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शुक्रवार, 09 अप्रैल, 2004 को 07:19 GMT तक के समाचार
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कर्नाटक: कांग्रेस को कृष्णा का भरोसा

एसएम कृष्णा
कांग्रेसी मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा शहरी इलाक़ों में लोकप्रिय हैं
कर्नाटक में अगर कांग्रेस की बात की जाए तो वह चुनाव जीतने के लिए मुख्यतः मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा के करिश्मे के भरोसे है.

पार्टी में उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों को ठिकाने लगाने में सफलता पाई है और आज कांग्रेस में भाजपा की तुलना में गुटबाज़ी कम है.

भाजपा में तो हाल तक दल-बदल हुआ है, टिकटों में काफी खेल हुए हैं. सूचना तकनीक के क्षेत्र में बंगलौर को अग्रणी करने का भी फायदा कृष्णा को हुआ है.

उनका व्यक्तित्व अब नए युग के नेता के रुप में सामने आया है और यही कारण है कि उन्होंने बंगलौर के चामराजपेट से चुनाव लड़ने का फैसला किया है. पर यह छवि शहरों से दूर गाँवों में पार्टी को कितना मदद करेगी यह अभी साफ नहीं है.

वैसे सूखा राहत के काम में राज्य सरकार का रिकॉर्ड लोगों की नजरों में बहुत अच्छा नहीं है और भाजपा इसे ही अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बना रही है.

फिर राज्य सरकार वीरप्पन को पकड़ने या राज्य के जंगली इलाकों में सक्रिय हो रहे नक्सलियों पर भी अंकुश लगाने में सफल नहीं हो सकी है. कृष्णा को कावेरी जल विवाद भी परेशान कर सकता है.

जनमत संग्रहों से स्पष्ट होता है कि कांग्रेस का दलितों और मुसलमानों में तो आधार रहा है पर वोक्कालिगा और पिछड़ों में उसकी लोकप्रियता पहले से कम हुई है.

तीसरा ध्रुव

राज्य में चुनावी अखाड़े का तीसरा पहलवान है जनता दल (एस) जिसके नेता एचडी देवेगौड़ा हैं.

एचडी देवेगौड़ा
देवेगौड़ा की पार्टी कमज़ोर है लेकिन मैदान में है

राज्य की राजनीति में क़रीब दो दशकों तक प्रभावी भूमिका निभाने वाली यह पार्टी 1999 के चुनाव में धुल गई थी और स्वयं देवेगौड़ा चुनाव हार गए.

वे बाद में कनकपुरा उप-चुनाव में जीते पर जनता दल (यू) की मदद से ही. मगर कर्नाटक में यह पार्टी बार-बार पस्त होती और बार-बार उठ खड़ी होती रही है. पर इस बार मामला सबसे गंभीर लग रहा है.

जनता दल परिवार पूरी तरह बिखर गया है और इसके ज्यादातर वजनदार नेताओं को भाजपा और कांग्रेस ने अपने-अपने यहाँ बुला लिया है.

रामकृष्ण हेगड़े और जेएच पटेल की मौत से यह परिवार नेतृत्व विहीन हो गया और देवेगौड़ा सबको साथ लेकर चलने में असफल रहे.

जनता दल (यू) के बाकी बचे विधायक भी अभी कांग्रेस में गए है और बची-खुची पार्टी को भाजपा के साथ काफी अपमानजनक सौदा करना पड़ा.

जनता दल (एस) भी पूरे जनता दल वाले आधार की जगह सिर्फ़ पुराने मैसूर के वोक्कालिगा वोटों पर ध्यान दे रहा है लेकिन इसमें भी कमी नजर आती है.

जनमत सर्वेक्षण बताते हैं कि देवेगौड़ा को इस बिरादरी का एक तिहाई वोट ही मिल रहा है.

सीधा मुक़ाबला

लोकसभा के लिए तो चुनाव सीधे-सीधे भाजपा और कांग्रेस के बीच ही हो सकते हैं. पर विधानसभा के चुनाव थोड़े अलग होंगे.

कर्नाटक विधानसभा
कर्नाटक के मतदाता विधानसभा के लिए भी वोट देंगे

कर्नाटक में वोटर काफ़ी समय से लोकसभा और विधानसभा के लिए अलग-अलग दलों को वोट देता रहा है.

1984 का उदाहरण सामने है जब लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पिटने के कुछ महीने बाद ही रामकृष्ण हेगड़े ने जनता दल को राज्य विधानसभा में भारी बहुमत दिलाया था.

पिछले चुनाव में भी कर्नाटक की जनता ने लोकसभा और विधानसभा के लिए अलग-अलग पार्टियों को चुना था, भाजपा और उसके साथी दलों का प्रदर्शन विधानसभा में बहुत ज़्यादा खराब हुआ था.

सीएसडीएस सर्वेक्षण बताता है कि 79 फीसदी लोगों ने ही लोकसभा वाले हिसाब से कांग्रेस को विधानसभा के लिए भी वोट दिए.

जनता दल (यू)- भाजपा के तो सिर्फ 68 फीसदी वोटरों ने ही विधानसभा के लिए भी उसी दल को वोट दिया.

इस बार भी चुनाव भविष्यवाणी यही कहती है कि भाजपा विधानसभा की तुलना में लोकसभा में बेहतर प्रदर्शन करेगी.

चुनावी समीकरण भी विधानसभा के लिए कांग्रेस के पक्ष में लगते हैं.

1999 की तुलना में अगर दो फीसदी वोटर भी उसके छिटके तो लोकसभा की सीटों में राजग उसकी बराबरी पर पहुँच जाएगा. पर विधानसभा के वोटों में दो फीसदी की कमी से सिर्फ 5 सीटें घटेंगी.

भाजपा गठबंधन अगर कांग्रेस के आठ फीसदी वोट खिसका दे तब जाकर वह बहुमत की बात सोच सकता है.

जनता दल (एस) राज्य की राजनीति में अपना वजूद रखेगा और दक्षिणी हिस्से में कांग्रेस विरोधी वोटों का अच्छा-खासा हिस्सा ले सकता है.

अगर जनता दल (एस) विधानसभा में पिछली बार के 10 सीटों से आगे बढ़ता है तो त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में महत्वपूर्ण खिलाड़ी साबित हो सकता है.

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