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असम पर है भाजपा की नज़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पूरे पूर्वी भारत में भाजपा को अपनी स्थिति में सबसे ज्यादा सुधार होने की उम्मीद अगर किसी राज्य में है तो वह असम ही है. अन्य राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगी दल या तो पहले ही बहुत ज्यादा सीटें जीतकर अब आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं है (जैसा बिहार और उड़ीसा में है) या फिर उनके लिए कोई उम्मीद ही नहीं है (जैसा कि पश्चिम बंगाल में है). असम में भाजपा के लिए अपनी स्थिति सुधार सकने की बहुत अच्छी संभावनाएँ हैं क्योंकि पिछले चुनाव में यहाँ की 14 में से मात्र दो सीटें ही उसे मिली थीं जबकि कांग्रेस ने 10 सीटें जीती थीं. उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में काफी अच्छी जीत पाकर कांग्रेस अब सत्ता में है. भाजपा के लिए इस बार राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने के अच्छे अवसर भी लग रहे हैं. यही कारण है कि दक्षिण में कर्नाटक की तरह ही पूरब में वह असम पर काफी ध्यान, संसाधन और ऊर्जा लगा रही है. कठिन चुनौती लेकिन यहाँ बहुत अच्छा प्रदर्शन करना बहुत आसान भी नहीं है. असम मुल्क के उन कुछेक राज्यों में है जहां 1990 के दशक में कांग्रेस ने अपनी स्थिति सुधारी और मजबूत की है. 1990 के दशक के शुरु में हुए बहिरागत विरोधी आंदोलन के चलते कांग्रेस काफी कमजोर हुई थी और 1983 के रक्तरंजित चुनाव में उसे भले ही जीत मिली हो पर वह उसकी लोकप्रियता का प्रतीक न थी. 1985 में असम गण परिषद सत्ता में आया और लगा कि अब कांग्रेसी प्रभुत्व के दिन लद गए.
पर तेलुगु देशम पार्टी की तरह, जो उन्हीं दिनों आंध्र में सत्ता में आई थी, अगप में मजबूती न दिखाई और असमिया लोगों का यह राजनीतिक प्रयोग असफल रहा. 1991 में कांग्रेस सत्ता में वापस आई और फिर उसने लोकसभा चुनावों में भी अच्छी सफलता हासिल की. 1996 के चुनावों में, जब लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ हुए, लोगों ने अगप को फिर मौका दिया और दोनों ही स्तरों पर उसके लोग बड़ी संख्या में जीते. पर कुछेक वर्षों में ही अगप की हालत और बदतर हो गई, भ्रष्टाचार के मामलों और आपसी लड़ाई ने उनकी स्थिति खराब कर दी. 1998 और 1999 में कांग्रेस ने 14 में से 10-10 सीटें जीतीं और 2001 में हुए विधानसभा चुनाव में भी स्पष्ट बहुमत हासिल करके राज्य में सरकार का गठन किया. एक ओर राज्य में अगप तथा कांग्रेस की लड़ाई और फिर धीरे-धीरे अगप का राजनैतिक अवसान होता रहा तथा दूसरी ओर भाजपा अपनी ताकत बढ़ाती गई और अगप की जगह लेती गई. राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद हुए 1991 के चुनाव से ही भाजपा ने राज्य में अपना खाता खोल दिया था. लोकसभा चुनाव में इसने बराक घाटी की दो सीटें जीती थीं, हालांकि तब से उसे राज्य में 10 फीसदी से कम वोट मिले थे.
पर इसके बाद हुए हरेक लोकसभा चुनाव में भाजपा के वोटों का प्रतिशत बढ़ा है, पार्टी नए इलाकों तक पहुंची है. 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को लगभग 30 फीसदी वोट मिले और उसे लग गया कि अब वह कांग्रेस का मुकाबला कर सकती है. और ऐसा करने के लिए उसके पास दो विकल्प थे- अगप के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ने का या फिर अकेले लड़ने का. पहले विकल्प को भाजपा ने 2001 के विधानसभा चुनाव में अपनाया और बुरी तरह पिटी. फिर उसने अपनी राज्य इकाई के भारी विरोध के बावजूद अगप के साथ समझौता किया. दोनों ही पार्टियों के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता मन से इस गठबंधन को स्वीकार नहीं कर पाए और अपने-अपने वोटों को गठबंधन के साझीदार को दिलाने में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं ली. इसलिए जो गठबंधन कागज पर तो कांग्रेस के बराबर की ताकत वाला लग रहा था, चुनाव में खास सफल नहीं हो पाया. अपने कार्यकर्ताओं का मन भांपकर इस बार भाजपा ने गठबंधन के लिए दबाव नहीं डाला, अगप की ओर से भी खास गर्मजोशी नहीं थी. महंत का अंत वहाँ प्रफुल्ल कुमार महंत का नेतृत्व अब समाप्त हो गया है और हाल में वे वृंदावन गोस्वामी से अध्यक्ष पद का चुनाव हार गए हैं.
