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भाजपा की आगे बढ़ने की पुरजोर कोशिश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भाजपा कर्नाटक में सत्ता के दरवाज़े पर लगभग एक दशक से दस्तक दे रही है. दक्षिण के राज्यों में उसे सबसे पहले कर्नाटक में ही पैर रखने की जगह मिली. तब 1991 लोकसभा चुनाव में उसे जीत मिली. उसके बाद से इसका विकास ज़्यादा तेज़ी से नहीं हुआ है, भले ही वह लगातार मज़बूत हुई हो. इस बार पार्टी अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ रही है और राज्य विधानसभा में बहुमत का प्रयास सफल न हो तो कम से कम लोकसभा की सीटों में ज़्यादा जीत हासिल करने का प्रयास ज़रूर कर रही है. अगर उसका इस बार का प्रयास सफल होता है तो यह राज्य की राजनीति में दीर्घकालिक बदलाव ला देगा और यहाँ भी मुख्यतः दो दलों वाली व्यवस्था आ जाएगी. अगर भाजपा सफल नहीं हो पाई तो उसके लिए यह गंभीर असफलता होगी और संभव है कि आने वाले कई वर्षों तक वह फिर से ढंग से खड़ी न हो पाए. भाजपा भले ही दशक भर से यहाँ मजबूत होती गई पर कांग्रेस और जनता दल उसको अभी तक हाशिए पर रखने में सफल हो रहे थे. 1991 के चुनाव में भाजपा को भले ही लोकसभा की चार सीटों ही मिली हो पर 29 फ़ीसदी वोट पाकर वह राज्य में दूसरे नंबर पर आ गई थी और उसने जनता दल को तीसरे नंबर पर धकेल दिया था.
1994 में हुए विधानसभा चुनाव में जनता दल सत्ता में आ गई और 40 सीटें जीतकर भाजपा दूसरे नंबर पर रही जबकि कांग्रेस तीसरे नंबर पर पहुँच गई थी. 1996 के लोकसभा चुनाव भी विधानसभा जैसे नतीजों के साथ आए और जनता दल ने लोकसभा की 16 सीटें जीतीं जबकि भाजपा की स्थिति में सुधार नहीं हुआ. अपनी क्षमता देखकर भाजपा ने 1998 लोकसभा चुनाव में रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व वाली लोकशक्ति पार्टी के साथ गठबंधन किया और अपनी ताकत में थोड़ी वृद्धि की. पर 1999 में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जब भाजपा ने अपने गठबंधन में जनता दल के और धड़ों को शामिल किया तो वे उसके लिए बोझ ही साबित हुए क्योंकि कांग्रेस ने लोकसभा की 18 और विधानसभा की 132 सीटें जीत लीं. भाजपा-जनता दल (यू) को बाकी 10 लोकसभा सीटें और विधानसभा में दूसरा स्थान मिला. साथ ही उन्हें यह एहसास भी हो गया कि इस बेमेल गठबंधन ने नुक़सान किया है. कमज़ोर रही भाजपा कर्नाटक में भाजपा की कमज़ोरी कई कारणों से रही. लोगों में इस दल के प्रति उत्सुकता और आकर्षण रहा पर पार्टी संगठन बहुत कमज़ोर था और इसके कर्त्ताधर्त्ता लोगों को कर्नाटक के सामाजिक समीकरणों की ठीक समझ नहीं थी.
कर्नाटक उन आख़िरी प्रदेशों में था जहाँ कांग्रेसी प्रभुत्व सबसे बाद तक टिका हुआ रहा और 1970 के दशक में उसने कई समूहों को साथ लेकर जो व्यापक गठबंधन बनाया वह भी प्रभावी बना रहा. 1990 के दशक में भी दलित, मुसलमान, पिछड़े और सभी जातियों के ग़रीबों का रुझान कांग्रेस की ओर बना रहा. इन समूहों के समर्थन के साथ एक भी प्रमुख किसान जाति का समर्थन मिल जाना सत्ता की राजनीति में निर्णायक हो जाता था. दूसरी ओर प्रमुख किसान जातियों, पिछड़ों, मध्यम वर्ग और दलितों के समर्थन वाला जनता दल भी मज़बूत रहा. भाजपा ने ऊँची जातियों और लिंगायतों पर ध्यान केन्द्रित करके अपनी शुरूआत की. मामला सिर्फ़ जातीय समूहों के बँटवारे का नहीं था-कहीं न कहीं वोटों की राजनीति प्रदेश के भूगोल के हिसाब से भी चलती थी. जनता दल पुराने मैसूर राज्य वाले क्षेत्र में मजबूत थी जहां वोक्कलिगा जाति का प्रभुत्व है. जनता दल के विभाजन के बाद यह हो गया कि एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाले जनता दल (एस) का उत्तर कर्नाटक में खास आधार नहीं बचा. भाजपा को तटीय कर्नाटक में आधार मिला जहां के सामाजिक समीकरण बाकी प्रदेश से एकदम अलग हैं. इसके बाद भाजपा ने उत्तर कर्नाटक के दो इलाकों- 'हैदराबाद कर्नाटक' और 'बांबे कर्नाटक' पर ध्यान केन्द्रित किया जहाँ इसके वोट 1991 से ही बढ़ते जा रहे हैं. और अभी यह भी स्पष्ट नहीं था कि भाजपा पुराने मैसूर क्षेत्र के वोक्कलिंगा लोगों को अपनी ओर करने का कोई गंभीर प्रयास कर रही हो. कमियाँ दूर करने की कोशिश इस बार भाजपा अपनी पुरानी रणनीति की कमियों को भरने का प्रयास कर रही है.
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद पर केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार को लाकर नेतृत्व वाले मसले को सुलझाया गया. फिर दूसरे दलों से अनेक लोगों को तोड़ा गया. पूर्व मुख्यमंत्री एस बंगरप्पा को पार्टी में लिया गया जिनका पिछड़ों में काफी अच्छा आधार है. उनके आने से भाजपा को लाभ होगा. भाजपा को बंग्लौर के पूर्व पुलिस प्रमुख एचटी सांगलियाना के आने से भी लाभ हुआ है. फिर भाजपा रामकृष्ण हेगड़े के परिजनों को साथ लेकर लिंगायतों पर अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रयास में है. हेगड़े भले ही लिंगायत न थे, पर उनका इस समुदाय पर काफी प्रभाव था. प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ा है और इस काम में संघ परिवार सक्रिय रहा है. हाल में हुए जनमत संग्रहों से यह साफ हुआ है कि भाजपा को ऊंची जातियों के साथ-साथ सर्वेक्षकों में पिछड़ों के वोट में भी वृद्धि दिख रही है जिसका अर्थ है हाल की भाजपा की कोशिशों का सफल होना. (कर्नाटक से ही जुड़े लेख के अगले अंक में जानेंगे कि कांग्रेस को चुनाव में किसके करिश्मे का भरोसा है और तीसरे ध्रुव का वहाँ क्या अस्तित्व है?) |
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