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आंध्र और कर्नाटक विधानसभा चुनावों का हाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कुछेक दिन पहले तक आंध्र प्रदेश के चुनावी मुकाबले को घोर अनिश्चितताओं से भरा बताया जा रहा था. कर्नाटक में भी लोकसभा चुनाव की तस्वीर तो पर्याप्त स्पष्ट होती लग रही थी लेकिन विधानसभा की तस्वीर अस्पष्ट ही थी. एनडीटीवी-इंडियन एक्सप्रेस चुनाव भविष्यवाणी ने इन दोनों जगहों पर बहुत हद तक पहुँच स्पष्ट कर दी है. जिन इलाकों में चुनाव हो गए हैं वहाँ मतदान पश्चात सर्वेक्षण और बाकी हिस्से में नए जनमत संग्रह के आधार पर यह भविष्यवाणी की गई है. जितने लोगों की राय के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है वह काफ़ी ज्यादा है और इसके चलते इन नतीजों को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है. फिर भी यह न तो अंतिम नतीजा है न अंतिम मूल्यांकन. यह काम भी 26 अप्रैल को वोट पड़ने के बाद ही किया जाएगा. इस बीच हम अभी सामने मौजूद आंकड़ों पर ग़ौर करके ज्य़ादा वास्तविक स्थितियों पर विचार कर सकते हैं. सर्वेक्षण के नतीजे सबसे पहले बड़े नतीजे. एनडीटीवी-इंडियन एक्सप्रेस का सर्वेक्षण पहली बार यह मजबूत संकेत दे रहा है कि चंद्रबाबू नायडू की सत्ता जा रही है. इसके अनुमान के अनुसार कांग्रेस गठबंधन को 140 से 160 सीटें और तेलुगू देशम पार्टी गठबंधन को 120 से 140 सीटें मिल रही हैं. अब दोनों आंकड़ों में 140 की संख्या है, पर दोनों खेमें यहीं आकर रुकें, यह संभावना बहुत क्षीण है क्योंकि सर्वेक्षण में साफ हुआ है कि पहले चरण के मतदान में शासक गठबंधन के छह फीसदी मतदाता दूसरी तरफ आ गए हैं. यह सूचना कर्नाटक के नतीजों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है. कर्नाटक में जनमत संग्रह के नतीजे बताते हैं कि 224 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस को 110 से 120 स्थान मिल सकते हैं. भाजपा को 60-70 और जनता दल सेक्यूलर को 25-35 सीटों का अनुमान है. जनमत संग्रह में यह बात सामने आई कि जनता दल सेक्यूलर को पिछली बार की तुलना में 5 फीसदी ज्य़ादा वोट मिल रहे हैं. और यह नुकसान भाजपा और कांग्रेस दोनों को हो रहा है. इन प्रमाणों के आधार पर दो नतीजे निकाले जा सकते हैं. राज्य के लोग दो स्तर पर वोट दे रहे हैं. संसद के लिए भाजपा की तरफ़ झुकाव है तो विधानसभा के लिए कांग्रेस की तरफ. इससे यह अटकल भी समाप्त होती है कि भाजपा विधानसभा चुनाव में भी आगे बढ़ रही है और यहां भी जीत हासिल कर सकती है. इस भविष्यवाणी से यह सवाल नहीं सुलझता कि राज्य में कौन सरकार बनाएगा. कांग्रेस मुश्किल से बहुमत का आंकड़ा पार करेगी. यह भी संभव है कि वह बहुमत से कुछ कम पर रुक जाए, अर्थात त्रिशंकु विधानसभा भी संभव है. अब इन नई सूचनाओं से इन दोनों राज्यों के बारे में हमारी समझ बढ़ी है पर इन सूचनाओं को ज्यादा बाऱीकी से देखने की ज़रूरत है. सो पहले आँध्र प्रदेश की सूचनाओं को देखें जहाँ दो कारणों से अभी भी अस्पष्टता बनी हुई है. यह माना जा रहा था कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण नए दलों, जैसा कि आँध्र प्रदेश में तेलंगाना राज्य समिति(टीआरएस) है, के बारे में सही आकलन नहीं करता और इसके चलते कांग्रेस-टीआरएस के वोटों का अंदाज़ा कम हो सकता है. यह संदेह सही भी निकला है. जनमत संग्रह जितनी देर से आए हैं, वे बताते हैं कि कांग्रेस-टीआरएस-वाममोर्चा गठबंधन को ज़्यादा वोट मिल रहे हैं. संभव है कि इस गठबंधन की लोकप्रियता बढ़ती गई हो, पर उससे ज़्यादा संभावना इसी बात की है कि शुरुआती सर्वेक्षणों में इसकी स्थिति कमजोर आंकी गई