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राजस्थान में कांग्रेस कठिनाई में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान में कांग्रेस का मुकाबला भाजपा से तो है ही, इससे भी बढ़कर भारतीय लोकतंत्र के ब्रह्मवाक्य या लौह नियम से है. और यह नियम है कि सत्ता में आई पार्टी बहुत कम समय के अंदर चुनाव नहीं हारती इस अवधि को सुविधा के लिए ‘हनीमून पीरियड’ कहा जा सकता है. पहला चुनाव जीत चुकी पार्टी को ही लोग दोबारा भी वोट दे देते हैं और अगर कुछ बदलाव होता भी है तो शासक दल के पक्ष में जाता है. पहला चुनाव विधानसभा का हो या लोकसभा का, यह नियम सब पर लागू होता है. इसी के चलते 1970 और 1980 दशक में लोकसभा चुनाव जीतने पर विधानसभा चुनाव करवा लेने का चलन शुरु हुआ था. 1990 के दशक में स्थिति थोड़ी बदली, अब विधानसभा जीतने वाला दल संसदीय चुनाव में बेहतर करने लगे. वैसे इस नियम के अपवाद भी रहे हैं, 1984 में रामकृष्ण हेगड़े ने लोकसभा चुनाव परिणाम के उलट राज्य विधानसभा के चुनाव जीते थे. उससे हाल में भी भाजपा 1998 में तो राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली में विधानसभा चुनाव हार गई थी. लेकिन 1999 के संसदीय चुनावों में इसने इन राज्यों में भारी जीत दर्ज की. पर ये अपवाद ही हैं, और ऐसा नया अपवाद बनाने के लिए कांग्रेस को राजस्थान में अपूर्व और अपवाद जैसा प्रदर्शन ही करना होगा. बदलते समीकरण सारी चुनावी भविष्यवाणियाँ राजनीतिक मूल्यांकनों और कांग्रेसी उम्मीदों को झुठलाते हुए चार महीने पहले ही भाजपा ने कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में पस्त कर दिया था.
आंकड़ों के हिसाब से देखें तो भाजपा को कोई बहुत बड़ी जीत नहीं मिली थीं, भाजपा को 40 फीसदी वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस को 36 फीसदी, पर मात्र 4 फीसदी के अंतर ने भाजपा को दो दिहाई बहुमत दिला दिया. जिस राज्य में भैरो सिंह शेखावत के दौर में भाजपा को कभी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था उसमें यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. और यह परिवर्तन राज्य में दो दलीय व्यवस्था उभरने से आया जिसका लाभ भाजपा को मिला, यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि 1993 तक भाजपा ने राज्य की सभी सीटों पर कभी चुनाव नहीं लड़ा था. राज्य में कुर्मी हिस्से में हाल तक एक ताक़त रहे जनता दल के ध्वस्त हो जाने के बाद ही राज्य में सीधे-सीधे भाजपा बनाम कांग्रेस की चुनावी लड़ाई की स्थिति बनी, इसके बाद से राज्य में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही 40 फीसदी से ऊपर वोट पा रहे हैं. 1991 और 1996 चुनाव में दोनों को लगभग बराबर-बराबर सीटें भी मिली थीं, 1998 में कांग्रेस को ज्यादा सीटें मिलीं तो 1999 में भाजपा को. विधानसभा चुनाव में भाजपा ने खास रणनीति से काम किया और 51 ऐसी सीटें जीतने में कामयाब रही जिस पर उसे कभी जीत नहीं मिली थी. बसपा इन दोनों दलों को चुनौती देने का प्रयास करती रही है पर राजस्थान में उसे अभी तक जीत नसीब नहीं हुई है. विधानसभा चुनावों में मिली अप्रत्याशित हार के सदमे से कांग्रेस अभी तक नहीं उबरी है. नेतृत्व परिवर्तन राज्य भर में बहुत अच्छी पहचान और उपस्थिति रखने वाले एकमात्र कांग्रेसी नेता अशोक गहलौत के हाथ में पार्टी की बागडोर नहीं है. नए पार्टी नेतृत्व ने संगठन में फेरबदल कर सरने की हिम्मत नहीं दिखाई है और नए पार्टी नेतृत्व ने संगठन में फेरबदल कर सकने की हिम्मत नहीं दिखाई है.
