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शनिवार, 10 अप्रैल, 2004 को 02:05 GMT तक के समाचार
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चुनाव और चुनावी भविष्यवाणियाँ
भाजपा समर्थक
मतदान पूर्व सर्वेक्षण पर ये आरोप लगते रहे कि इनसे मतदाताओं पर ग़लत प्रभाव तो नहीं पड़ता
चुनाव में मतदान से पहले और बाद के जनमत सर्वेक्षणों पर रोक लगाने संबंधी बहस में कुछ महत्वपूर्ण बातों को जानकारी में ला देना ज़रूरी है.

यह बात ज़रूरी है क्योंकि हम अभी अपनी राजनीतिक व्यवस्था में सुधार संबंधी एक महत्वपूर्ण फैसला लेने जा रहे हैं. इसके लिए उपलब्ध साक्ष्यों पर भी ग़ौर नहीं किया गया है.

अभी तक चली बहस क़ानून की बहुत ही संकीर्ण और तकनीकी सवालों पर हुई है या फिर लोकतंत्र से जुड़े बहुत ही मौलिक और नैतिक सवालों पर है.

जहाँ तक क़ानून का सवाल है तो 1994 में सुप्रीम कोर्ट में यह मसला उठा था कि क्या चुनाव आयोग को ऐसा प्रतिबंध लगाने का अधिकार है और अगर है तो किस क़ानून में.

और यह सवाल आते ही आयोग ने हथियार डाल दिए थे. सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से कहा था कि सभी दलों ने बैठक करके प्रतिबंध की बात तो की है लेकिन ऐसा करने के लिए कोई क़ानूनी अधिकार नहीं दिया.

सो इस बार आयोग बिना क़ानूनी प्रावधान के प्रतिबंध नहीं लगाने जा रहा है. ऐसे में यह मौलिक सवाल उठता है कि क्या ये क़ानून अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक नहीं है.

यह एक मज़बूत तर्क है और जनमत संग्रहों पर प्रतिबंध की क़ानूनी लड़ाई में उपयोग होगा ही.

यों तो तर्क चाहे जितने मज़बूत और अच्छे हों, आम लोगों के गले नहीं उतरते. इसलिए प्रतिबंध को लेकर साधारण और क़ानूनी झमेले से ऊपर का जो सवाल उठ रहा है, उस पर ही चर्चा की जानी चाहिए कि क्या जनमत संग्रह लोकतंत्र के लिए अच्छे हैं?

लोग अपना वोट कैसे दें, यह जनमत संग्रह से प्रभावित होती है और कितनी होती है, क्या प्रतिबंध से चुनाव ज़्यादा बेहतर माहौल में हो पाएंगे, बिना किसी और प्रयास के हो पाएंगे?

इन सवालों पर खुले मन से और अभी मौजूद साक्ष्यों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए.

राजनेताओं की तरफ से होने वाले आरोप-प्रत्यारोपों को कुछ पल भूलकर आइये, इस सवाल पर तार्किक ढंग से विचार करें.

सबकी नज़र में
 जनमत संग्रह लोकतंत्र के लिए नुक़सानदेह है, यह तर्क कई आधारों पर दिया जाता है. यह कहा जाता है कि बड़े मीडिया हाउसों या टीवी चैनलों द्वारा कराए जाने वाले जनमत संग्रह सबकी नज़र में आ जाते हैं और फिर लोगों के फ़ैसले पर असर डालते हैं.

जनमत संग्रह लोकतंत्र के लिए नुक़सानदेह है, यह तर्क कई आधारों पर दिया जाता है. यह कहा जाता है कि बड़े मीडिया हाउसों या टीवी चैनलों द्वारा कराए जाने वाले जनमत संग्रह सबकी नज़र में आ जाते हैं और फिर लोगों के फ़ैसले पर असर डालते हैं.

यह प्रभाव ग़लत तो है ही, चुनाव को खुले रूप में नहीं चलने देता. हर आदमी ये तीनों तर्क नहीं देता, न ही हर आदमी जनमत संग्रह करने वालों की निष्ठा पर सवाल उठाता है, लेकिन इन तर्कों पर ग़ौर करना ज़रूरी है.

सर्वेक्षण

सौभाग्य से इनमें से कुछ सवालों का तथ्यात्मक जवाब उपलब्ध है और हमारे पास पर्याप्त भरोसेमंद तथ्य हैं.

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डवलपिंग सोसाइटी (सीएसडीएस) द्वारा कराए जाने वाले सर्वेक्षणों की श्रृंखला, नेशनल इलेक्शन स्टडी (एनईएस) ने अपने दो दौर के अध्ययनों में इस सवाल पर ग़ौर किया है.

1996 और 1999 के अपने दो देशव्यापी सर्वेक्षणों में एनईएस ने लोगों से पूछा था कि क्या उन्होंने अख़बारों और पत्रिकाओं के द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों के बारे में सुना है या उनके नतीजे देखे हैं.

फिर जिनको इसके बारे में जानकारी थी उनसे पूछा गया कि क्या उनके फ़ैसले पर इन सर्वेक्षणों का कोई प्रभाव था.

दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव के समय कराए गए नवीनतम सर्वेक्षणों में फिर से तीन सवाल पूछे गए जिससे यह पता लग सके कि मीडिया की पहुँच बढ़ने के बाद क्या लोगों की राय में कुछ बदलाव हुआ है.

इन सर्वेक्षणों (जो सर्वेक्षण के बारे में ही थे) के नतीजे एक जैसे ही थे जो इस मामले में बहुत अटकलबाज़ी की गुंजाइश नहीं छोड़ते.

दायरा और असर

सर्वेक्षणों की पहुँच के दायरे के बारे में ज़्यादा स्पष्ट जवाब देना संभव है.

1996 में 21 फ़ीसदी लोगों को मतदान पूर्व या पश्चात वाले जनमत संग्रहों का पता था.

इस बारे में ठीक-ठीक पता नहीं है पर यह माना जा सकता है कि एक तिहाई लोगों को इसका पता होगा क्योंकि प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की पैठ बढ़ी है.

ये आँकड़े चुनाव सर्वेक्षणकर्ताओं को उनकी पहुँच बताने के लिए काफी हैं. ज़्यादा से ज़्यादा एक तिहाई लोग ही उनके कामों को जानते हैं, फ़ैसले प्रभावित होने वाली बात तो दूर की है.

गिनती का खेल
 असली सवाल है, जनमत संग्रहों से अपना निर्णय बदलने वाले कितने लोग हैं? दोनों ही देशव्यापी सर्वेक्षणों के आधार पर कहा जा सकता है कि ऐसे प्रभावित होने वालों की गिनती बहुत ही कम है.

स्वाभाविक रूप से ऐसे जानकारों में शहरी लोगों का हिस्सा ज़्यादा है. पर यह तर्क भी दिया जा सकता है कि एक तिहाई या एक चौथाई मतदाता ही कोई कम बड़ी संख्या नहीं है. इस संख्या का मतलब 15 से 20 करोड़ लोग हैं.

पर इस सवाल पर किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले कुछ और तथ्यों पर ग़ौर करना ज़रूरी है.

असली सवाल है, जनमत संग्रहों से अपना निर्णय बदलने वाले कितने लोग हैं? दोनों ही देशव्यापी सर्वेक्षणों के आधार पर कहा जा सकता है कि ऐसे प्रभावित होने वालों की गिनती बहुत ही कम है.

वैसे तो काफ़ी लोगों ने कहा कि उनके फ़ैसले पर इन जनमत संग्रहों के नतीजों का प्रभाव होता है, पर ज़्यादा पूछताछ करते ही साफ़ हो गया कि असल में ये नतीजे उनके पहले से ही तय फ़ैसलों को और पुख़्ता करते हैं.

जनमत संग्रहों की जानकारी रखने वालों में से सिर्फ़ दस फ़ीसदी लोग ही फ़ैसले बदलते हैं.

1996 चुनावों के लिए यह आँकड़ा 3.7 फ़ीसदी बैठता है तो 1999 के लिए 3.3 फ़ीसदी. यहाँ यह तर्क भी दिया जा सकता है कि यह प्रतिशत भले ही कम हो पर जब वोटरों की संख्या पर बात जाए तो करोडों की संख्या सामने आती है जो चुनावी नतीजों पर असर डाल सकते हैं.

और ऐसे में अंतिम सवाल पर ध्यान देना ज़रूरी है कि लोग इन सर्वेक्षणों से प्रभावित होकर क्या करते हैं.

आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि लोग उसी ‘लहर’ में बह जाते हैं पर दुनिया भर में हुए अध्ययन यह बताते हैं कि कुछ लोग लहर के साथ जाते हैं तो कुछ पिछड़ते घोषित पक्ष से सहानुभूति रखते हुए उसके साथ भी हो जाते हैं.

सीएसडीएस ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय इस सवाल पर लोगों की राय जानने की कोशिश की थी. यह महानगर का मसला था और यहाँ 41 फीसदी लोगों को सर्वेक्षणों की जानकारी थी.

उनमें से एक चौथाई अर्थात 10 फ़ीसदी ने कहा कि उनके फ़ैसले पर भविष्यवाणियों का असर होता है, पर प्रभावित होने वाले 10 फ़ीसदी में से आधे ने कांग्रेस की हवा देखकर उधर का रुख़ किया तो आधे ने भाजपा को हारता जानकर उसकी मदद के लिए कमर कसी.

ज़ाहिर तौर पर यहाँ भी नतीजा सिफ़र ही रहा. निश्चित रूप से इतने छोटे और कम अध्ययनों से बात नहीं बनती और इस मामले में और ज़्यादा अध्ययन होने चाहिए.

प्रमाण का मुद्दा

लेकिन पहली नज़र में ऐसा कुछ भी प्रमाण नहीं दिखता कि भविष्यवाणियाँ चुनावी नतीजों को प्रभावित करती हैं और जीतने वाले पक्ष को इससे मदद मिलती है.