हो. आँध्र को लेकर गड़बड़ी का दूसरा कारण था क्षेत्रीय स्तर पर मतदाताओं के नज़रिए को लेकर ग़लतफ़हमी. यह स्पष्ट नहीं था कि पूरा प्रदेश एक ही तरह से वोट करेगा या तेलंगाना के लोगों का रुख़ अलग होगा. यह भी लग रहा था कि तेलंगाना की प्रतिक्रिया में रायलसीमा और आंध्र में दूसरी तरफ़ मतदान हो सकता है. पर अब जो प्रमाण सामने आ रहे हैं, उनमें इस किस्म का कोई बड़ा बँटवारा नहीं दिखता. राज्य में पहले दौर में तेलंगाना में मतदान हुआ. पर कुछ अन्य इलाकों में भी वोट पड़े और उत्तर-तटीय आँध्र के इस इलाके में भी तेदेपा-भाजपा के ख़िलाफ़ उसी तरह वोट पड़े जैसा कि तेलंगाना में. उत्तर-तटीय आँध्र पारंपरिक रूप से कांग्रेस विरोधी रहा है, सो यहाँ कांग्रेस गठबंधन को बढ़त का मतलब है, प्रदेश में क्षेत्रीय आधार पर कोई बंटवारा नहीं है. यह कह सकते हैं कि तेलंगाना में तेदेपा-भाजपा लहर के जवाब में बाकी इलाकों में कोई उल्टी लहर नहीं बहने जा रही है. अगर हम 20 अप्रैल वाले मतदान में कांग्रेस की तरफ़ दिखते छह फीसदी 'स्विंग' का हिसाब लगाएँ तो यही नतीजा निकलेगा कि यहाँ की 147 सीटों में से कांग्रेस 107 तक जीत चुकी होगी. सो अब बाकी 147 सीटों के लिए पड़ने वाले मतों से बहुत अलग-अलग तरह की संभावनाएं नहीं बनतीं. अगर बाकी इलाके में तेदेपा-भाजपा गठबंधन के खिलाफ 6 फीसदी का 'स्विंग' नहीं भी आता है,(जिसकी संभावना ही है, ख़ासकर उत्तर-तटीय आँध्र के ऐक्ज़िट पोल के नतीजों को देखने के बाद) तब भी भाजपा-तेदेपा को बहुमत मिलने की गुँजाइश नहीं लगती. अगर तेदेपा-भाजपा के ख़िलाफ़ हल्का 'स्विंग' भी हुआ तब तो उसका पत्ता साफ ही है. अगर दो फीसदी मतदाता भी बदले तो कांग्रेसी खाता 171 तक पहुंच जाएगा. अगर 'स्विंग' चार फीसदी हुआ तो कांग्रेस 184 तक सीटें जीत लेगी. अगर पहले चरण जितना अर्थात 6 फीसदी स्विंग हुआ तब तो कांग्रेस 200 से ऊपर पहुंच जाएगी. सो नायडू साहब के लिए अब मैदान बहुत मुश्किल हो चुका है. कर्नाटक दिलचस्प कर्नाटक में लड़ाई बहुत ही दिलचस्प है और बहुत करीबी मुकाबला है. और नतीजा असल में भाजपा और कांग्रेस की जगह इस बात पर ज्यादा निर्भर करेगा कि एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व वाला जनता दल सेक्यूलर कैसा प्रदर्शन करता है.
सर्वेक्षणों से जाहिर होता है कि जनता दल सेक्यूलर ने चुनाव अभियान के दौरान अपना आधार बढ़ाया है. उसके वोट 5 फीसदी बढ़े लगते हैं और इसमें दो अलग-अलग दौर के चुनाव वाले इलाकों में खास अंतर नहीं दिखता. संभव है कि तीसरा पक्ष उपेक्षित रह गया हो, जैसा कि अक्सर जनमत संग्रहों में होता है. इसलिए हम 5 से 9 फीसदी बढ़त का अनुमान करके भी हिसाब लगा लेंगे. अगर 3 से 5 फीसदी का लाभ हो रहा है तो कांग्रेस की तुलना में भाजपा को ज़्यादा नुकसान होगा और कांग्रेस बहुमत हासिल कर लेगी. अगर जनता दल सेक्यूलर ने कांग्रेस से ज़्यादा वोट मारे, तब वह 113 के बहुमत से पीछे रह जाएगी. यही स्थिति जनता दल सेक्यूलर के लिए ज़्यादा वोट मिलने की स्थिति में भी लगती है. अगर उसे 7 या 9 फीसदी ज़्यादा वोट मिले, तब कांग्रेस बहुमत से दूर रह जाएगी. सो कर्नाटक में यह पार्टी महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनकर उभरी है. अगर यहाँ त्रिशंकु विधानसभा बनी तो जनता दल सेक्यूलर की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाएगी. एक और बात की चेतावनी जरूरी है. कर्नाटक के कई इलाकों में तिकोना मुकाबला होगा और वहाँ भविष्यवाणी करना मुश्किल होगा. सो हमें यहाँ से हैरान करने वाले नतीजों की उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए. |
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