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शुक्रवार, 23 अप्रैल, 2004 को 11:31 GMT तक के समाचार
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काफ़ी लोग हैं मतदान से महरूम

मज़दूरी करने वाले लोग
बड़ी संख्या में लोग शहर आकर मज़दूरी करते हैं
विश्व का सबसे विशाल लोकतंत्र और उसका 14वां लोकसभा चुनाव. लेकिन लाखों भारतीय ऐसे हैं जो मतदान करना तो चाहते हैं लेकिन कर नहीं पाते.

पार्वती कांबल (पारो) पिछले सात सालों से कमाठीपुरा की सड़कों पर रहती है. उसके पहले शहर की किसी और गली में इनका ठिकाना था.

शायद कल फिर वो कहीं और जाकर धंधा करे. इन अंधेरी गलियों में पारो जैसी औरतों के पास न तो राशन कार्ड है और न ही मतदाता सूची में उनका नाम.

वे कहती हैं, "मेरा भी दिल होता है कि मैं वोट डालूँ. लेकिन मेरा वोट कोई नहीं लेता. वोट करने जाओ तो कहते हैं राशन कार्ड लाओ."

जुलेखा भी पारो जैसी एक यौनकर्मी है जो अपना नेता ख़ुद चुनना चाहती है.

उनका कहना है, "हमारा आगे क्या होगा? हमारे बच्चों का क्या होगा? हमारी मजबूरी है कि आज हम यहां है. लेकिन हम वोट नहीं कर पाते."

दुर्गा कहती हैं कि कोई उन्हें पूछने भी नहीं आता कि उनका नाम मतदाताओं की सूची में है या नहीं.

विरोधाभास

दुर्गा कहती हैं, "कल अगर हम एड्स से मर गए तो हमारे बच्चों को कौन देखेगा? अगर हम वोट कर पाते तो कल अपने चुने गए नेता से सवाल कर सकते हैं कि आपने हमारे लिए क्या किया?"

बड़ी संख्या
 मतदान न कर पाने वाले लोगों की संख्या इतनी बड़ी है कि आप अंदाज़ा ही नहीं लगा सकते
पी साइनाथ, पत्रकार

इन यौनकर्मियों और उनके बच्चों के लिए काम कर रही एक ग़ैर सरकारी संस्था 'प्रेरणा' की निदेशक प्रीति पाटकर कहती हैं कि शहर भर में हजारों ऐसी औरते हैं जिनका नाम मतदाताओं की सूची में शामिल नहीं है.

लेकिन सबसे प्रमुख वजह है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी या किसी भी नेता को आज तक ऐसा नहीं लगा है कि ये औरतें भी इस देश की नागरिक हैं.

इन हजारों यौनकर्मियों के अलावा लाखों ऐसे लोग हैं जो मतदान की इच्छा रखने के बावजूद मत नहीं दे सकते.

देश के विभिन्न क्षेत्रों से लाखों की तादाद में ये ग़रीब रोज़गार की तलाश में मुंबई जैसे बड़े शहरों में आते हैं.

News image
नौकरी की चाह में वोट गँवाना पड़ता है

ये लोग हर दो तीन महीनों में रोज़गार की तलाश में अपना ठिकाना बदलने पर मजबूर हैं. बिहार से आए धर्मेंद्र कुमार यादव अगर इस समय अपने गांव में होते तो पहली बार मत डालते.

लेकिन रोज़गार की तलाश ने उन्हे मुंबई ला पटका.

इनके साथ काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था 'निर्माण' की निदेशक वैजंता आनंद कहती है कि ज़िंदगी का व्यंग्य देखो ये लोग हमारे शहर को साफ़ रखते हैं, हमारे शहर को बांधते हैं लेकिन ख़ुद बेघर है.

इसी तरह चुनाव प्रचार में जनसभाओं में अलग-अलग राजनीतिक पार्टियां इन्हें भीड़ के रूप में लेकर तो जाती हैं, लेकिन ये वोट नहीं दे पाते.

पत्रकार पी साइनाथ ने इन मजदूरों की समस्याओं को क़रीब से देखा है. वो कहते हैं कि इतनी तादाद इतनी बड़ी है कि अंदाज़ा लगाना मुश्किल है.

लेकिन देश में कई लाख लोग इस साल वोट नहीं दे पाएंगे, क्योंकि वो काम की तलाश में अपने घरों से दूर हैं. गाँव के गाँव आधे खाली हैं.

वे कहते हैं, "अप्रैल-मई में चुनाव रखना लोकतंत्र के खिलाफ है क्योंकि लाखों लोग वोट नहीं कर पाएंगे."

मजबूरी

उत्तर प्रदेश से आए राम सिंह कहते हैं, "उधर बेरोज़गारी बहुत है इसलिए यहां फ़ायदा रहता है लेकिन इस बार वोट नहीं दे सकेंगे इस बात कर दुख है."

अगर हम पहले दौर का मदतान ही देखे, हर जगह ये पिछले बार से कम हुई हैं.

मराहाष्ट्र के विदर्भ ज़िले का चिमुर इलाक़ा देश का सबसे अधिक मतदान करने वाला चुनावी क्षेत्र माना जाता है.

पहले दौर में देश के सभी क्षेत्रों के मुक़ाबले यहाँ सबसे ज्यादा मतदान हुआ. लेकिन उस इलाक़े के इतिहास में कल सबसे कम मतदान हुआ है.

व्यवस्था नहीं
 इनके लिए कोई अलग व्यवस्था नहीं है कि उनका नाम एक जगह रजिस्टर हो और वो दूसरी जगह वोट दे सके
मुख्य निर्वाचन अधिकारी, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी आरके भार्गव कहते हैं, "इनके लिए कोई अलग व्यवस्था नहीं है कि उनका नाम एक जगह रजिस्टर हो और वो दूसरी जगह वोट दे सके."

उनका कहना है, "ये सिर्फ सर्विस वोटर्स के लिए होता है जो आर्मी में हैं. इसके लिए तो क़ानून बदलना पड़ेगा. अभी जो क़ानून लागू है, उसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है."

एक शहर मुंबई और बड़ी संख्या में मतदाता, जो चाहकर भी वोट नहीं दे पा रहे.

पूरे देश का आकलन करें तो ये संख्या कई गुना बढ़ जाएगी. चाहें तो ये चुनाव का रुख़ बदल दें, चाहे तो सत्ता पलट दे. लेकिन ऐसा कर नहीं पाते.

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