पर सच कहें को भविष्यवाणियों को लेकर जितने तरह के संदेह हैं वे सभी इससे दूर नहीं होते. यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर जो अनुपात छोटा लगता है, वह कुछ इलाक़ों या चुनाव क्षेत्रों (जहाँ कड़ा मुक़ाबला हो) के लिए बहुत ही निर्णायक बन जाता है.

यह भी कहा जा सकता है कि लोगों के मन पर तो इनका हल्का प्रभाव पड़ता है लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं के उत्साह पर इसका बहुत ज़्यादा असर होता है और उस पर भी ग़ौर किया जाना चाहिए.

फिर यह भी कहा जा सकता है कि प्रभाव के मामले में मतदान पूर्व और पश्चात वाले जनमत संग्रहों का अलग-अलग प्रभाव हेता है-ख़ासकर हमारे जैसे देश में, जहाँ अंतिम दौर का मतदान काफ़ी समय बाद तक चलता रहता है.

ये सवाल महत्वपूर्ण हैं और ऊपर जिन प्रमाणों का ज़ीक्र है, उनसे इनके जवाब नहीं मिलते.

देख-जानकर ही
 चुनाव में मतदाता यह भी देख-जानकर ही वोट देता है कि कौन जीत रहा है, कौन हार रहा है और इसके लिए वह ख़बरें, गपशप, निजी सूचनाओं, अनुमान वग़ैरा का सहारा लेता है.

और फिर ये सवाल हमें कुछ बड़े मुद्दों की ओर ले जाते हैं. अगर यह मान भी लें कि भविष्यवाणियों का कुछ इलाक़ों या वर्गों में असर होता है ते भी यह निर्णय कौन करेगा कि यह प्रभाव ग़लत और अनुचित ही था.

चुनाव में मतदाता यह भी देख-जानकर ही वोट देता है कि कौन जीत रहा है, कौन हार रहा है और इसके लिए वह ख़बरें, गपशप, निजी सूचनाओं, अनुमान वग़ैरा का सहारा लेता है.

अगर वह अधिक व्यवस्थित तरीक़े से जमा की गई उन सूचनाओं का उपयोग करता है जिनका उपयोग सभी पार्टियाँ कर ही रही हैं तो इसमें क्या ग़लत है?

ऐसे में सिर्फ़ इस एक पक्ष को ग़लत माना जा सकता है जब भविष्यवाणियों में पक्षपात हो, उसमें कोई बड़ी गड़बड़ की गई हो.

सो अब हम उसी अंतिम और महत्वपूर्ण सवाल पर आते हैं जो इस बहस में सबसे बड़ा है - इस देश में मतदान पूर्व और पश्चात होने वाले जनमत संग्रहों की क्षुद्रता और पेशेवर कार्यपद्धति का सवाल.

यहाँ हम पहले हुए सारे जनमत संग्रहों की क्षुद्रता और सही-ग़लत होने का विस्तृत हिसाब-किताब नहीं करने जा रहे हैं पर यह बताना ज़रूरी है कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से भारत में चुनावी भविष्यवाणियों का रिकार्ड कोई ज़्यादा ख़राब नहीं है.

जबकि आम धारणा इसके ख़िलाफ़ है. इधर कई सर्वेक्षणों के नतीजे एकदम ग़लत साबित हुए हैं पर ऐसा राजनैतिक दख़लंदाज़ी या बेईमानी की वजह से न होकर सर्वेक्षण में ग़लती और ग़ैर-पेशेवर तरीक़ों के कारणों से हुआ.

मोटे तौर पर यह बात माननी चाहिए कि ऐसी सारी एजेंसियों और मीडिया हाउसों की अपनी प्रतिष्ठा भी दाँव पर लगी होती है और उन्हें उसकी भी चिंता रहती है.

वे हर बार सही भविष्यवाणी भले न करते हों पर ऐसा वे किसी दबाव या पक्षपात की वजह से करते हैं, यह मानना ग़लत है.

1980 के दशक से ही शुरू हुए इस शास्त्र में इधर बहुत सी नई बातें नहीं जुड़ी हैं पर लोग इस अध्ययन और भविष्यवाणी में शुद्धता लाने का प्रयास करते ज़रूर दिखते हैं.

फिर यह क़ानून बनाया जा सकता है कि जनमत संग्रह करने वाली एजेंसी इसके बारे में, इसकी कार्यप्रणाली के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा सूचनाएं भी साथ दें.

प्रतिबंध से तो कुछ भी हासिल नहीं होगा. उल्टे इससे ये सुधार भी रुक जाएंगे. प्रतिबंध का इसलिए भी अच्छा असर नहीं होगा क्योंकि लोगों को सूचनाएं देने और एजेंसियों की जवाबदेही बढ़ाने की जगह ये सूचनाएं ‘ब्लैक मार्केट’ में पहुँच जाएंगी और फिर छोटे समूह के पास होंगी या लाभप्रद सूचनाओं को जहाँ-तहाँ लीक करके फैलाया जाएगा.

लोकतंत्र पर इसका और भी घातक असर होगा.

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