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बुधवार, 28 अप्रैल, 2004 को 10:30 GMT तक के समाचार
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कम मतदान और चुनाव

मतदाता
भारत के आम मतदाताओं की भी चुनावों में पर्याप्त रुचि है
भारतीय चुनाव में लोगों की भागीदारी के तीन विशिष्ट पहलू रहे हैं. एक तो यह कि जहाँ दुनिया भर के चुनाव में लोगों की हिस्सेदारी घटती गई है वहीं भारत में मतदान का प्रतिशत बढ़ा है या काफी ऊँचे स्तर पर टिका हुआ है.

दूसरे यहाँ विभिन्न स्तर की लोकतांत्रिक संस्थाओं में लोगों की दिलचस्पी सत्ता के हिसाब से घटती नहीं है.

यहां संसद से ज़्यादा दिलचस्पी विधानसभा और विधानसभा से ज्यादा दिलचस्पी मंत्रालय और स्थानीय निकायों के चुनावों में रही है.

तीसरे भारत में गरीब और कमज़ोर लोगों की लोकतंत्र में आस्था औरों से कम नहीं है जबकि अमरीका, अफ्रीका और यूरोप के देशों में बेघर और जातीय अल्पसंख्यकों की भागीदारी चुनाव में बहुत कम होती है.

हमारे यहाँ तो सामाजिक, आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों की भागीदारी सामान्य से ऊपर ही होती है. यहाँ ऊँची जाति के हिंदू की तुलना में दलित और अल्पसंख्यक मतदाता ज़्यादा मुस्तैदी से वोट देते हैं.

पिछले करीब 15 वर्षों से भारतीय लोकतंत्र में पिछड़ों, गरीबों और कमज़ोरों की भागीदारी क्रांतिकारी ढंग से उभरी है.

सवाल

क्या ये चुनाव इन प्रवृत्तियों को जारी रखेगा या फिर हम इस लोकतांत्रिक डगर पर रोक लगते देखने जा रहे हैं?

आज यह सवाल महत्वपूर्ण है. जिन क्षेत्रों में मतदान हो चुका है, वहाँ के संकेत बहुत ज़्यादा उम्मीद जताने वाले नहीं हैं.

भारत में मतदान
अब तक हुए मतदान में लोगों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है
पहले दो दौर में जिन 142 क्षेत्रों में वोट पड़े, वहाँ के आकड़े अब उलझे हुए हैं.

चुनाव आयोग के पहले के अनुमान की तुलना में आकड़े विश्वसनीय हैं.

ऐसा लगता है कि नया चलन शुरू करते हुए राष्ट्रपति द्वारा मतदान करने की अपील के बावजूद औसत मतदान 1999 के लोकसभा चुनावों की तुलना में कम हो जाएगा.

इन 142 क्षेत्रों में औसत 57.7 फीसदी मतदान होने का अनुमान है.

इन क्षेत्रों में 1999 के लोकसभा चुनावों में 60.4 फीसदी मतदान हुआ था.

इस प्रकार पहले दौर में मतदान 2.7 फीसदी कम हुआ है. पहले दौर में क्षेत्र पूरे मुल्क में बिखरे थे और उनसे पूरे ही देश की प्रवृत्ति का अंदाज़ा हो जाता है.

सो हम यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि पूरे देश में 55-60 फीसदी मतदान होगा जो पिछले तीन दशकों में मतदान के आकड़ों में कम मतदान वाले खाने में ही फ़िट बैठेगा.

भारत में लोकतांत्रिक चुनावों में पहले 15 वर्षों में मतदान 50 फीसदी से कम के आकड़े से बढ़कर चौथे आम चुनाव 1967 में 60 फीसदी के ऊपर में हुआ, पिछले संसदीय चुनाव इसी औसत के आस-पास थे.

इनमें से 1984, 1989 और 1998 में औसत से कुछ ऊपर मतदान हुआ तो 1991 और 1996 में औसत से कुछ कम, अगर पिछले चरण में चुनावों जैसा ही मतदान हुआ तो औसत 1996 के आस-पास आ जाएगा.

