| आंध्र हो सकता है निर्णायक मैदान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
देश की चुनावी लड़ाई का निर्णायक मैदान कहाँ है? इस सवाल के जवाब में आंध्र प्रदेश भी उत्तर प्रदेश के मुकाबले दावेदार बन सकता है. और यहाँ सचमुच इस बार सबसे दिलचस्प चुनावी लड़ाई चल रही है. उत्तर प्रदेश की 80 सीटों के मुकाबले यहाँ 42 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं पर यहाँ नतीजों के ज़्यादा नाटकीय और प्रभावी होने की संभावना है. यहाँ राजग को भारी बहुमत मिल सकता है तो कांग्रेस भी पासा पलट सकती है और यहाँ के नतीजों का केन्द्र की राजनीति पर सीधा और भारी प्रभाव पड़ने वाला है. अन्य राज्यों में चुनावी लड़ाई का परिदृश्य साफ़ होता जा रहा है तब भी यहाँ का वातावरण अस्पष्ट बना हुआ है. तेलंगाना राज्य समिति के चुनावी मैदान में उतरने से गठबंधन का गणित उलझ गया है. इस तरह चुनावी भविष्यवाणियाँ करने वालों के लिए यह राज्य और भी मुश्किल बन गया है. यहाँ के चुनाव का राष्ट्रीय महत्व है पर उससे भी ज़्यादा प्रदेश और यहाँ के क्षेत्रों के लिए है क्योंकि परिणामों के यहाँ दीर्घकालिक और ज़्यादा बड़े प्रभाव पड़ेंगे. यहाँ लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी हो रहे हैं और वे तय करेंगे कि तेलुगूदेशम को लगातार तीसरी बार शासन में आने का अवसर मिलता है या नहीं. पीपुल्स वार ग्रुप की ओर से घात लगाकर किए हमले से बचने के तत्काल बाद ही उससे पैदा सहानुभूति का लाभ लेने के लिए चंद्रबाबू नायडू ने विधानसभा भंग करवा दी. वह नवंबर-दिसंबर में ही चुनाव चाहते थे, पर चुनाव आयोग इसके लिए तैयार न हुआ. अगर इस बार भी तेलुगूदेशम पार्टी राज्य में चुनाव जीतती है तो वह पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों और गुजरात में भाजपा की तरह एकदम मज़बूती से प्रदेश पर काबिज़ हो जाएगी.
उधर अगर कांग्रेस इस बार भी चुनाव हारी तो प्रदश में अपने पैरों पर उठ खड़ा होने की उसकी शक्ति और भी कम हो जाएगी. तेलंगाना राज्य समिति का प्रदर्शन सिर्फ़ इस नए राजनीतिक संगठन के भविष्य को ही नहीं तेलंगाना प्रदेश बने या न बने वाले सवाल को भी तय करेगा. अगर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में जीत हासिल की तो मामला सिर्फ़ यहीं का नहीं होगा—वह सारी चुनावी भविष्यवाणियों को झुठलाते हुए मुल्क भर में 1999 के अपने आँकड़े से ऊपर ही जाएगी. मगर कांग्रेस के लिए यह काम आसान नहीं होगा. 1983 के विधानसभा चुनाव में एनटी रामाराव के उतरने और जीतने के बाद से पूरे दो दशकों की राजनीति में तेलगुदेशम पार्टी छाई रही है. एनटीआर ने पहला चुनाव तो अपने करिश्मे से जीता पर बाद में पार्टी ने मज़बूत सामाजिक-जातीय और राजनीतिक समीकरण बनाने के साथ ही उनको टिकाऊ बनाया. 1989 को छोड़कर बीते 20 वर्षों के सारे विधानसभा चुनावों में तेलगुदेशम ही विजयी रहा है. यह सही है कि अभी तक कांग्रेस में वोट का अनुपात ठीक-ठाक रहा है और वह राजनीतिक रूप से एकदम दबाव देने की स्थिति में नहीं आई है, पर पार्टी ने विधानसभा की अपेक्षा लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया है. 1999 में भी राज्य में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ हुए थे, उस चुनाव को कांग्रेस को जीत लेना चाहिए था उसमें भी वह पिट गई. 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने प्रदेश में 18 फीसदी वोट हासिल किए थे और राज्य की राजनीति में मज़बूत तीसरी शक्ति के रूप में उभरी. ऐसे में जब चंद्रबाबू नायडू ने 1999 में अपने पुराने वामपंथी सहयोगी दलों का साथ छोड़कर भाजपा से हाथ मिलाया तो लगा कि कांग्रेस मैदान मार सकती है. चंद्रबाबू ने सारी मोल-तोल करके भाजपा को मुट्ठी भर सीटें दीं लेकिन उसके वोट अपनी झोली में कर लिए. परिणाम हुआ कि टीडीपी-भाजपा गठबंधन ने लोकसभा की ज़्यादातर सीटें जीतीं और राज्य विधानसभा में नायडू को एक बार फिर बहुमत मिल गया. कांग्रेस वामपंथी दलों को अपनी ओर नहीं खींच पाई और पिट गई. इस बार भी भाजपा-टीडीपी का गठबंधन जारी है जबकि भाजपा ज़्यादा सीटों की माँग करती रही है. यह गठबंधन पिछले दो चुनाव के प्रभावी सामाजिक समीकरणों को फिर से जीवंत करना चाहेगा. तेलुगूदेशम का प्रभुत्व किसान जाति कम्मा में तो है ही वह अन्य पिछड़ी जातियों में भी कांग्रेस से ज़्यादा लोकप्रिय है. पार्टी ने आदिवासियों और मुसलमान वोटरों में भी कांग्रेस का आधार खिसकाया है. राम-राज की लोक-लुभावन नीतियों के चलते पार्टी ग़रीबों और अत्यंत कमज़ोर समूहों में भी लोकप्रिय रही है. भाजपा ने इस सामाजिक आधार में अपने ब्राह्मण,वैश्य और उच्च वर्ग का समर्थन जोड़ा है. परिणाम यह हुआ है कि कांग्रेस पर दोनों तरफ़ से मार पड़ी है. पार्टी को रेड्डी, दलित और मुस्लिम समुदाय का ठोस समर्थन है लेकिन भाजपा-टीडीपी के सामाजिक समीकरण का मुकाबला इतने भर से नहीं होता. अब इस सामाजिक समीकरण में कोई बड़ा बदलाव होता नहीं लगता. तेलुगूदेशम को उम्मीद है कि दलितों का एक समूह-माडिया उसके पक्ष में आएगा क्योंकि उसके लिए अलग आरक्षण की व्यवस्था हुई है. लेकिन ऐसा होगा ही, यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी. इसी प्रकार कांग्रेस को उम्मीद है कि भाजपा से हाथ मिलाने के चलते मुसलमान वोटर तेलुगूदेशम को छोड़कर उसके साथ आएँगे. पर टीडीपी भाजपा की मुस्लिम विरोधी मुहिम से ख़ुद को दूर रखे हुए है. कभी इस पार्टी को महिलाओं का ज्यादा समर्थन मिला करता था लेकिन 1999 के चुनाव के बाद से ऐसा नहीं रहा. सो लगता है कि दोनों खेमे अपने-अपने सामाजिक आधार पर कायम रहेंगे. इस लेख के अगले हिस्से में जानने की कोशिश करेंगे कि क्या हो सकती है कांग्रेस की रणनीति |
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