो सकते. और दूसरा खेमा ज़्यादा तैयार लग रहा है. भाजपा-बीजद गठबंधन बेहतर स्थिति में है. 1991 तक भाजपा राज्य की राजनीति में हाशिए पर थी. इसने पश्चिमी उड़ीसा से पैर पसारना शुरू किया जहाँ पिछड़ापन और क्षेत्रीय भेदभाव का मुद्दा राजनैतिक रूप लेने लगा था. इसके अलावा भाजपा ने छत्तीसगढ़ और झारखंड की तरह यहाँ भी संघ की मार्फ़त आदिवासियों में अच्छा काम किया. इस प्रकार भाजपा और बीजद दोनों का अलग-अलग सामाजिक आधार एक दूसरे को मदद देने वाला बन गया. बीजद राज्य के सबसे बड़े और अपेक्षाकृत विकसित तटीय इलाके में मज़बूत है और समाज के सभी वर्गों में उसका आधार है जैसा कि सभी क्षेत्रीय दलों का होता है. उड़ीसा देश के उन कुछ ऐसे गिने-चुने राज्यों में है जहाँ अभी जाति या वर्ग के आधार पर वोट नहीं पड़ते. यहाँ मंडल का भी ख़ास असर नहीं हुआ है और किसी बड़ी किसान जाति के न होने से राजनीति पर अब भी उच्च जातियों के छोटे समूह का ही क़ब्जा है. राजनैतिकरण और चुनाव में भागीदारी, दोनों मामलों में अभी पूरी तरह यह राज्य नहीं जागा है और इसका असर यह होता है कि ऊपर का छोटा समूह ही जो करता है उसी से नतीजे प्रभावित होते हैं. और अपनी सारी स्पष्ट नाकामियों के बावजूद मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने अपनी साफ़ छवि बनाए रखी है और यह बात उनके मंत्रियों या दल छोड़कर जाने वाले प्रमुख नेताओं के बारे में नहीं कही जा सकती. इससे नवीन पटनायक का क़द बढ़ा है. दूसरी और कांग्रेस में सत्ता में वापस लौटने की सामूहिक बेचैनी या तत्परता अभी तक नहीं दिखती. गोमांग परिवार में टिकट को लेकर जो झगड़ा हुआ वैसा सिर-फुटव्वल पार्टी में बहुत ज़्यादा है. कांग्रेस के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जिसे नवीन पटनायक के मुक़ाबले मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश किया जा सके. ऐसी स्थिति में कांग्रेस को मुश्किल लड़ाई लड़नी है. यही राजग के दस फ़ीसदी वोट खिसककर कांग्रेस के हिस्से में आएँ तब जाकर कांग्रेस लोकसभा की सीटों में बराबरी पर और विधानसभा में जीत हासिल कर सकेगी. अगर राजग के वोट थोड़ा खिसके भी तो उससे कांग्रेस को ख़ास लाभ नहीं होगा. हाँ, कांग्रेस अगर पाँच फीसदी से ज़्यादा वोट खिसकाना शुरु करेगी तब जाकर उसे लाभ मिलना शुरू होगा. और यह असंभव नहीं है लेकिन प्रदेश में कांग्रेस संगठन की स्थिति देखते हुए यह काम आसान भी नहीं लगता. |
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