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शुक्रवार, 23 अप्रैल, 2004 को 11:35 GMT तक के समाचार
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एक्ज़िट पोल और उसके बाद का विवाद

मतदान
मतदाता ने किसे वोट दिया यह जानना अपने आपमें बड़ी चुनौती है
मंगलवार, 20 अप्रैल को मतदान केन्द्रों पर गहमागहमी ख़त्म होने के बाद शुरू हुआ, एक दूसरा हंगामा-टेलीविजन चैनलों पर दर्शकों को यह बताने के लिए कि पहले चरण के लिए 140 सीटों पर हुए मतदान में किस पार्टी का पलड़ा भारी है और किसके पैर के नीचे से ज़मीन खिसक रही है.

हालांकि सारे चुनावों के नतीजे 13 मई को ही पता चल पाएंगे जब मतों की गिनती होनी है.

लेकिन टीवी चैनलों ने मंगलवार को मतदान केन्द्रों से बाहर आने वाले वोटरों के बीच अपने तरीके से सर्वेक्षण किया और उसी के नतीजे पर भविष्यवाणी कर दी कि 2004 लोकसभा चुनावों में किस पार्टी का पताका फहराएगा.

चुनाव से संबंधित सर्वे करने वाली एक संस्था डेवल्पमेंट एंड रिसर्ज सर्विस के डायेक्टर जी.वी.एल नरसिम्हा राव कहते हैं, "हम जो भी पद्धति अपनाते हैं वह पूरी तरह वैज्ञानिक है. लेकिन रैंडम मेथड में भी तरह-तरह की पद्धति है.''

उनका कहना है कि जो पूरी तरह रैंडम तकनीक है. वह हमारे देश में कई वजहों से लागू करना मुश्किल है. इसिलए हम उसके बाद जो सबसे बेहतर पद्धति है वह अपनाते हैं. लेकिन वह उसके नतीजे पहली पद्धति जितनी बेहतर नहीं होते."

यह सारे सर्वेक्षण जिनके बारे में दावा किया जाता है कि वे वैज्ञानिक तरीके से करवाए जाते हैं, उनके अनुमान एक दूसरे से पूरी तरह से भिन्न होते हैं.

एक सर्वेक्षण ने जहां राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन को 140 में से 69 सीटे दीं. वहीं दूसरे ने कहा कि 93 सीटें लाकर एनडीए 1999 के मुकाबले अपना प्रदर्शन बेहतर करेंगी.

कांग्रेस के मामले में किसी ने कहा 41, और कोई तो उसके लिए 53 सीटों की भविष्यवाणी करने लगा. यानी 12 सीटें ज्यादा.

भाषा, जाति और भौगोलिक स्थिति में अनगिनत विभिन्नताएं रखने वाले देश भारत में, जहां मतदाताओं की संख्या साढ़े सड़सठ करोड़ हो, इस तरह के एक्जिट-पोल करना आसान नहीं.

सारे मतदाताओं का सर्वे करना नामुमकिन और अगर किया जाय तो यह और भी महंगा हो जाएगा.

राजनीतिक दलों की स्थिति

राजनीतिक पार्टियों की हालत भी शायद टीवी चैनलों के दर्शकों से बेहतर नहीं थी और वे भी भ्रमित नज़र आ रही थीं.

हालांकि देश की दोनों मुख्य राजनीतिक पार्टियाँ कांग्रेस और भाजपा ने अपने शीर्ष नेताओं की बैठक बुलाकर इन पर विचार विमर्श किया.

लेकिन जनता के सामने इन सर्वेक्षणों में अपने लिए कही गई सकारात्मक पहलू को ही उजागर किया.

भाजपा अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने कहा, ''सब एक्जिट पोल से एक बात तय है कि कांग्रेस का एक्जिट तय है. यह भी तय है कि वाजपेयी की अध्यक्षता में ही एनडीए ही अगली सरकार बनाएगी.''

उनका कहना था, ''मैं इन सर्वे से एक मामले में सहमत नहीं. ये सर्वेक्षण यह नहीं कह पा रहे हैं कि वाजपेयी के लिए एक लहर पूरे देश में है. लेकिन इन सर्वेक्षणों की प्रामाणिकता पहले भी पूरी तरह ग़लत साबित हो चुकी है. खासतौर पर पिछले साल के विधानसभा चुनाव में.''

वेंकैया नायडू शायद इस बात से खुश नहीं थे कि लगभग सारे एक्जिट पोल में कांग्रेस का प्रर्दशन मतदान के पूर्व किए गए सर्वेक्षणों से बेहतर बताया गया था.

कांग्रेस गठबंधन को चूंकि सारे एक्जिट पोल में एनडीए से कम सीटें मिलने की बात कही गई है इसलिए उसका नज़रिया इस मामले में कुछ और है.

 पहले चरण का मतदान 20 अप्रैल को था और अंतिम चरण 10 मई को है. दोनों में लगभग 20 दिनों का अंतर है. इस बीच इस तरह के एक्जिट पोल दिखाने से वोटरों की सोच पर असर पड़ता है
ऑस्कर फ़र्नांडिस, कांग्रेस महासचिव

कांग्रेस महासिचव ऑस्कर फर्नांडिस का कहना है कि इस तरह के सर्वेक्षण मतदाता को प्रभावित करते हैं.

उन्होंने कहा, '' पहले चरण का मतदान 20 अप्रैल को था और अंतिम चरण 10 मई को है. दोनों में लगभग 20 दिनों का अंतर है. इस बीच इस तरह के एक्जिट पोल दिखाने से वोटरों की सोच पर असर पड़ता है.''

रोक की अपील

राजनीतिक पार्टियाँ टीवी चैनलों, समाचारपत्रों और पत्रिकाओं द्वारा प्रकाशित किए जाने वाले चुनाव सर्वेक्षणों को रुकवाने के लिए चुनाव आयोग से भी मिल चुके हैं.

हालांकि सभी पार्टियां इस पर एकमत थीं, लेकिन आयोग ने इन सर्वे पर अब तक कोई रोक नहीं लगाई है.

टीवी चैनलों, समाचार पत्रों और पत्रिका प्रकाशित करने वाले वह समूह जो ज़ाहिर है कि इस एक्ज़िट पोल पर रोक नहीं चाहते, उनके लिए इन एक्ज़िट पोल मतलब बढ़ी हुई बिक्री और विज्ञापनों के माध्यम से ज्यादा पैसे बनाने का ज़रिया है.

सर्वेक्षण कर रही हैं बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग रिसर्ज एजेंसियाँ, जो सर्वे करने के नाम पर करोड़ों उगाह रही हैं उन्हें वोटरों की बौखलाहट से कोई लेना-देना नहीं है.

शायद इस मामले में भी और मामलों की तरह वोटरों की मदद चुनाव आयोग को ही करनी होगी.

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