नए नेता अब पार्टी को अपने पैरों पर खड़ा करने में दिलचस्पी रखते हैं. वे महंत के पुराने प्रतिद्वंद्वी भृगु फूकन को फिर से पार्टी में लाने में सफल रहे हैं. अगप के फिर से खड़ा होने से लग रहा है कि लोकसभा के मुकाबले त्रिकोणीय होंगे, असम का जो जातीय समीकरण है उसमें ऐसे मुकाबले कांग्रेस के लिए बेहतर है. पिछले दो दशकों में यहाँ के विभिन्न जातीय और आदिवासी समूहों के बीच की दूरियाँ बढ़ती गई हैं. पहले कांग्रेस ही असमिया राष्ट्रीयता का प्रतिनिधित्व करती थी और उसे सबसे प्रभावी हिंदू असमिया समाज का वोट मिलने के साथ ही अन्य अल्पसंख्यक जमातों का वोट मिलता था. असम आंदोलन ने यह समीकरण उलट दिया. जातीय समीकरण असमिया हिंदुओं में कांग्रेस का समर्थन काफी घट गया और अब कांग्रेस मुख्यतः अल्पसंख्यकों और बहिरागत समुदाय-बंगाली हिंदू प्रवासी, गैर असमिया बगान मज़दूर-की पार्टी हो गई थी. राज्य के जनजातीय जमातों के साथ मिलकर ये वोट बहुमत बना देते हैं, फिर भी कांग्रेस पस्तहाल ही रही. अभी अगप के बारे में बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता, उसका भविष्य ही दाँव पर है.
सिर्फ हिंदू असमिया समाज में उसका बचा-खुचा आधार उसे बहुमत तो नहीं ही दिला पाएगा, उसको जिंदा भी रख पाएगा या नहीं-यह कहना मुश्किल है. जब वह सत्ता में थी तब भी उसने प्रवासी मजदूरों के साथ अच्छा संबंध विकसित करने का प्रयास नहीं किया. सो अब वह यूनाइटेड माइनारिटी फ्रंट या अनेक जनजातीय दलों के साथ गठबंधन करके ही मुख्य चुनावी मुकाबले में बना रह सकता है. भाजपा असमिया राष्ट्रवाद को हिंदू राष्ट्रवाद में बदलने का जतन करके अगप के असली आधार को खिसकाने में जुटी है. उसे हिंदू, बंगाली, बहिरागतों से भी उम्मीद है क्योंकि मुसलमानों से उनका टकराव चलता है. यही कारण है कि असम में भाजपा की ताकत सबसे पहले बराक घाटी में ही बनी जहाँ मुस्लिम बहिरागतों की तादाद सबसे ज्यादा है. धीरे-धीरे भाजपा का प्रभाव क्षेत्र निचले और ऊपरी असम में भी बढ़ा जो अगप के असली मजबूत इलाके थे. असमिया ऊँची जाति के हिंदू मतों में बँटवारा होना कांग्रेस को फायदा पहुँचाएगा, क्योंकि इससे भाजपा इस जमात में निर्णायक बढ़त नहीं ले पाएगी. पिछड़ी जाति के हिंदुओं में कांग्रेस और भाजपा बराबर रह सकते है जबकि कांग्रेस के अनुसूचित जाति के वोटों और अपना दल न बनाने वाले आदिवासियों में बढ़त मिल सकती है. पर जनजातीय राजनीति कांग्रेस के लिए परेशानी का कारण भी बन सकती है. दो प्रमुख समूहों, कर्बी और बोड़ो का एक-एक संसदीय सीट पर भारी बहुमत है- कार्बी एंग्लांग स्वायत्त जिला और कोकराझार. कार्बी बहुल सीट पिछले चार चुनावों में मार्क्सवादी-लेलिनवादी आटोनोमस स्टेट डिमांड कमेटी को जाती रही है जिसका बाद में माकपा-माले में विलय हो गया. अब यह कमेटी भी टूट गई है पर जो जमात माले के साथ आया है वह मजबूत माना जाता है. पिछली बार कोकराझार सीट बोडो छात्र संघ समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार ने जीती थी. हिंदी-असमी टकराव बोडो छात्र संघ का प्रवासी हिंदी भाषी संथालों से लगातार टकराव रहा है.
यहां के सांसद ने राजग सरकार का समर्थन किया था और उम्मीद है यह सीट फिर उन्हें ही मिलेगी. इन दो सीटों को छोड़ दें तो असम का चुनावी गणित बहुत आसान है. अगर कांग्रेस पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव जितने वोट पाती है तो उसे दस सीटें मिलेंगी. लेकिन अगर उसके तीन फीसदी वोट खिसक गए तो समीकरण बदल जाएगा. छह फीसदी वोट खिसकने का मतलब भाजपा बराबरी पर आ जाएगी. अगर कांग्रेस के वोटों में आठ फीसदी कमी हो और भाजपा को इतना ही लाभ हो तब जाकर भाजपा यहाँ बढ़त ले पाएगी. अगर अगप अपने पुराने आधार को कुछ हद तक भी बचा पाने में सफल होता है तब यह काम भाजपा के लिए और मुश्किल हो जाएगा. दूसरी तरफ अगर भाजपा अगप को हाशिए पर लाने में और कांग्रेस की बराबरी पर आने में सफल होती है तो यह असम की राजनीति में दीर्घकालिक बदलावों की शुरुआत होगी. |
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