अगर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे प्रदेशों में मतदान में ज़्यादा कमी आई तब संभव है कि हाल के वर्षों का रिकार्ड टूटे और हम इधर सबसे कम मतदान देखें.

पहले चरण के मतदान में किसी एक प्रदेश या क्षेत्र में कम वोट का हिसाब नहीं है.

विधानसभा चुनाव

यह गिरावट सभी जगह है. जिन तीन राज्यों में विधानसभा के चुनाव भी साथ-साथ हो रहे हैं, वहाँ की तस्वीर कुछ बेहतर है.

महिला मतदाता

आँध्र प्रदेश, कर्नाटक और उड़ीसा में मतदान 60 फीसदी से ऊपर गया. आँध्र प्रदेश और कर्नाटक में 1999 में भी लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनाव भी हुए थे. और उस तुलना में भी इस बार इन दो राज्यों में थोड़ा कम मतदान हुआ है.

उड़ीसा में पिछली बार विधानसभा चुनाव साथ नहीं हुए थे और वहाँ इस बार नौ फीसदी ज्यादा मतदान हुआ है.

महाराष्ट्र में पिछली बार लेकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव भी हुए थे लेकिन इस बार सिर्फ़ लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं.

यहाँ इस बार 57 फीसदी मतदान हुआ जो वैसे तो राष्ट्रीय औसत के बराबर है लेकिन स्वयं यहाँ हुए पिछली बार के मतदान से नौ फीसदी कम है.

यह प्रवृत्ति पिछले दशक भर से दिख रही है. जब से राज्य, राजनीतिक सत्ता की प्रभावी इकाई बनते गए हैं, विधानसभा चुनावें में लोग लोकसभा की तुलना में ज्यादा उत्साह से भाग लेते हैं.

मतदान में कमी

अधिकांश दूसरे राज्यों में औसत से कम मतदान हुआ है.

भागीदारी स्तर पर राज्य में अलग-अलग हैं पर पिछली बार की तुलना में ज्यादा अंतर नहीं है, असम में जिन क्षेत्रों में पहले चरण में मतदान हुआ वहाँ औसत 71 फीसदी लोगों ने वोट डाले.

यह आकड़ा भी पिछली बार के मतदान से दो फीसदी कम है.

गुजरात दूसरे छोर पर है और वहाँ 45 फीसदी ही वोट पड़े जो यहाँ पिछली बार पड़े वोटों से दो फीसदी कम है.

कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान
काफ़ी कड़ी सुरक्षा के बीच हुआ है मतदान

बिहार और छत्तीसगढ़ के मतदान में और ज्यादा गिरावट आई पर झारखंड के छह चुनाव क्षेत्रों में आश्चर्यजनक ढंग से काफी ज़्यादा मतदान हुआ है.

अन्य छोटे राज्यों में भी यही प्रवृत्ति दिखी है.

पूर्वोत्तर में मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा में मतदान में थोड़ी कमी है. दादर और नगर हवेली तथा दमन और दीव में भी वोट कम पड़े पर अंडमान और निकोबार में ज्यादा मतदान हुआ है.

बाहरी मणिपुर में उग्रवादी संगठनों की धमकी और बायकाट का प्रभाव नहीं हुआ और लोगों ने पिछली बार से ज्यादा संख्या में मतदान किया.

जम्मू-कश्मीर में जिन दो क्षेत्रों में मतदान हुआ है, वहाँ 1999 की तुलना में 13 फीसदी अधिक मतदान हुआ है लेकिन यह लोगों के उत्साह का पैमाना नहीं है.

असल में इस बार जम्मू में ही सिर्फ 29 फीसदी ही वोट पड़ा है. बारामूला में 23 फीसदी वोट पड़े लेकिन इसे ख़राब नहीं मानना चाहिए- पिछली बार के आकड़ों के पक्का होने का भरोसा नहीं किया जाता.

अब मतदान के अंतिम आकड़े कैसे निकलते हैं, यह इस बात पर ज्यादा निर्भर करेगा कि उत्तर भारत के राज्यों में किस तरह का मतदान होता है.

परिणामों में तो भारी उतार-चढ़ाव आता है, आ सकता है, पर मतदान में ऐसी कमी-बेसी नहीं होती.

