| हरियाली आई, खुशहाली नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उड़ीसा के कालाहांडी ज़िले की तस्वीर बदल रही है. भूख और आकाल के साथ इस ज़िले का नाम जुड़ा हुआ है लेकिन इंद्रावती सिंचाई परियोजना ने स्थिति को पलट कर रख दिया है. धान की फसल इस बार ज़बरदस्त हुई है लेकिन भूख और आकाल के बाद इस ज़िले में अति-उत्पादन की समस्या खड़ी हो गई है. यहाँ के किसान वोटर इसी मुद्दे को जीवन-मरण का सवाल बता रहे हैं. ढाक के तीन पात रुद्राचेनई ने जब अपनी दस एकड़ जमीन में धान की लहलहाती फसल देखी तो लगा कि उनकी किस्मत बदल गई है. भूख और अकाल के अभिशाप से बाहर निकलने का इससे बेहतर मौक़ा उनके पास पहले कभी नहीं आया लेकिन कालाहांडी ज़िले के काऊडोला गाँव में मुश्किलें अच्छी फसल से खत्म नहीं हुई हैं. सावित्री अच्छी उपज से खुश तो है लेकिन इस बात से परेशान है कि इस बार भी उनके पास कुछ नहीं बचने वाला. वे कहती हैं - इस साल जो खेती से कमाई होगी उसका एक बड़ा हिस्सा कर्ज़ लौटाने में चला जाएगा. वैसे तो इंद्रावती सिंचाई परियोजना और मानसून ने कालाहांडी की तस्वीर तो बदली है लेकिन समस्या अलग रुप धारण कर किसान, मज़दूर और प्रशासन के सामने खड़ी हो गई है. पहली समस्या ज्यादा उत्पादन की है- कालाहांडी के ज़िलाधीश शाश्वत मिश्रा कहते हैं, ''1998 से पहले किसानों को पूरा पैसा मिलता था लेकिन इंद्रावती योजना आने से उपज बढ़ी है. इससे बाज़ार में किसानों को कम पैसा मिलता है. वे कहते हैं कि ''काम के बदले अनाज योजना में मिलना वाला अनाज भी लोग बाज़ार में बेच रहे हैं इससे भी बाज़ार में अनाज की आवक बढ़ जाती है.'' वे छोटे किसानों के अनाज की गुणवत्ता का भी सवाल उठाते हैं. अब छोटे और मझले किसान करे तो क्या करें. एक तो उनकी फसल गुणवत्ता में मार खा जाती है दूसरी तरफ ज़्यादा दिन तक वो फसल खलिहान में रख नहीं सकते. कोई चारा नहीं ऐसे में औने-पौने दाम पर फसल बेचने के अलावा इनके पास कोई चारा नहीं बचता. और आखिर में जब वे अपनी फसल बेचते भी हैं तो पैसा समय पर नहीं मिलता. सरकार कहती है हम धान को चावल बनाएँगे, उसको बेचेंगे फिर पैसा देंगे. वहीं साहूकारों के पास जाते हैं तो वो चेक देते हैं जिसकी दो महीने बाद की तिथि होती है. बहुत मुश्किल से गुज़ारा हो पाता है. कुल मिलाकर कालाहांडी की कहानी वही की वही रह गई. ऐसा नही है कि इस क्षेत्र में विकास नहीं हो रहा लेकिन जिन लोगों को इसकी सबसे ज्यादा ज़रुरत थी उनके घर, गाँव की ज़मीन तक विकास की किरण पहुँच कर भी उनकी जिंदगी को रोशन नहीं कर पाई है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||