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सिर्फ़ राजनीति में ही नहीं है वंशवाद: मिलिंद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दक्षिण मुंबई संसदीय सीट से कांग्रेस ने इस बार मिलिंद देवड़ा को मैदान में उतारा है और वो पिता मुरली देवड़ा की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं. मुरली देवड़ा 1984 से 1991 तक इस सीट से जीतते रहे और उसके बाद फिर 1998 में भी वह ये सीट जीतने में क़ामयाब हुए थे. इस तरह इस सीट पर उनका प्रभाव काफ़ी समय तक रहा है और उस प्रभाव के साथ ही युवा सोच का फ़ायदा लेने की कोशिश में हैं मिलिंद देवड़ा. मिलिंद का कहना है कि जब व्यापारी और फ़िल्म कलाकार भी अपनी विरासत अपनी अगली पीढ़ियों को सौंपते हैं तब राजनीति में ही वंशवाद का ये मुद्दा क्यों उछाला जाता है. वह कहते हैं कि लोकतंत्र में तो उम्मीदवार जनता के सामने होता है और अगर जनता किसी को योग्य समझती है तो फिर उसमें परिवारवाद की बात कहाँ रह जाती है. मिलिंद ने इस चुनाव के लिए काफ़ी मेहनत की है और क्षेत्र में व्यापक प्रचार भी किया है शायद यही वजह है कि उनकी प्रतिद्वंद्वी जयवंतीबेन मेहता का राजनीतिक क़द बड़ा होने के बावजूद मेहता को क्षेत्र में काफ़ी समय देना पड़ रहा है. युवा और राजनीति राजनीति में आने के बारे में मिलिंद का कहना है कि उन्होंने इसी क्षेत्र को आम लोगों की सेवा करने के लिए सबसे बेहतर समझा. युवाओं के राजनीति में आने के बारे में मिलिंद का कहना है कि जब युवाओं को राजनीति में लाने की बात होती है तो वह सिर्फ़ उम्र के आधार पर नहीं बल्कि उनकी लचीली और परिवर्तनशील सोच के आधार पर बोती है. वह केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं. उनका कहना है कि इस सरकार ने बेरोज़ग़ारी जैसी बड़ी समस्या के लिए कुछ भी नहीं किया. मिलिंद का कहना है कि मुंबई राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 50,000 करोड़ रुपए देती है मगर उसे इसके मुक़ाबले काफ़ी कम पैसा वापस मिलता है. वह कहते हैं कि पिछले दिनों तो मुंबई के छह में से पाँच सांसद भाजपा-शिवसेना गठबंधन के ही थे मगर उन्होंने मुंबई के विकास के लिए कुछ ख़ास नहीं किया. स्थानीय स्तर पर मिलिंद पानी और साफ़ सफ़ाई के साथ ही पुरानी इमारतों की मरम्मत का मसला भी उठा रहे हैं. स्थानीय नेताओं की मदद वैसे प्रचार के दौरान उनके स्थानीय नेता उन्हें बताते चलते हैं कि कहाँ किस बात पर ख़ास ज़ोर देना है. जैसे जब मिलिंद सुकरण चॉल में पहुँचे तो पहले ही उनके सलाहकारों ने उन्हें कह दिया कि यहाँ पर चॉल की मरम्मत की बात ज़रूर कह दीजिएगा.
यही नहीं मिलिंद रास्ते में मिले बच्चों को जेब से निकालकर टॉफ़ी भी देते चलते हैं और उधर उनके आगे-आगे चल रही युवा मंडली मिलिंद के समर्थन में नारे लगाती चलती है. मिलिंद को विश्वास है कि स्थानीय सांसद जयवंतीबेन मेहता के ‘काम नहीं करने’ की वजह से लोगों में जो ग़ुस्सा है वो उनके लिए मतों के रूप में दिखेगा. मिलिंद के पिता मुरली देवड़ा 1999 का लोकसभा चुनाव 10,243 मतों से हारे थे जबकि इसी क्षेत्र से खड़े समाजवादी पार्टी के अज़ीज़ लालानी को 19,128 मत मिले थे. यानी मतों के बँटवारे ने जयवंतीबेन की राह आसान कर दी थी. शायद यही वजह है कि मिलिंद इस बार के चुनाव प्रचार में अल्पसंख्यकों को ये बताने से नहीं चूक रहे कि उनके मत ऐसे प्रत्याशी को नहीं जाने चाहिए जिनकी वजह से ‘सांप्रदायिक ताक़तें’ जीत जाएँ. अब ऐसे में ये क्षेत्र काफ़ी दिलचस्प हो रहा है और भाजपा-शिवसेना विरोधी मतों के ध्रुवीकरण की स्थिति में मिलिंद देवड़ा को फ़ायदा हो सकता है. |
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