मुंबई में मतदान
हर वर्ग के मतदाता ने मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया है

अब अगले दौर में मतदान पहले से ज्यादा अलग हुआ तो यह हैरानी की बात होगी. पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे प्रदेशों में ज़्यादा मतदान होता है और वहाँ ज्यादा उतार-चढ़ाव भी नहीं होता, इसलिए काफी कुछ मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों पर निर्भर है.

हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में ज्यादा उत्साह से मतदान नहीं हुआ है. हालांकि रणनीति बहुकोणीय और दिलचस्प रही है. राजस्थान और मध्य प्रदेश में इस बार ज्यादा ज़ोरदार मुकाबला नहीं है.

संभव है, मतदान पर उसका और हाल के चुनावें की थकान का असर पड़े.

अगर इन राज्यों में कम मतदान हुआ तो अंतिम आकड़ा 60 की जगह 55 फीसदी के आकड़े के ज़्यादा नज़दीक पहुँच जाएगा.

मतदान और नतीजे

मतदान के आकड़ों के आधार पर राजनीतिक नतीजे निकालना जल्दबाज़ी होगी.

मतदान में लोगों की भागीदारी और नतीजों के बीच के संबंध को लेकर काफी कुछ तर्क दिए जाते हैं पर अभी तक इस सिद्धांत को समर्थन देने वाले प्रमाण देखने में नहीं आए हैं.

हाँ, हम इतना ज़रूर कह सकते हैं कि मुल्क में कोई फीलगुड नहीं है और यह चीज़ ऐक्ज़िट पोल में भी दिखी है.

कोई कह सकता है कि झारखंड में ज्यादा मतदान शासक दल भाजपा के लिए अच्छा नहीं है, पर यही तर्क उड़ीसा में ज्यादा मतदान पर लागू नहीं होता.

कम मतदान से बिहार में राजद और गुजरात में भाजपा को लाभ हो सकता है पर महाराष्ट्र में इसका क्या नतीजा होगा, कोई नहीं कह सकता.

इसलिए इस बारे में ज्यादा अटकलबाजी छोड़ ही देनी चाहिए.

किसकी रुचि

इस बार का कम मतदान मुल्क में बीते कुछ वर्षों से दिख रहे लोकतांत्रिक उभार के लिए नुक़सानदेह ही है. यह निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाज़ी होगी.

मतदाता
महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में कम रहा है लेकिन उसमें सुधार हो रहा है

इस बारे में कुछ भी निर्णायक कहने से पहले मतदान में हिस्सा लेने वालों की सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक भागीदारी पर भी ग़ौर करना होगा जिससे जुड़े विवरण अभी एकदम उपलब्ध नहीं हैं.

पहले के मतदान पर सीएसडीएस ने जो अध्ययन कराए हैं, उनसे स्पष्ट है कि दलितों और पिछड़ों की भागीदारी ऊँची जाति के हिंदुओं से ज्यादा हुई है.

1990 के दशक के शुरू में मुसलमानों की भागीदारी थोड़ी कम हुई थी, पर बाद में वह राष्ट्रीय औसत से ज्यादा होती गई.

आदिवासियों की आबादी मोटे तौर पर उनके लिए आरक्षित क्षेत्रों में ही है और उनकी भागीदारी का अनुमान अभी भी किया जा सकता है.

पहले इन क्षेत्रों में सामान्य क्षेत्रों से काफी कम मतदान होता था.

हाल के चुनावों में यह मामला कम होता गया है और संभव है कि इस बार समाप्त ही हो गया हो.

ग्रामीण क्षेत्रों के मतदान के मामले में शहरों ने काफी पहले ही बढ़त ले ली थी.

औरतों का मतदान पुरुषों की तुलना में कम है, पर अब मामला काफ़ी कम होता जा रहा है.

अंतिम आकड़ों से ही पता चलेगा कि इस बार के मतदान के क्षेत्रों में क्या बदलाव आया है.

जब सारा ध्यान चुनावी नतीजों पर हो तब यह हिसाब-किताब अकादमिक लग सकता है.

चुनावी लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी पर ग़ौर करना भी कम महत्वपूर्ण चीज़ नहीं है.

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