इसके उम्मीदवारों में शीशराम ओला, बूटा सिंह और गिरिजा व्यास जैसे पुराने चेहरे भरे पड़े हैं. सचिन पायलट, जो अपने पिता और फिर माँ की सीट दौसा से लड़ रहे हैं, जैसे नए चेहरे अपवाद समान ही है. राज्य की वसुंधरा राजे सरकार से लोगों की नाराजगी का अभी तक कोई लक्षण नहीं दिखता. मुख्यमंत्री अभी भी अपनी जीत के लिए मंदिरों में मत्थे टेकती फिर रही हैं और अभी भी उन्होंने प्रशासन की बारीकियों पर गौर नहीं किया है जबकि राज्य बीते कई वर्षों से सूखे की चपेट में रहा है. अभी इस बात का भाजपा के चुनावी भविष्य पर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन भाजपा के सामाजिक आधार में अगर बड़ा बदलाव आ गया तो उसका फर्क जरूर होगा. राजस्थान पर अभी तक मंडल का ज्यादा असर नहीं पडा है, अभी तक सिर्फ ऊपरी जातियों की राजनीति ही चुनाव को प्रभावित करती रही है. भाजपा ने इस अर्थ में इस बार के विधानसभा चुनाव में एक अनोखी सफलता पाई है कि तीन अगड़ी जातियों-राजपूत, ब्राह्मण और जाट के ज्यादातर वोट उसे मिले जबकि अभी तक ये जातियाँ आपस में घमासान करती रही थीं, इसके साथ ही भाजपा ने इस बार कांग्रेस के ठोस आदिवासी वोट बैंक में भी सेंध लगाई. जाटों पर नज़र कांग्रेस दलितों और मुसलमानों का अपना पारंपरिक आधार बचा पाने में सफल रही पर स्पष्ट है कि इतने से काम बनने वाला नहीं था.
भाजपा ने जाटों को खास तौर से मोहित किया था, कहा जा रहा है कि अब जाट वसुंधरा राजे सरकार से उतने खुश नहीं हैं. जिस जाट महासभा ने विधानसभा चुनाव में खुलकर भाजपा का साथ दिया था अब नाराजगी जताने लगी है, दूसरी और कांग्रेस ने जाटों को पटाना शुरु कर दिया है, उसने वरिष्ठ जाट नेता नारायण सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. अन्य बड़ी जातियाँ भी दोनों प्रमुख दलों से उचित महत्व की माँग कर रही है पर चुनाव में यह चलता ही है. राजस्थान सामाजिक न्याय मंच के बारे में माना जा रहा था कि यह भाजपा के अगड़े आधार में सेंध लगाएगी, पर ऐसा हुआ नहीं और मंच खुद गायब हो गया. नाराज़गी अभी तक दोनों प्रमुख दलों से सामाजिक आधार में किसी बड़े बदलाव के संकेत नहीं है, मगर आदिवासियों में भाजपा का समर्थन ज़रूर बढ़ा है. लेकिन चुनाव पूर्व होने वाले दलबदल, खेमेबाजी और नाराजगी की खबरें जरूर आती रही हैं.
भाजपा के लिए प्रताप सिंह खाचरियावास का कांग्रेस में जाना जरूर परेशानी का सबब बना क्योंकि वे उपराष्ट्रपति और राज्यसभा में भाजपा के जनक रहे भैरो सिंह शेखावत का भतीजा है. टिकटों को लेकर भी भाजपा में नाराज़गी रही, भाजपा ने अपने सभी निवर्तमान सांसदों को उतारकर नए लोगों को मायूस किया जबकि पहले काफी लोगों के टिकट कटने की चर्चा थी. प्रदेश भाजपा अपने केंद्रीय नेतृत्व के इस फैसले से भी नाराज़ हुई कि बांसवाड़ा सीट जनता दल (ए) को दे दिया जाए. भाजपा के पुराने फिल्मी सितारे धर्मेंद्र को चुनाव मैदान में उतारकर चुनावी मुकाबले में कुछ ग्लैमर डालने की कोशिश की है, वे बीकानेर से चुनाव लड़ रहे हैं. पुराने अनुभव के आधार पर कहा जाता है कि इस तरह की चीजें चुनाव पूर्व तो काफी खबरों में रहती हैं पर चुनाव नतीजे पर उनका खास असर नहीं पड़ता है. जहाँ तक आंकड़ों का हिसाब है तो अगर भाजपा विधानसभा जैसा वोट पाती है तो उसे 25 में से 19 स्थान मिल सकते हैं, शेष छह कांग्रेस को जाएंगे. अगर उसे ‘हनीमून बोनस’ के रूप दो फीसदी ज्यादा वोट मिले तो उससे सीटों की संख्या 22 हो जाएगी और फिर कांग्रेस को मात्र तीन सीटों पर संतोष करना होगा. कांग्रेस अगर जरा भी स्थिति सुधार पाई तो उसे 1999 की तरह नौ सीटें मिल जाएँगी, यह स्थिति सिर्फ दो फीसदी और वोट पाकर हो जाएगी. लेकिन यह काम भी आसान नहीं होगा, इसके लिए भी उसे भारतीय लोकतंत्र के लौह नियम को काटना होगा. |
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